X

राजनीति: नशे के दलदल में नौजवान

पंजाब जैसा ही हाल अब दूसरे पड़ोसी राज्यों का भी होने लगा है। अब जहां हिमाचल को ‘उड़ता हिमाचल’ की संज्ञा दी जाने लगी है, वहीं हरियाणा में भी पिछले छह सालों में नशे का सेवन करने वाले युवाओं की संख्या चार गुना बढ़ चुकी है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में भी नशेड़ियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।

योगेश कुमार गोयल

कभी देश के कृषि प्रधान राज्य के रूप में विख्यात पंजाब पिछले कई वर्षों से नशे के लिए ‘उड़ता पंजाब’ के रूप में बदनाम है, जहां नशे के जरिए युवाओं की नसों में जहर घोला जा रहा है। यह नशा न जाने कितनी ही जिंदगियां, कितने ही परिवार तबाह कर चुका है और अब तो नशे का यह घृणित कारोबार पंजाब की सीमाएं लांघ कर पड़ोसी राज्यों के युवाओं को भी लीलने लगा है। पंजाब के बाद अब देश के और राज्य भी नशे के तस्करों के निशाने पर हैं, जहां युवा दम पर दम मार रहे हैं और जिंदगी बर्बादी के मुहाने पर जा रही है। इन राज्यों में शराब, स्मैक, भांग, चरस, गांजा, अफीम, हेरोइन, भुक्की इत्यादि युवाओं के लिए किराने के सामान की तरह आसानी से सुलभ हो रहे हैं। यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां युवा पीढ़ी के भरोसे देश के विकास के स्वप्न देखे जा रहे हैं, वहीं यही युवा पीढ़ी नशे के दलदल में फंस कर अपना और देश का भविष्य अंधकारमय बना रही है। जाहिर है, अगर देश की युवा पीढ़ी ही नशे की गुलाम बन गई तो देश के विकास के उन सपनों का क्या होगा, जिन पर सरकारें भावी विकास का ढांचा खड़ा करना चाहती हैं। स्थिति कितनी चिंताजनक है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि देश में अंग्रेजों से गुलामी से मुक्ति के बाद बहुत बड़ी आबादी नशे की गुलाम हो गई है। आजादी के बाद से अभी तक देश में शराब की खपत साठ से अस्सी गुना बढ़ गई है, जबकि गरीबी रेखा से नीचे गुजारा कर रहे करीब सैंतीस फीसद लोग तो ऐसे हैं, जो नशे के आदी हैं और अपनी रोजाना की कमाई नशे में ही उड़ा देते हैं। नशा शुरू करने वाले युवाओं की औसत आयु देश में जहां पहले सोलह से अठारह वर्ष थी, वहीं अब यह तेरह से पंद्रह वर्ष हो गई है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कुछ समय पहले तक जहां स्कूल-कॉलेजों के किशोर और युवा ही नशे के तस्करों के निशाने पर थे, वहीं अब छात्राएं और महिलाएं भी नशे की आदी हो रही हैं। ऐसे में सहज कल्पना की जा सकती है कि जब देश की मातृशक्ति ही नशे के दलदल में धंसती जाएगी तो ऐसे परिवारों को नशे से कौन बचाने आएगा।

मां का दूध नवजात शिशु के लिए अमृत माना गया है। इसमें वे सभी पौष्टिक तत्त्व विद्यमान होते हैं, जिनकी शिशु को जरूरत होती है। लेकिन कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब देखा गया है कि नशे की आदी मां का दूध भी बच्चे के लिए जहर साबित होने लगा है। आर्थिक तंगी होने पर नशे की पूर्ति करने के लिए युवा प्राय: अपराधों की ओर रुख करते हैं। ऐसे युवाओं को लीवर, किडनी और कई अन्य गंभीर बीमारियां जकड़ लेती हैं और अंतत: ऐसे बहुत से युवा आत्महत्या जैसा कदम उठा कर मौत को गले लगा लेते हैं। एक ही सीरिंज से ड्रग्स लेने के चलते एचआइवी और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। नशे के मामले में पंजाब देश में पहले स्थान पर है, जहां हर तीसरा छात्र और हर दसवीं छात्रा नशा करने लगे हैं। राज्य में हर महीने एक सौ बारह लोग नशीले पदार्थों का शिकार होकर मौत के मुंह में समा रहे हैं। करीब पचास हजार लोग एचआइवी पीड़ित हो चुके हैं। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार राज्य में करीब नौ लाख लोग नशीली दवाओं का सेवन कर रहे हैं, जिनमें करीब साढ़े तीन लाख इसके आदी हो चुके हैं और नशा नहीं मिल पाने की वजह से पिछले दस वर्षों में करीब पच्चीस हजार लोग अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या कर चुके हैं। प्रतिदिन औसतन तीन लोग इसी वजह से आत्महत्या करते हैं। ये आंकड़े तो तब हैं जब खासकर ग्रामीण अंचलों में लोग बदनामी और पुलिस से बचने के लिए ऐसे मामले दर्ज ही नहीं कराते। स्थिति कितनी भयावह है, इसकी बानगी इसी से मिल जाती है कि जहां 2013 में देश के बाकी राज्यों में नशीले पदार्थों के कारोबार और अपराधों से जुड़े मामलों की संख्या चौदह हजार पांच सौ चौंसठ थी, वहीं अकेले पंजाब में यह संख्या पैंतीस हजार के करीब थी। विगत चार वर्षों में राज्य में करीब उनतालीस टन नशीले पदार्थ बरामद किए जा चुके हैं। प्रदेश के सामाजिक सुरक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2016 के अंत में जारी आंकड़ों के अनुसार पंजाब के गांवों में करीब सड़सठ फीसद घर ऐसे हैं, जहां कम से कम एक व्यक्ति नशे की चपेट में है।

पंजाब जैसा ही हाल अब दूसरे पड़ोसी राज्यों का भी होने लगा है। अब जहां हिमाचल को ‘उड़ता हिमाचल’ की संज्ञा दी जाने लगी है, वहीं हरियाणा में भी पिछले छह सालों में नशे का सेवन करने वाले युवाओं की संख्या चार गुना बढ़ चुकी है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में भी नशेड़ियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। हाल में महाराष्ट्र में सामने आया है कि मुंबई और ठाणे के करीब सत्तर कॉलेजों में गांजा तथा अन्य नशीले पदार्थों की मांग बढ़ी है। पिछले आठ महीने में वहां आठ हजार किलो से अधिक गांजा पकड़ा जा चुका है। यही वजह है कि पिछले दिनों नशे के सौदागरों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली और चंडीगढ़ सरकारों ने साझा अभियान शुरू करने का फैसला किया। उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर को भी इस साझा अभियान से जोड़ा जाना है। निश्चित रूप से इस प्रकार की मुहिम का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि नशा आज केवल एक राज्य की समस्या नहीं रहा है और न ही यह किसी खास भौगोलिक सीमा तक सीमित है, इसलिए कई राज्यों की साझा रणनीति के तहत इसकी जड़ों पर प्रहार करना ही अब समय की मांग भी है। अभी तक की यही नियति रही है कि नशे के खिलाफ हर राज्य द्वारा अपने-अपने स्तर पर जंग लड़ने के कोई सार्थक परिणाम हासिल नहीं हुए। पंजाब सहित कई राज्यों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमा, नेपाल आदि देशों से नशे की खेपें पहुंचाई जाती रही हैं और नशे के तस्करों का यह नेटवर्क पूरे देश में तेजी फैलता जा रहा है। नशे के इस काले कारोबार के फलने-फूलने में स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक तंत्र में मौजूद कुछ लोगों की मिलीभगत भी अहम भूमिका निभा रही है। ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें सख्त से सख्त दंड दिया जाना बेहद जरूरी है।

नशे के खिलाफ अभियान तभी सफल हो सकता है, जब प्रभावित राज्य एकजुट और सचेत होकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करें और इन सभी राज्यों का पुलिस-प्रशासन आपसी तालमेल बना कर इस दिशा में काम करे, क्योंकि किसी एक राज्य के बूते यह संभव नहीं। तमाम प्रयासों के बावजूद देशभर में नशीले पदार्थों की खपत और लत तेजी से बढ़ती गई है, ऐसे में नशा तस्करों के सिंडिकेट को तबाह करने के लिए सभी राज्यों के पुलिस-प्रशासन को भी अपना एक साझा तंत्र खड़ा करना होगा, ताकि ऐसे अपराधी किसी दूसरे राज्य में जाने पर भी कानून की पेचीदगियों का लाभ उठा कर बच न पाएं। इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जिन क्षेत्रों में नशीले पदार्थों की आसानी से आपूर्ति हो जाती है, वे इस संकट से ज्यादा जूझ रहे हैं। नशे के दलदल में फंस कर शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकलांग होती युवा पीढ़ी को इस नरक से बाहर निकालने के लिए बड़े जन-आंदोलन की जरूरत है। बेहतर होगा कि देश का हर जिम्मेदार नागरिक इस मुहिम में पुलिस-प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिला कर इस सामाजिक बुराई का समूल नाश करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करे। सिर्फ कानूनों के सहारे ऐसी गंभीर समस्याओं का समाधान कदापि संभव नहीं।