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राजनीति: नैतिक बोध हो शिक्षा का आधार

शिक्षा से नैतिकता को निष्कासित कर दिया गया है। आर्थिक समृद्धि को शिक्षा से जोड़ने की कवायद जारी है। क्या छीनना है की होड़ में, क्या समर्पित करना है, इतना उपेक्षित तत्त्व हो गया है कि शिक्षा, भौतिक उपलब्धियों के उपदान के अतिरिक्तकोई महत्त्व नहीं रखती है। शिक्षा को विवेक-सम्मत फैसले लेने की समझ पैदा करने का सर्वाधिक ग्राह्य साधन बनना चाहिए, इस तथ्य को भूल कर हम भटक रहे हैं।

Author May 26, 2018 3:35 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

भगवान अटलानी

स्वतंत्रता के बाद राजनीति का वर्चस्व और सत्ता का दखल सामान्य भारतीय के जीवन में बढ़ता ही गया है। हमें क्या खाना है, क्या पहनना है, कैसे जीवन-यापन करना है और कैसा व्यवहार करना है, ये और इस प्रकार के बिंदु ऊपर से राजनीति से प्रभावित प्रतीत नहीं होते। मगर थोड़ा-सा भी गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा कि हमारी हर गतिविधि को राजनीति नियंत्रित कर रही है। समस्या तब होती है जब सोच और चिंतन प्रक्रिया भी राजनीति से संचालित होने लगती है। पाठ्यक्रम, पाठ्य सामग्री, शिक्षण और परीक्षा पद्धति का स्वरूप राजनीतिक सत्ता निर्धारित करती है। बच्चों, किशोरों, वयस्कों और वैचारिक दिशा के निर्माण के लिए उत्तरदायी सभी व्यक्तियों को किस तरह सोचना है, यह फैसला राजनीति करती है। इतिहास का पुनर्लेखन करने के सफल-असफल आंशिक-समग्र, छोटे-बड़े प्रयास इस तरह किए जाते हैं जैसे अंतिम सत्य अब उजागर हो रहा है। पूर्व में जो पाठ्य सामग्री विद्यार्थियों को पढ़ाई जाती थी, झूठ का पुलिंदा थी। जो कल पढ़ा था और जो आज पढ़ने के लिए दिया जा रहा है, कई बार दोनों उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव महसूस होते हैं। ऐसे में विभ्रम का कुहासा मासूम मस्तिष्कों को घेरने लगता है। शिक्षा क्षेत्र के साथ निरंतर होता खिलवाड़ इस रीति-नीति का सर्वाधिक खतरनाक पहलू बन कर उभरता है। निश्चित योजनानुसार कार्यक्रम बना कर रोबोट निर्माण का सिलसिला जारी है। नासमझ बचपन की बुद्धि को विद्यालय नामक कारखाने में मनमाने आकार में ढालने की कोशिश में शल्यक्रिया होती है। आधारभूत मूल्यों के स्थान पर अकुशल मस्तिष्कों की कलाबाजियां करतब दिखाती हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनी में आकर्षक वेतन वाली नौकरी हासिल करना जीवन का चरम उद््देश्य बन जाता है। ऐसा तभी हो सकता है जब डिग्रियों के साथ कार्यकुशलता विकसित हुई हो। भौतिक सुख प्राप्ति की गलाकाट महत्त्वाकांक्षा में आत्म-विकास की भावना धराशायी हो जाती है। रिश्ते-नाते, मित्र-स्नेही, ऐसे सभी अपने, तथाकथित प्रगति के अंधड़ में तिनके बन जाते हैं। अर्थ, सुविधाएं और चकाचौंध भीतर की दुनिया को लील जाते हैं। शिक्षा से नैतिकता को निष्कासित कर दिया गया है। आर्थिक समृद्धि को शिक्षा से जोड़ने की कवायद जारी है। क्या छीनना है की होड़ में, क्या समर्पित करना है, इतना उपेक्षित तत्त्व हो गया है कि शिक्षा, भौतिक उपलब्धियों के उपदान के अतिरिक्तकोई महत्त्व नहीं रखती है।

इस सत्य को स्वीकार करने वाले भी मानेंगे कि माता-पिता के प्रति कर्तव्य भाव को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। संतान के जन्म से लेकर, शिक्षा-दीक्षा, भौतिक-मानसिक-संस्कारजनित गठन के लिए माता-पिता अपना सब कुछ होम कर देते हैं। कष्ट उठा कर, कठिनाइयां झेल कर, झंझावातों से मुकाबला करते हुए वे बच्चों को सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करते हैं। शिक्षा में माता-पिता के प्रति नैतिक दायित्व का कोई स्थान नहीं है, परिणामस्वरूप उम्र और ओहदे के साथ जनक-जननी को उपेक्षा की गर्त में ढकेलने का क्रम आरंभ हो जाता है। वे बोझ महसूस होने लगते हैं। सामाजिक रुतबे में बाधक प्रतीत होते हैं। उनका होना, अपने होने को कमतर बनाने जैसा लगता है। कई बार सूट पहनने और टाई बांधने वाला बेटा, धोती-कुर्ता पहनने वाले पिता को बाहरी व्यक्तियों के सामने घर का नौकर तक बता देता है। माता-पिता को सम्मान देने की शिक्षा किसी विद्यालय ने नहीं दी, इसलिए ऐसा करते हुए वह अपराध बोध से ग्रस्त नहीं होता है। जिनके लिए संभव है, ऐसे माता-पिता वृद्धावस्था में आर्थिक निर्भरता की दृष्टि से सजग होते हैं। पेंशन मिलती हो, ब्याज से रकम आती हो या संपत्ति से किराये की आमदनी हो, अपनी आवश्यकताएं पूरी करना उनके लिए सुगम होता है। नौकरी करने वाली बहू को सास में नजर आने वाली आया, आर्थिक स्थिति, प्रतिमाह होने वाली आमदनी और संपत्ति के कारण कई बार संतान की रुचि माता-पिता को साथ रखने में होती है। एक छत के नीचे जरूर रहते हैं, लेकिन बच्चे उनसे गपशप नहीं करते, साथ घूमने-घुमाने नहीं ले जाते, मित्रों से परिचय नहीं कराते, दुख-सुख की चर्चा नहीं करते, स्वास्थ्य की जानकारी नहीं लेते और जरूरी होने पर भी कम से कम समय उनके साथ गुजारते हैं। कहने के लिए साथ रहते हैं, दरअसल वे माता-पिता के मानसिक संताप को बढ़ाते हैं। नैतिक पाठ नहीं पढ़ाया गया, इसलिए कर्तव्य के स्थान पर उनके मानस में लाभ होता है। आज तो मिल ही रहा है, कल भी मिलेगा, यह सोच कर वे उतना करते रहते हैं कि जितना जरूरी है। न उससे कम, न उससे ज्यादा।

शिक्षा में दायित्व भाव के नैतिक पाठ के अभाव में पोतों-पोतियों की दुनिया से दादा-दादी नदारद होते हैं। परिणामत: बुजुर्गों के हिस्से में मात्र सूनापन आता है। यही कारण है कि उम्रदराज लोगों के मनोरंजन के लिए मोबाइल व कंप्यूटर की जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए बड़े शहरों में प्रशिक्षण केंद्रों का व्यापार पांव पसारने लगा है। छोटे बार-बार पूछने पर झुंझलाते हैं, इसलिए दादा-दादी उन प्रशिक्षण केंद्रों में भुगतान करके सीखना बेहतर समझते हैं। शिक्षा में नैतिक ज्ञान का समावेश न होने के कारण संपन्न हों या विपन्न, सभी वर्गों में असंतोष बढ़ रहा है। परिवार के वृद्धों से बढ़ती दूरियों ने वृद्धाश्रमों की संख्या में तेजी से वृद्धि की है। जो भुगतान करने की स्थिति में हैं, सभी सुविधाओं से युक्त वातानुकूलित वृद्धाश्रमों में जीवन के अंतिम वर्ष व्यतीत करते हैं। आर्थिक संदर्भों में पिछड़े वृद्धों को सरकार या ट्रस्टों की ओर से संचालित वृद्धाश्रमों का सहारा लेना पड़ता है। जब विश्व सभ्यता अंधकार में डूबी थी, भारत की चिंतन मनीषा समाज के लिए ऐसे मानदंड निरूपित कर रही थी जिनसे सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष को उचित मार्ग पर निर्देशित करना संभव था। व्यष्टि से समष्टि के कल्याण की अवधारणा, पृथ्वी पर उपलब्ध को भोग की वस्तु न मानने की दृष्टि, सर्वजन हिताय के नहीं अपितु सर्वजीव हिताय के सूत्र मात्र प्रतिपादित न करना, उन्हें संस्कारों का अंग बनाना, उसके मूलाधार नैतिकता को अपनी शिक्षा से तिरोहित करके अंतत: हम किसका उत्थान करना चाहते हैं? नैतिकता को शिक्षा तंत्र से बाहर निकाल कर हम उन सुस्थापित परंपराओं को ध्वस्त करने पर आमादा हैं जिनके कारण भारत आज भी भारत है। वस्तुत: भारतीय चिंतन की अवधारणा के विपरीत अब परिवार का अर्थ केवल स्वयं, पत्नी और बच्चों तक संकुचित होकर रह गया है। संयुक्त से विस्तारित और विस्तारित से एकल परिवार की स्वीकृति, पूरे ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रही है।

शिक्षा को विवेक-सम्मत फैसले लेने की समझ पैदा करने का सर्वाधिक ग्राह्य साधन बनना चाहिए, इस तथ्य को भूल कर हम भटक रहे हैं। मनुष्य को सींग-पूंछ रहित जानवर बनाने वाली शिक्षा पद्धति के कारण समाज, देश और संभवत: विश्व उस गर्त में जाने को उद्यत प्रतीत होता है जिसमें से बाहर निकलना अत्यंत दुष्कर है। समय चीख-चीखकर चेतावनी दे रहा है। सचेत नहीं हुए तो हमारी शिक्षा व्यवस्था नैतिक मूल्यों के संकट का जरिया बन जाएगी। भीतर की आवाज को जब तक बाहर नहीं लाती, तब तक शिक्षा वांछित कार्य करती नहीं मानी जाएगी। सुस्वादु भोजन, भौतिक सुविधाओं, धन-संपत्ति का विपुल अर्जन करने की प्रतिस्पर्द्धा को शिक्षा की तात्कालिक या अंतिम परिणति मानना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। चिंतन, योजना और कार्यान्विति की फौरी जरूरत को शिक्षा हितैषियों ने अगर अब भी अहमियत नहीं दी तो तंद्रा में सोता-जागता विवेक गहन निद्रा में डूब जाएगा।

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