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राजनीति: महामारी बनता कैंसर

भारत में यह रोग जिस तेजी से लोगों को अपना शिकार बना रहा है, उतनी तेजी से हम उसके उपचार की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार हर साल कैंसर के ग्यारह लाख नए मामले सामने आते हैं। इनमें से पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है और यह संख्या बढ़ती जा रही है। उत्तर भारत में कैंसर रोगियों की तादाद जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे लगता है कि इस क्षेत्र में इस रोग ने महामारी का रूप ले लिया है।

Author October 20, 2018 1:58 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की चेतावनी के अनुसार कैंसर के इस साल एक करोड़ अस्सी लाख नए मामले सामने आ सकते हैं और इनमें से छियानवे लाख लोगों की इससे मौत हो सकती है। यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बीमारी है। कैंसर पर शोध करने वाली डब्लूएचओ की विशेषज्ञ संस्था- इंटरनेशनल एजंसी फॉर रिसर्च आॅन कैंसर (आइएआरसी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर पांच में से एक पुरुष को कैंसर हो रहा है, जबकि महिलाओं के मामले में यह अनुपात हर छह में से एक है। भारत में 2018 में महिलाओं में कैंसर के पांच लाख सत्तासी हजार दो सौ उनचास और पुरुषों के पांच लाख सत्तर हजार पैंतालीस नए मामले आने की संभावना है। इनमें से सात लाख चौरासी हजार आठ सौ इक्कीस लोगों की मौत हो सकती है। उधर, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के शोध के अनुसार केरल, कर्नाटक, असम, मिजोरम, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज सामने आ रहे हैं। यहां कैंसर मरीजों की संख्या प्रति लाख करीब सौ से ऊपर चुकी है। जबकि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में यह आंकड़ा प्रति लाख करीब नब्बे है। इस समय देश में सबसे ज्यादा पेट, स्तन, मुंह और फेफड़ों का कैंसर हो रहा है। इस तरह से कुल मिलाकर देश कैंसर के टाइम बम पर बैठा हुआ है।

भारत में यह रोग जिस तेजी से लोगों को अपना शिकार बना रहा है, उतनी तेजी से हम उसके उपचार की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार हर साल कैंसर के ग्यारह लाख नए मामले सामने आते हैं। इनमें से पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है और यह संख्या बढ़ती जा रही है। उत्तर भारत में कैंसर रोगियों की तादाद जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे लगता है कि इस क्षेत्र में इस रोग ने महामारी का रूप ले लिया है। उत्तर प्रदेश में पिछले साल कैंसर रोगियों की संख्या एक लाख छियासी हजार छह सौ अड़तीस पाई गई थी और इनमें से इक्यासी हजार एक सौ इक्कीस की मौत हो गई। केंद्र और राज्य सरकारोें की ओर से कैंसर की रोकथाम के लिए उठाए जा रहे कदम नाकाफी हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के अनुसार रोगियों में हर साल दस फीसद की वृद्धि हो रही है। लखनऊ के कस्तूरबा गांधी मेडिकल कॉलेज में ही हर साल सात हजार से अधिक मुंह के कैंसर के मरीज आ रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की बदलती जीवन शैली जहां स्तन कैंसर को बढ़ावा दे रही है, तो धूम्रपान, प्रदूषित वातावरण के कारण फेफड़े के कैंसर के मरीज भी बढ़ रहे हैं। जीवन शैली के बाद प्रदूषण कैंसर के दूसरे बड़े प्रमुख कारण के रूप में सामने आया है। खासतौर से वायु प्रदूषण के कारण फेफड़े, सांस नली और गले के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर के मामले आ रहे हैं। स्वच्छता की जानकारी के अभाव में महिलाएं कई रोगों पर ध्यान नहीं दे पातीं और इनमें से कई बीमारियां कैंसर का कारण बन जाती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आर्सेनिक भी कैंसर का एक कारण बना हुआ है।

शरीर में विष बेल की तरह फैलने वाली यह बीमारी जिस तेजी से बढ़ रही है, वहीं इससे लड़ने और इस पर विजय पाने के चिकित्सीय उपाय भी दुनिया भर में हो रहे हैं। इस साल चिकित्सा का नोबल पुरस्कार भी कैंसर के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले अमेरिका के जेम्स एलिसन और जापान के तासुकु होंजो को दिया गया है। इन दोनों वैज्ञानिकों ने यह खोज की थी कि हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) किस तरह कैंसर से मुकाबला कर सकती है। इस खोज से त्वचा कैंसर के सबसे घातक प्रकार मेलेनोमा और फेफड़े सहित कई तरह के कैंसर के लिए नए और प्रभावी इलाज के विकास की राह खुली है। दोनों वैज्ञानिकों की मौलिक खोज कैंसर के खिलाफ लड़ाई की आधारशिला बनी। उन्होंने यह पता लगाया था कि रोगी की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली शीघ्रता के साथ कैंसर से मुकाबला कर सकती है। इस खोज से उन प्रोटीन को साधने के लिए उपचार विकसित किए गए, जिनकी उत्पत्ति कुछ प्रतिरोधी प्रणाली वाली कोशिकाओं द्वारा होती है। ये प्रोटीन कैंसर कोशिकाओं से बचाव में शरीर की स्वाभाविक प्रतिरक्षा में बाधक का काम करते हैं। भारत सहित दस देशों के वैज्ञानिकों की अलग-अलग टीमें कैंसर के जीनों के रहस्य जानने में जुटी हैं। कैंसर के मोर्चे पर कुछ दवाएं भी बनाई गई हैं। लेकिन ये दवाएं इतनी ज्यादा महंगी हैं कि साधारण मरीज के बूते के बाहर है इन्हें खरीदन पाना। ऐसे में ज्यादातर लोग कैंसर का इलाज करा भी नहीं पाते। उदाहरण के लिए, एक विदेशी कंपनी ने कैंसर के इलाज के लिए हर्सेप्टिन नामक दवा बनाई है, जिसकी एक खुराक की कीमत ही एक लाख तीस हजार रुपए है। दुनिया के विकासशील देशों की गरीब जनता आज भी इतनी मंहगी दवाओं से अपना इलाज कराने में सक्षम नहीं है। हालांकि भारतीय वैज्ञानिक कैंसर की सस्ती दवाइयां बनाने में जुटे हैं। प्रयोग के तौर पर देश के कई संस्थानों में इन पर परीक्षण चल रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने खाद्य पदार्थों की पोषक ऊर्जा से सस्ती दवा बनाने का दावा किया है।

जाहिर है, इलाज की तमाम सुविधाओं के बावजूद इस बीमारी पर हम लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। इस बीमारी के इलाज का महंगा होना भी एक बड़ी समस्या है। कीमोथेरेपी, रेडिएशनथेरेपी, बायोलाजिकल थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से कैंसर का इलाज होता है, लेकिन रोगी को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। अपने देश में गरीब मरीज यह कीमत नहीं अदा कर सकते हैं। इसके लिए सरकार रोगियों को कम कीमत पर सुविधाएं मुहैया कराकर उनकी मदद कर सकती है। इसके अलावा वैकल्पिक चिकित्सा की कुछ पद्धतियों को बढ़ावा देकर भी कैंसर रोगियों की जान बचाई जा सकती है। भारत में कोलकाता के जाधवपुर विश्वविद्यालय के नैदानिक अनुसंधान केंद्र (सीआरसी) ने पोषक ऊर्जा से तैयार की गई औषधि कापशुओं पर परीक्षण किया है और इसके परिणाम उत्साहजनक निकले हैं। अगर ऐसे ही परिणाम इसे मानव शरीर पर प्रयोग करने से मिलते हैं तो यह कैंसर उपचार के इतिहास में युगांतकारी घटना होगी। सीआरसी विभिन्न रोगों के लिए दवाइयों का नैदानिक परीक्षण करता है। किसी दवाई की प्रभावकारिता का स्तर सुनिश्चित करने के लिए सामान्यत: दो प्रकार का परीक्षण किया जाता है- पहला, औषधीय (फार्माकोलॉजिकल) परीक्षण और दूसरा विष विद्या संबंधी (टॉक्सीकोलॉजिकल) परीक्षण। ये परीक्षण आयातित सफेद चूहों पर किए गए। पशु शरीर में कैंसर कोशिकाओं को प्रविष्ट कराया गया और जब ट्यूमर निर्मित हो गया तब दवा देना शुरू किया गया। ‘पोषक ऊर्जा के परीक्षण की स्थिति में चौदह दिनों बाद जो प्रतिक्रियाएं देखी गर्इं उनमें कोशिकाओं की संख्या स्पष्ट रूप से कम होना शुरू हो गई थी। पशु शरीर में कोई अल्सर पैदा नहीं हुआ। ट्यूमर विकास दर छियालीस फीसद तक कम हो गई थी और दवा की विषाक्तता लगभग शून्य थी। ऐसे सकारात्मक परिणाम हाल के समय में नहीं देखे गए थे। कैंसर के मामले में रोकथाम अहम है। शुरू में ही कैंसर की पहचान हो जाए, इसके लिए प्रभावशाली नीतियां बनाकर उन्हें तुरंत अमल में लाने की जरूरत है।

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