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राजनीति: औपनिवेशिक समझ में जकड़ा पर्यावरण

पश्चिमी पर्यावरणीय समझ भौतिकवाद पर टिकी है। वहां निर्जन जंगल और उद्योगों के विकास पर ज्यादा जोर दिया गया है। इसी भौतिकवादी समझ के कारण प्रकृति के जैविक महत्त्व पर ध्यान ही नहीं दिया गया। और यही समझ हमारे भी विनाश का कारण है। औपनिवेशिक काल से ही पर्यावरण को बचाने व बढ़ाने की समझ भौतिकवाद से प्रभावित रही है। प्राकृतिक संसाधनों को आर्थिक शब्दावली से जोड़ दिया गया। पर्यावरण के तात्कालिक फायदों पर ही ध्यान दिया गया।

Author Published on: July 19, 2018 1:46 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

प्रदीप श्रीवास्तव

पर्यावरण का मतलब क्या है? पेड़, पौधे, नदी, तालाब, समुद्र..। और पर्यावरण संरक्षण का मतलब पौधे लगाना और पानी बचाना। हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण की बस इतनी ही समझ है। हालांकि, वक्त के साथ पर्यावरण संरक्षण की परिभाषा काफी बदल गई है। लेकिन हमारी समझ पश्चिमी मीडिया की देन है जो कहीं न कहीं पर्यावरण का सबसे बड़ा दोषी एशिया के गरीब देशों को मानता है। पश्चिमी समझ उद्योगपतियों और पूंजीपतियों की पक्षधर है जो उद्योगों को बचा कर प्राकृतिक परिवेश की वकालत करती है। जबकि वस्तुस्थिति ठीक इसके उलट है। पर्यावरण के प्रति हमारी औपनिवेशिक समझ ने देश की नदियों को न सिर्फ प्रदूषित होने दिया, बल्कि धीरे-धीरे नदियां सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं। यही हालत सभी प्रकार के प्रदूषण के साथ हुई। देखते ही देखते कुछ दशकों के भीतर ही देश के सभी बड़े शहर गैस चैंबर में तब्दील हो गए हैं। कुछ के लक्षण दिख रहे हैं, जबकि कुछ के अभी दिखने बाकी हैं।

पर्यावरण को लेकर एशिया व अफ्रीका के देशों की पौराणिक कथाओं में आदि काल से मनुष्य व प्रकृति के बीच अंतर-संबंधों को दर्शाया गया है। सैकड़ों ऐसी कहानियां और घटनाएं हैं जो मनुष्य और प्रकृति के बीच के गहरे रिश्तों को बयां करती हैं। इनमें मनुष्य द्वारा जंगलों, नदियों और पहाड़ों को सहेज कर रखना और उनका उपयोग करना दोनों शामिल हैं। यह भारत की संस्कृति का हिस्सा है। गुरुकुल ऐसी ही परंपरा थी, जहां जंगलों के बीच पढ़ाई होती थी। छात्र-छात्राएं प्रकृति पर निर्भर रहते थे। वे लकड़ियां चुनते थे। फल तोड़ते और अपने आप को जिंदा रखने के लिए पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर थे। इसके लिए वे अंधाधुंध पेड़ों की कटाई नहीं करते थे। फसल उत्पादन के लिए जमीन को बंजर नहीं बनाते थे। यहां उन्हें प्रकृति के उपभोग और संरक्षण, दोनों की शिक्षा मिलती थी। देश में जंगल और सभ्यता की कहानी विकास के साथ घुली-मिली है। यहां वानप्रस्थ एक आश्रम है। जीवन के खास पड़ाव में गृहस्थ व्यक्ति वानप्रस्थ आश्रम को अपना लेता है। इसका अर्थ बहुत व्यापक है। इसमें व्यक्ति सामाजिक और प्राकृतिक कामों से जुड़ जाता है। रामचरित मानस का एक अध्याय ‘अरण्य कांड’ है, जब राम वनवास में हैं। ठीक इसके उलट, पश्चिमी पर्यावरणीय समझ भौतिकवाद पर टिकी है। वहां निर्जन जंगल और उद्योगों के विकास पर ज्यादा जोर दिया गया है। इसी भौतिकवादी समझ के कारण प्रकृति के जैविक महत्त्व पर ध्यान ही नहीं दिया गया। और यही समझ हमारे भी विनाश का कारण है। औपनिवेशिक काल से ही पर्यावरण को बचाने व बढ़ाने की समझ भौतिकवाद से प्रभावित रही है। प्राकृतिक संसाधनों को आर्थिक शब्दावली से जोड़ दिया गया। पर्यावरण के तात्कालिक फायदों पर ही ध्यान दिया गया। अंग्रेजों को इसकी जरूरत थी। पेड़ काटने के तात्कालिक फायदे ज्यादा हैं और वे दिखते भी हैं। कागज बन रहा है, रेल की पटरियां बिछाई जा रही हैं। जबकि दूरगामी नुकसान इससे कई सौ गुना ज्यादा हैं। लेकिन लूटने-खसोटने में माहिर अंग्रेजों को ऐसे चिंतन की जरूरत थी जो तात्कालिक फायदे की चर्चा करे, दूरगामी नुकसान को भूल जाए। हमने पर्यावरण को ऐसी वस्तु में बदल डाला, जिसका विक्रय मूल्य तय हो। यानी खनिज, जमीन, जल, जंगल, कार्बन, पानी हर चीज का एक मूल्य तय करने लगे हैं। जबकि ये अनमोल हैं। आजादी की लड़ाई के समय उभर रहे पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के समूह ने अपनी जरूरत के हिसाब से पर्यावरण की व्याख्या की, जो समाज में मांग पैदा करके किसी उत्पाद या वस्तु को स्थापित करने की सोची-समझी साजिश रही है।

दूर नहीं, अभी दो दशक पहले तक बोतलबंद पानी विलासिता की श्रेणी में था। उस समय देश के बड़े शहरों में ही बोतलबंद पानी मिलता था, जबकि आज देश के किसी भी कोने में यह उपलब्ध है। बोतलबंद पानी उन जगहों पर भी मिलने लगा है जहां इसकी रत्तीभर भी जरूरत नहीं है, बल्कि उल्टे वह वहां के पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। लोगों के बीच शुद्ध पानी को लेकर इस प्रकार से खौफ पैदा किया गया है कि वे परंपरागत जल स्रोतों से भी दूर होते जा रहे हैं। कुछ दिनों पहले कनाडा की यूनिवर्सिटी आॅफ वाटरलू के शिक्षकों व छात्रों ने बोतलबंद पानी को लेकर एक अध्ययन किया था। अध्ययन के अनुसार, जब हमें नल का अच्छी गुणवत्ता का पानी उपलब्ध रहता है, तब भी हम बोतलबंद पानी की तरफ आकर्षित होते हैं तो सिर्फ इसलिए कि विज्ञापन के जरिए यह स्थापित कर दिया गया है कि बोतलबंद पानी ही शुद्ध है। जबकि एक अध्ययन में पता चला है कि बोतलबंद पानी का अधिकतर प्रचार इंसान की मनोवैज्ञानिक संवेदनशीलता को गहराई से निशाना बनाता है और उन्हें किसी खास उत्पाद को खरीदने और उसके इस्तेमाल के लिए बाध्य करता है। इसी का परिणाम है कि देश में दिन-प्रतिदिन पानी को लेकर स्थिति खराब होती जा रही है। बुंदेलखंड जैसा इलाका, जहां की जल संचयन व्यवस्था विश्व की सबसे ज्यादा वैज्ञानिक व बेहतर व्यवस्था थी, उसे भी बर्बाद कर दिया गया। सूखा यहां की नियति बन गई है। एवरेस्ट पर प्लास्टिक की बोतलों का कचरा वहां के वातावरण के लिए परेशानी का बड़ा कारण बनने लगा है। कुछ समय पहले नीति आयोग ने एक रिपोर्ट जारी की। समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (सीडब्ल्यूएमआइ) नामक इस रिपोर्ट में देश में पानी की किल्लत की स्थिति का खुलासा किया गया। इसमें बताया गया है कि करीब साठ करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। वर्ष 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण की दोगुनी हो जाएगी और देश की जीडीपी में छह प्रतिशत की कमी देखी जाएगी। करीब दो लाख लोग स्वच्छ पानी न मिलने के चलते हर साल जान गंवा देते हैं। यह संकट आगे और गंभीर होने जा रहा है। करीब सत्तर प्रतिशत प्रदूषित पानी के साथ भारत जल गुणवत्ता सूचकांक में एक सौ बाईस देशों में एक सौ बीसवें पायदान पर है। रिपोर्ट में जल संसाधनों और उनके उपयोग की समझ को गहरा बनाने की आसन्न आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

दरअसल, पर्यावरण को लेकर हमारे देश में वैज्ञानिक व नैसर्गिक दृष्टिकोण का शुरू से ही अभाव रहा है। इसी कारण से नैसर्गिक जंगल की सोच को विकसित ही नहीं होने दिया गया। प्राकृतिक वन रहस्यमय और खूंखार होते हैं, वहां इनसान के लिए कोई जगह नहीं, ऐसी सोच बना दी गई है। साथ ही वनों के उपयोग पर जोर दिया गया। इसका सबसे ज्यादा ज्वलंत उदाहरण है वन विभाग की कार्यशैली। वन विभाग आजादी के पूर्व से ही वनों को लेकर कार्य योजनाएं बनाता है, जिसके अनुसार ही वनों की देखभाल और उपयोग आदि के नियम कानून तय होते हैं। विभाग ने सतपुड़ा के जंगलों को लेकर कार्ययोजना बनाई। इसमें प्राकृतिक जंगलों को ‘शूद्र वन’ की श्रेणी में रखा गया, क्योंकि ये वन इमारती लकड़ी से भरपूर नहीं थे। इसमें हजारों तरह की दूसरी भी वनस्पतियां व जीव-जंतु थे। हालांकि प्रकृति में घास की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण मानी जाती है जितनी किसी लंबे चौड़े बरगद की। सामाजिक सोच या बनावट ही वस्तुओं या सेवाओं का भौतिक मूल्य तय करती हैं, जबकि प्रकृति में यह सोच नहीं है। इसीलिए बाद में इन्हें बिगड़े वन के तौर पर दस्तावेजों में दर्ज किया गया। फिर इन्हीं वनों को ‘निम्न वन’ कहा जाने लगा। और जब दुनिया में जैव विविधतता जैसी अवधारणा का महत्त्व स्थापित हुआ, तब जाकर इन वनों को हाल ही में ‘मिश्रित वनों’ की श्रेणी में शामिल किया गया। असल में औपनिवेश काल में ही वन विभाग की स्थापना कर दी गई, जिसकी सोच अंग्रेजों की थी। वे वनों का भी पूरी तरह से शोषण करना चाहते थे। इसीलिए वन विभाग का मूल काम नैसर्गिक जंगलों को खत्म करके कृत्रिम वनों में तब्दील करने का रहा है।

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