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राजनीति: छात्रों पर आइएसआइ की नजर

कश्मीर घाटी में आइएस की मौजूदगी के बाद देश के अन्य इलाकों में रहने वाले कश्मीरी छात्रों से उसकी संपर्क की कोशिशें भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी चिंता का कारण है। इन घटनाओं बीच इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान की खुफियां एजंसी आइएसआइ ने भारत में अस्थिरता फैलाने के लिए इस्लामिक स्टेट से हाथ मिला लिया है।

Author October 25, 2018 2:13 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

ब्रह्मदीप अलूने

भारत लंबे समय से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की मार झेल रहा है। लेकिन भारतीय खुफिया एजंसियां अब एक और नई गंभीर चुनौती का सामना कर रही हैं, और वह यह है कि शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले कुछ उच्च शिक्षित युवा आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए तैयार हो रहे हैं। इसमें अधिकांश वे कश्मीरी छात्र हैं जो देश के कई इलाकों में रह कर अध्ययन कर रहे हैं। पिछले दिनों पंजाब के जलंधर के एक छात्रावास से इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले तीन छात्रों और उनके साथ एक साजिशकर्ता को पुलिस ने पकड़ा था। इनमें दो छात्र बी. टेक कर रहे हैं, जबकि तीसरा मेडिकल लैब साइंस का छात्र है। इनसे खतरनाक हथियार और विस्फोटक बरामद किए गए। ये छात्र छात्रावास में रह कर पढ़ाई करते थे और बेहद शातिराना तरीके से अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे। पुलिस और खुफियां एजंसियों से बचने के लिए ये टेलीग्राम मेसेंजर का इस्तेमाल करते थे। फोन पर बात किए बिना ये छात्र टेलीग्राम मेसेंजर से चैट करते और मेसेज को तुरंत डिलीट कर देते। गिरफ्तार छात्रों के आतंकी संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद से जुड़े होने की आशंका भी बेहद खतरनाक संदेश देती है। दुनिया के कुख्यात आतंकी संगठन आइएस ने 2016 में कश्मीर की पहचान एक ऐसी जगह के रूप में की थी जहां वह अपना विस्तार कर सकता है। उसने कश्मीर में ‘अंसार-उल-गज़ावत-उल-हिंद’ नाम के एक सशस्त्र संगठन ने अपनी मौजूदगी का एलान किया है।

दो साल पहले आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में अस्थिरता बढ़ी है और इस्लामिक स्टेट (आइएस) इसका फायदा उठा कर अपने पांव पसारने की कोशिशों में जुटा है। इसी सिलसिले में आइएस ने इलाके के युवाओं से संगठन से जुड़ने की अपील की है। आइएस की पत्रिका ‘रुमैया’ के उर्दू संस्करण के एक अंक में ‘कश्मीर के लोगों के लिए खलीफा की जमीन से संदेश’ शीर्षक से एक भी लेख छपा था जिसमें कश्मीर को इस्लामिक राज्य बनाने की घोषणा की है। ये मैगजीन ऐप टेलीग्राम पर जारी किया गया था। इसमें कश्मीर में मौजूद इस्लामिक स्टेट के सभी समर्थकों से एक बैनर तले आने की अपील की गई थी। कश्मीर घाटी में आइएस की मौजूदगी के बाद देश के अन्य इलाकों में रहने वाले कश्मीरी छात्रों से उसकी संपर्क की कोशिशें भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी चिंता का कारण है। इन घटनाओं बीच इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान की खुफियां एजंसी आइएसआइ ने भारत में अस्थिरता फैलाने के लिए इस्लामिक स्टेट से हाथ मिला लिया है। अंसार गजवत-उल-हिंद, अलकायदा के स्लीपर सेल के तौर पर काम करता है और उसे मजबूत करने के लिए आइएसआइ भारत के अन्य इलाकों में फैले अपने नेटवर्क के सहारे उसका सहयोग कर रही है। इस समय कोलकाता, नई दिल्ली, मुंबई, अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय सहित देश के कई राज्यों में स्थित विश्वविद्यालयों में कश्मीरी विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। कश्मीरियों के शिक्षा के ढांचे को नष्ट कर उन्हें मध्ययुग में धकेलने की पाकिस्तानी साजिश के बीच सरकार और सेना बच्चों की शिक्षा को लेकर प्रयत्नशील रही है। अनेक सरहदी इलाकों में सेना स्वयं के खर्च पर स्कूलों का संचालन कर रही है, जिससे कश्मीरी बच्चे बेहतर तालीम हासिल कर सकें। लेकिन, आइएसआइ अपनी योजनाओं को परवान चढ़ाने के लिए कश्मीरी बच्चों को शिक्षा से दूर रखना चाहती है। कश्मीर में आतंकियों के आह्वान और उनके पक्ष में शिक्षा संस्थान लगातार कई-कई दिनों तक बंद रहते हैं। शिक्षा का ढांचा चरमराने से युवा आतंकवाद की ओर बढ़ रहे हैं। इस समय स्थानीय पुलिस पर नौकरी छोड़ने का लगातार दबाव बनाया जा रहा है। इसी के तहत उन्मादियों ने कई पुलिसवालों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी है। कश्मीरी युवा, जो सेना में शामिल हुए हैं, उसमें से कुछ को इसी प्रकार निशाना बनाया गया है। यही नहीं, आइएसआइ भारत के अन्य इलाकों में पढ़ने वाले छात्रों को भी आतंक में धकेल देना चाहती है, जिससे कश्मीर में अस्थिरता बनी रहे। अब देश के दूरदराज के इलाकों में पढ़ने वाले कश्मीरी युवाओं के आतंक से जुड़ने की घटनाएं बेहद साजिश पूर्वक अंजाम दी जा रही हैं। शिक्षित युवाओं का उपयोग डिजिटल युग में खौफनाक आतंकी हमलों के लिए किया जा सकता है, इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

दुनिया भर में आतंकियों का प्रभाव बढ़ने में सोशल नेटवर्किंग साइटों की महत्त्वपूर्ण भूमिका सामने आ रही है। भारत में बुरहान वानी ने इसका खूब उपयोग किया था। इस समय आतंकी संगठनों के लिए यह अपने विस्तार का प्रमुख हथियार बन गया है। पढ़े-लिखे नौजवानों को जोड़ने के लिए आतंकी संगठन सोशल साइटों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इंटरनेट से परिचय करने, जानकारी हासिल करने और जोड़ने में बेहद आसानी होती है। आइएस ने लोन वुल्फ जैसे आत्मघाती हमलों को अंजाम देने के लिए सोशल नेटवर्किंग साईट का ही उपयोग किया है। इस साल दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा गांव के एक पेइंग गेस्ट से पकड़ी गई लड़की फार्मेसी की छात्रा थी, जो 26 जनवरी को किसी आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए ही निकली थी, लेकिन सजग खुफियां एजंसियों ने उसे धर दबोचा। तीन साल पहले यह लड़की महाराष्ट्र एटीएस के राडार पर तब आई थी , जब उसने लगातार सोशल साइटों पर आइएस से नजदीकियां बढ़ाना शुरू कर दिया था। फेसबुक, ट्विटर, व्हाटसऐप और टेलीग्राम जैसी सोशल साइटों से जुड़ कर यह लड़की आइएस में शामिल होना चाहती थी।
इस दौर में सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती डिजिटल दुनिया से उभरा आतंकवाद ही है जो इंटरनेट के जरिए बेलगाम होकर जानलेवा भी हो गया है। इसकी गिरफ्त में आने वाले अधिकांश उच्च शिक्षित युवा ही हैं। धर्म के आधार पर दिग्भ्रमित कर आइएस और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों ने युवाओं को खतरनाक लक्ष्यों की ओर मोड़ देने में महारत हासिल कर ली है। अलकायदा की पत्रिका ‘इंस्पायर’ में आतंकी हमलों के नुस्खों को आजमा कर दुनिया में कई आतंकी हमले हुए हैं, जबकि भारत में भी कई उच्च शिक्षित युवा सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकते थे, यदि इन्हें समय रहते पकड़ा नहीं जाता।

लेकिन यह खतरा बरकरार है। कश्मीर और देश के अन्य इलाकों में रहने वाले पढ़े-लिखे युवाओं को आतंकवाद से जोड़ने की आइएसआइ और अन्य आतंकी संगठनों की साजिश को नाकाम करने के लिए दीर्घकालीन उपाय आजमाने होंगे। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और धर्मनिरपेक्ष देश में युवाओं पर कट्टरता के प्रभाव को रोकना और उन पर लगातार नजर रखना कठिन है। इसलिए नौनिहालों को कट्टरता के प्रभाव से बचाने के लिए शिक्षा संस्थानों में काउंटर रेडीकलाइजेशन कार्यक्रम या आतंकी मनोदशा से मुक्त करने के कार्यक्रम लगातार चलाए जाने चाहिए। इसके साथ ही धर्म की उदार व्याख्या के लिए शिक्षा संस्थानों, मीडिया और सामाजिक संस्थानों में शिक्षकों, धमर्गुरुओं और विद्याथियों के लिए परिचर्चाओं का आयोजन होता रहना भी समय की मांग है। इस समय भारत में नेशनल टेक्नीकल रिसर्च आॅर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ), कंप्यूटर इमरजंसी रिस्पांस टीम और डिपार्टमेंट आॅफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी जैसी एजंसियां आतंकी संगठनों और आइएसआइ जैसे दिग्भ्रमित करने वाले संगठनों की काट ढूंढ़ रही हैं।
आतंक की आशंकाओं के बीच कश्मीरी छात्रों की शिक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित होना बेहद जरूरी है। उन्हें सामाजिक, कानूनी या राजनीतिक दृष्टि से प्राथमिकता मिलना देश के हित में है। हाल ही में अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के कश्मीरी छात्रों ने एक भावुक अपील कि है कि वे अपने माता पिता के सपने पूरे करने उच्च शिक्षा अर्जित करना चाहते हैं अत: उन्हें आतंकवादी या आतंकवादियों का हिमायती न समझा जाए। बहरहाल कश्मीर की अस्थिरता, उच्च शिक्षित युवाओं का आतंकवाद से जुड़ना और देश की आंतरिक सुरक्षा जैसे गंभीर सवाल सामने हैं।

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