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राजनीति: निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र

चुनाव आयोग से उम्मीद की जाती है कि देश में जहां भी चुनाव हों वहां स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण मतदान कराया जाए। चुनाव से पहले मतदाता सूचियों की अच्छी तरह से जांच-परख हो। फर्जी मतदाताओं के नाम सूची से अलग किए जाएं। जो अंतिम मतदाता सूची बने, वह त्रुटिरहित हो। ईवीएम-वीवीपीएटी मशीनों की अच्छी तरह से जांच की जाए, फिर उनका इस्तेमाल हो।

Author September 29, 2018 2:35 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

जाहिद खान

चुनाव आयोग ने अब मतदाता सूचियों की जांच कराने का फैसला किया है। मतदाता सूचियों की जांच फिलहाल मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में होगी, जहां इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस जांच में मतदाता सूचियों के अलावा मतदाता केंद्रों और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) को रखे जाने की व्यवस्था आदि की भी विस्तृत जांच होगी। व्यवस्थित मतदाता शिक्षा और चुनावी भागीदारी (एसवीईईपी) एवं बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) के प्रशिक्षण का भी निरीक्षण किया जाएगा। जांच दल चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों या कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं करने के मामलों का पता लगाएंगे और उनमें सुधार सुनिश्चित करेंगे। आयोग ने इस बाबत संबंधित राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारियों से अपने मातहत अधिकारियों को यह निर्देश देने को कहा है कि वे जांच दलों की मांगी सूचना उसी दिन तत्काल मुहैया कराएं। इस पूरी कवायद के पीछे चुनाव आयोग का मकसद, अपने निर्देशों और वैधानिक प्रावधानों के निपटारे की जहां निगरानी करना है, वहीं जरूरत के मुताबिक सुधार के लिए कदम भी उठाना है।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मतदाता सूचियों में फर्जी मतदाताओं के नाम होने संबंधी कई शिकायतें चुनाव आयोग को मिली थीं। इसी साल जून में चुनाव आयोग को मध्यप्रदेश के एक सौ एक विधानसभा क्षेत्रों की प्रमाण सहित शिकायत मिली थी कि इन क्षेत्रों में साठ लाख फर्जी मतदाता हैं। मतदाता सूचियों में कई मतदाताओं के नाम एक से अधिक बार हैं। कुछ के नाम अलग, लेकिन फोटो एक समान हैं। जबकि कई के नाम एक से अधिक विधानसभाओं और पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के कई मतदाता, मध्यप्रदेश की मतदाता सूची में दर्ज हैं। बहरहाल, आयोग ने इस शिकायत पर तत्परता दिखाते हुए जांच के लिए तत्काल आदेश तो दे दिए, लेकिन एक ही हफ्ते में अपनी जांच पूरी करते हुए, शिकायत यह कह कर खारिज कर दी कि वह झूठी है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि जहां एक ओर आयोग ने इस शिकायत को खारिज कर दिया, वहीं दूसरी ओर इस शिकायत के बाद से उसने अब तक प्रदेश की मतदाता सूची से करीब चौबीस लाख फर्जी मतदाताओं के नाम भी हटाए हैं।

राजस्थान में भी तकरीबन बयालीस लाख फर्जी मतदाता होने की शिकायतें मिली हैं। अकेले जयपुर शहर के आठ विधानसभा क्षेत्रों में करीब दो लाख पैंतालीस हजार फर्जी मतदाता पाए गए हैं। इन विधानसभा क्षेत्रों में एक मतदाता का नाम, दो से लेकर चार जगह तक दर्ज है। कई मामलों में एक ही पते पर सौ-सौ लोग रह रहे हैं। इसे लेकर बाकायदा केंद्रीय चुनाव आयोग से लेकर जिला निर्वाचन अधिकारियों तक शिकायतें दर्ज कराई गर्इं। फर्जी मतदाता मामले में छत्तीसगढ़ भी पीछे नहीं है। यहां भी मतदाता सूची के चार लाख पैंतीस हजार आठ सौ उनयासी नामों पर, फॉर्म 6 के जरिए एतराज जताया गया है। जांच के बाद आयोग ने कुछ नाम निकाले भी हैं। जब इस बारे में चुनाव आयोग से शिकायत की गई तो आयोग ने इन सभी इल्जामों को खारिज करते हुए जांच से इंकार कर दिया है। जाहिर है, जब चुनाव आयोग में निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई तो मामला अदालत में पहुंच गया। याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत से गुहार लगाई कि अदालत, चुनाव आयोग को निर्देश दे कि वह मध्यप्रदेश और राजस्थान में बोगस मतदाताओं को सूची से तत्काल हटाए। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी मांग की है कि इन राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव निष्पक्ष कराने के लिए वीवीपीएटी मशीनों का औचक परीक्षण और मतदाता सूची से मिलान किया जाए। वीवीपीएटी से निकलने वाली पर्ची दिखाने का वक्त सात सेकंड से बढ़ाया जाए।

जाहिर है, ऐसी याचिकाओं में जो भी मुद्दे उठाए गए हैं, वे बेहद गंभीर हैं। इन्हें नजरअंदाज करना लोकतंत्र को कमजोर करने जैसा होगा। यही वजह है कि इस संवेदनशील याचिका को न सिर्फ अदालत ने स्वीकार किया, बल्कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग और प्रदेश निर्वाचन आयोग दोनों को नोटिस देकर इस संबंध में जवाब तलब भी किया। चुनाव आयोग ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में अपना जवाब भी दाखिल कर दिया है। आयोग ने अदालत में दिए गए हलफनामे में कहा है कि याचिका में आयोग पर लगाए गए आरोप गलत, बेबुनियाद और भ्रामक हैं। आयोग अपनी भूमिका और कर्तव्यों को लेकर सतर्क है। साथ ही ईवीएम की खरीद और सुरक्षा सुनिश्चित करने, वीवीपीएटी की छपाई, मशीनों की जांच, अधिकारियों की तैनाती आदि सुनिश्चित करने के लिए उसने सभी आवश्यक निर्देश जारी किए हैं। याचिकाकर्ता का वीवीपैट मशीनों में खराबी का आरोप पूरी तरह से झूठा और भ्रामक है।
इसलिए आयोग के इस हलफनामे के बाद सवाल उठता है कि एक तरफ चुनाव आयोग मतदाता सूची में फर्जी मतदाताओं के नाम होने से इंकार करता है, तो दूसरी ओर वह चुनाव वाले राज्यों में मतदाता सूचियों की जांच करवा रहा है। अदालत में भले ही उसने इस बात से इंकार कर दिया है कि मतदाता सूची में कोई गड़बड़ी नहीं है, लेकिन उसे इस बात का अच्छी तरह अहसास है कि जब अदालत में तथ्यों और सबूतों के साथ आगे जिरह होगी, तो उसे मुंह की खानी पड़ सकती है। यही वजह है कि चुनाव आयोग ने फर्जी मतदाताओं की शिकायत वाले राज्यों में मतदाता सूची से फर्जी मतदाताओं के नाम हटाने में तेजी ला दी है। यही नहीं, चुनाव को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए उसने हाल ही में शीर्ष अदालत को एकतरफा प्रशंसात्मक खबरों को पेड न्यूज मानने का सुझाव दिया है। आयोग के मुताबिक जिन खबरों में कोई राजनेता उपलब्धियों का गुणगान करते हुए मतदाताओं से अपने पक्ष में वोट देने को कहे, तो उन्हें पेड न्यूज माना जाए। चाहे ऐसे मामलों में पैसे दिए जाने का कोई सबूत हो या न हो।

विधानसभा क्षेत्र में एक मतदाता का नाम दो जगह होना गैरकानूनी है। फर्जी मतदाता पहचान पत्र बनवाने का मकसद, कहीं न कहीं चुनाव को प्रभावित करना है। इस तरह की मतदाता सूचियां यदि दुरुस्त नहीं हुर्इं, तो निष्पक्ष चुनाव कैसे संपन्न होगा? जाहिर है, ऐसे में लोकतंत्र एक मजाक बन कर रह जाएगा। जब इस तरह की शिकायतें आती हैं, तो निश्चित तौर पर इन शिकायतों का निदान करना चुनाव आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। चुनाव आयोग से उम्मीद की जाती है कि देश में जहां भी चुनाव हों वहां स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण मतदान कराया जाए। चुनाव से पहले मतदाता सूचियों की अच्छी तरह से जांच-परख हो। फर्जी मतदाताओं के नाम सूची से अलग किए जाएं। जो अंतिम मतदाता सूची बने, वह त्रुटिरहित हो। ईवीएम-वीवीपीएटी मशीनों की अच्छी तरह से जांच की जाए, फिर उनका इस्तेमाल हो। यह सुनिश्चित किया जाए कि चुनाव से पहले या उसके बाद में किसी भी उपाय से ईवीएम-वीवीपीएटी मशीनों के साथ छेड़छाड़ मुमकिन न हो। चुनाव आचार संहिता का पालन भेदभाव रहित किया जाए। मीडिया में पेड न्यूज का मामला सामने आने के बाद, संबंधित शख्स पर तुरंत कार्रवाई हो। यदि किसी क्षेत्र में कोई शिकायत सामने आए, तो उसकी तत्परता से जांच हो। जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कराई जाए, ताकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर कोई सवाल न खड़ा करे। अकेले चुनाव आयोग ही नहीं, बल्कि सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि देश में निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराए। निर्वाचन प्रणाली पर जनता का यकीन कायम रहना, लोकतंत्र की सेहत के लिए बेहद जरूरी है। यदि चुनाव प्रणाली से उसका यकीन उठ जाएगा, तो वह क्यों चुनाव में हिस्सा लेगी?

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