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राजनीति: बचपन को बचाने की चुनौती

आज स्थिति यह है कि नगरों व महानगरों के पेशेवर कामकाजी परिवार नौकरी और काम के दबाव में तनाव से जूझ रहे हैं। उनके पास बच्चों से संवाद का समय ही नहीं है। बच्चों के बारे में उनकी राय है कि वे जल्दी बड़े होकर समझदार बन जाएं और तितलियों के रंगों, परियों की कहानियों और आसमान के तारों जैसी बातें न करें। वे तुरत-फुरत कंप्यूटर की भाषा जान जाएं और गणित का जोड़-घटाना सीख कर विजेता की कतार में आ जाएं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

इन दिनों सेवा क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है। इसी के साथ कामकाजी परिवारों की तादाद भी तेजी से बढ़ी है। एकल परिवारों का जमाना आ गया है। एकल परिवारों के विस्तार से नुकसान यह हो रहा है कि पेशेवर पति-पत्नी बच्चों की देखभाल के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। यही वजह है कि ऐसे परिवारों में पलने वाले बच्चों से संवाद की कमजोरी के चलते उनका बचपन सिसक रहा है और उनके सीखने-सिखाने की प्रक्रिया बाधित हो रही है। इतना ही नहीं, ऐसे परिवार के बच्चों की कल्पना शक्ति लगातार कमजोर पड़ रही है। माता-पिता से उनका संवाद भी काफी कमजोर पड़ रहा है। आज ज्यादातर परिवारों में दादा-दादी व नाना-नानी नए जमाने के अनुसार ऐसे परिवारों में तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं। कई परिवारों में उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया गया है। सच्चाई तो यह है कि उनके लिए एकल घरों के आंगन अब बहुत छोटे पड़ने लगे हैं। शायद यही वजह है कि इस समय पुरानी और नई पीढ़ी के बीच फासला बढ़ता जा रहा है।

पुरानी और नई पीढ़ी के बीच संवाद की शून्यता का भारी नुकसान बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। एकल परिवारों में न तो बच्चों के नैसर्गिक मां-बाप ही उन्हें ठीक से पाल-पोस रहे हैं, न ही बड़े-बुजुर्गों का स्नेह मिल पा रहा है। नगरों और महानगरों में एकल परिवारों के बच्चों के पालने-पोसने की समस्या का हल क्रैच यानी पालनाघरों, डे-बोर्डिंग और प्ले स्कूल में तलाश लिया गया है। लेकिन यह कटु सत्य है कि ऐसे एकल परिवारों के बच्चों को सहारा देने वाली ये संस्थाएं अब एक बड़े कारोबार में तब्दील हो चुकी हैं। इन संस्थाओं में बच्चों के प्रति संवेदनशील कर्मचारी न होने से बच्चों के साथ ममत्व, प्रेम और वात्सल्यपूर्ण व्यवहार के बजाय उनसे खराब व्यवहार के ढेरों मामले सामने आए हैं। इतना ही नहीं, ऐसी जगहों पर रहने वाले बच्चों को देर तक सोने के लिए हल्का नशा तक दे दिया जाता है। शायद इन बच्चों के अभिभावकों को इतना समय ही नहीं है कि वे इन सस्ंथाओं की इन तल्ख सच्चाइयों को जान भी सकें। इसमें कोई संदेह नहीं कि मध्य वर्ग, खासतौर पर कामकाजी एकल परिवारों में अपने बच्चों को पालनाघरों और डे-बोर्डिंग स्कूलों में भेजने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इन पालनाघरों में छह साल तक के बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार माहौल उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। तीन साल तक की आयु के बच्चों को प्ले वे लर्निंग के माध्यम से और उसके बाद उन्हें किताबी ज्ञान से रू-ब-रूकराया जाता है।

परंतु देखने में आ रहा है कि इन संस्थाओं में भारी-भरकम रकम वसूलने के बाद भी बच्चों के हितों से जुड़े कायदे कानूनों की अनदेखी वहां आम बात हो गई है। कहना न होगा कि एकल कामकाजी परिवारों ने अपने बच्चों को इन क्रैच में भेजना शुरू तो कर दिया है, परंतु वहां किसी भी प्रकार का निगरानी तंत्र न होने से दो प्रकार के नुकसान सीधे-सीधे दिखाई पड़ रहे हैं। एक तो यह कि बच्चों में कितना गुणात्मक विकास हो रहा है, इसकी जानकारी न तो इन संस्थाओं के पास है और न ही उन बच्चों के अभिभावकों के पास है। दूसरे, इन पालनाघरों के बच्चे अपने मां-बाप के नैसर्गिक प्रेम-वात्सल्य से वंचित हो रहे हैं। देखने में आ रहा है कि इन कामकाजी बच्चों के मां-बाप सुबह जब घर से दफ्तर के लिए निकलते हैं तो सोए हुए बच्चे को क्रैच में छोड़ते हैं। साथ ही, जब वे देर शाम को हारे-थके दफ्तर से लौटते हैं, तब भी वे क्रैच से सोये हुए बच्चे को लेकर ही घर लौटते हैं। ऐसे में कामकाजी माता-पिता के पास इतना समय ही नहीं बचा है जो वे बच्चे को अपने सीने से लगा सकें। सच तो यह भी है कि ऐसे विशुद्ध एकल परिवारों में बच्चा कभी-कभी अब भार भी लगने लगा है। बाल मनोविज्ञान बताता है कि बच्चों के विकास की सबसे संवेदनशील अवधि पांच साल की उम्र होती है। यह वह अवस्था है जब वह परिवार और दुनियावी जिंदगी के बीच तालमेल बैठाता है। शायद यही वह समय है जब परिवार, समाज, प्रकृति, मूल्य, परंपराएं और रिश्ते-नाते उसके भविष्य की दिशा तय करते हैं।

पिछले दिनों ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की ओर से कराए गए शोध के नतीजों से यह बात सामने आई है कि जो मां-बाप अपने बच्चों से सीधे संवाद नहीं रखते, ऐसे बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। साथ ही, वे कामयाबी की दौड़ में भी पिछड़ जाते हैं। परंतु आज स्थिति यह है कि नगरों व महानगरों के पेशेवर कामकाजी परिवार नौकरी और काम के दबाव में तनाव से जूझ रहे हैं। उनके पास बच्चों से संवाद का समय ही नहीं है। बच्चों के बारे में उनकी राय है कि वे जल्दी बड़े होकर समझदार बन जाएं और तितलियों के रंगों, परियों की कहानियों और आसमान के तारों जैसी बातें न करें। वे तुरत-फुरत कंप्यूटर की भाषा जान जाएं और गणित का जोड़ घटाना सीख कर विजेता की कतार में आ जाएं। शायद यही वजह है कि इन सब माध्यमों ने बच्चों के कल्पनालोक और उनके यथार्थ में घालमेल करते हुए उन्हें आक्रोश, अश्लीलता और हिंसा के केंद्र में लाकर रख दिया है। आक्रामकता, गुस्सा व हिंसा जैसे नकारात्मक तत्त्व अब बच्चों के व्यक्तित्व में तेजी से घर कर रहे हैं। स्कूल व घर की व्यवस्था में धीरे-धीरे एक आक्रोश अपनी पैठ बना रहा है। इस सच्चाई को न तो ये पालनाघर और न ही इस शिक्षा व्यवस्था के संरक्षणकर्ता ही समझ पा रहें हैं।

दरअसल, परिवार का विधिवत समाजीकरण जो बच्चों के व्यक्तित्व को एक संरक्षण प्रदान करता रहा है, उस सीख के धीरे-धीरे कम होने से बच्चों के व्यक्तित्व में ये विकार पैदा हो रहे हैं। परिवार में बच्चों को संरक्षण, वात्सल्य व स्नेह का भाव जहां उन्हें सामूहिक सोच व आपसी जुड़ाव वाला बनाता है, वहीं यह समाजीकरण उन्हें सामाजिक सुरक्षा और संरक्षण भी देता है। इसके अभाव में बच्चे या तो पलायनवादी बनते जाते हैं, या फिर तनाव व अवसाद के शिकार हो जाते हैं। इसी का नतीजा है कि बच्चे परीक्षाओं, खेल या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने पर या अपने किसी साथी से झगड़ा हो जाने पर बहुत जल्दी आपा खो बैठते हैं। तमाम ऐसी घटनाएं देखने में आई हैं जिनमें ऐसे गुस्से की पराकाष्ठा में ही बच्चों ने या तो अपने साथी की हत्या कर डाली, या खुद आत्महत्या कर ली। इस समय भविष्य की वैश्विक जरूरतों और वर्तमान की प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए बाल मनोविज्ञान को समझना बेहद जरूरी है। आज वक्त की जरूरत यह है कि कामकाजी मां-बाप बच्चे के समय को समाजीकरण की प्रक्रिया में खुद पिरोएं। आज तेजी से उभरती सच्चाई यह भी है कि बच्चों को ममतामयी वटवृक्षी छांव देने वाले दादा-दादी व नाना-नानी अब परिवारों से तकरीबन अदृश्य हो रहे हैं। क्रैच और डे बोर्डिंग स्कूल बच्चों को थोड़ा सुरक्षा कवच तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन परिवारों के बुजुर्गों का स्थान नहीं ले सकते। ध्यान रहे, बच्चों की बहुत ही संवेदनशील उम्र को अगर पैसे के बलबूते समाजीकृत करने का प्रयास किया जाएगा तो उनके व्यक्तित्व में संवेदनशून्यता स्थान बनाने लगेगी। यह कार्य तो बच्चों से संवाद बना कर और उन्हें अपने भावनात्मक आंचल व वात्सल्य का आवरण प्रदान करके खुद ही करना होगा। कामकाजी माता-पिता के सामने अपने बच्चों के बचपन को बचाने की यही सबसे बड़ी चुनौती है।

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