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राजनीति: आत्महत्या की प्रवृत्ति और समाज

इसमें कोई शक नहीं कि बीते बरसों में बड़े शहरों में आबादी का दबाव तेजी से बढ़ा है। दूर-दराज के गांवों-कस्बों से लोग रोजगार और बेहतरी जिंदगी की तलाश में यहां आकर बस रहे हैं। लेकिन घर-परिवार छोड़ यहां आ बसे लोगों को बुनियादी सुविधाएं जुटाने के लिए भी कड़ा संघर्ष पड़ता है। निसंदेह ऐसे लोगों में बड़ी संख्या युवाओं की ही होती है। अफसोस कि बेहतर भविष्य बनाने के लिए घर से निकले बच्चे कई बार हालात से हार जाते हैं और ऐसा अतिवादी कदम उठा लेते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

दुनिया के सबसे युवा देश कहे जाने वाले भारत में युवाओं की आत्महत्या के ताजा आंकड़े भयभीत करने वाले हैं। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल (एनएचपी) की इस साल की रिपोर्ट में खुदकुशी से जुड़े जो आंकड़े दिए गए हैं, उनके मुताबिक वर्ष 2000 से 2015 के बीच आत्महत्या की घटनाओं में तेईस प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2015 में एक लाख तैंतीस हजार से ज्यादा लोगों ने खुदकुशी की, जबकि 2000 में ये आंकड़ा केवल एक लाख आठ हजार के करीब था। आत्महत्या करने वालों में तैंतीस प्रतिशत लोगों की उम्र तीस से पैंतालीस साल के बीच और करीब बत्तीस प्रतिशत लोगों की उम्र अठारह से तीस साल के बीच थी। यह वाकई चिंतनीय है कि जो पंद्रह साल देश में कई तरह के नवाचार और बदलाव के साक्षी बने, उन्हीं वर्षों में मानवीय जीवन की दुश्वारियां भी इतनी बढ़ीं कि नई पीढ़ी जिंदगी से ही मुंह मोड़ रही है। ऐसे में इन आंकड़ों का बेहद चिंतनीय पक्ष यह है कि भविष्य में स्थिति और भी भयावह होने के संकेत हैं।

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गौरतलब है कि बीते डेढ़ दशक में भारत हर क्षेत्र में बेहतरी की ओर ही बढ़ा है। इनमें वैज्ञानिक उपलब्धियां भी हैं और सामाजिक मोर्चे पर आए बदलाव भी। बावजूद इसके आत्महत्या के ये आंकड़े जीवन में सुविधाओं के बढ़ने के साथ ही संवेदनशीलता के घटने की भी बानगी हैं। विकास की दौड़ में मानवीय भावनाओं को समझने में पिछड़ने की बानगी हैं। साथ ही इस ओर भी इशारा करते हैं कि हाल के वर्षों में हमारी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था में आए बदलाव भी भावनात्मक टूटन की ओर धकेलने वाले ही हैं। अफसोस कि ये उलझनें अब और विस्तार पा रही हैं। शायद यही वजह है कि इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि खुदकुशी करने की प्रवृत्ति अब पुरुषों में ज्यादा देखी जा रही है। एनएचपी के आंकड़ों के मुताबिक भी इन वर्षों में जीवन से हारने वालों में पुरुषों की गिनती महिलाओं से कहीं ज्यादा है। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2015 में इनक्यानवे हजार से ज्यादा पुरुषों ने खुदकुशी की थी। यह आंकड़ा खुदकुशी करने वालों के कुल आंकड़े अड़सठ प्रतिशत से भी ज्यादा है, जबकि खुदकुशी करने वाली महिलाओं की गिनती बयालीस हजार से कुछ ज्यादा थी। यह आंकड़ा खुदकुशी करने वालों की कुल गिनती का साढ़े इकतीस प्रतिशत है। यह कहना गलत नहीं होगा कि कभी महिलाओं के हिस्से आने वाली अकेलेपन और अवसाद जैसी समस्याएं अब पुरुषों की जिंदगी में भी आ धमकी हैं। ऐसे में पुरुषों की खुदकुशी के आंकड़ों का ज्यादा होना हर इंसान के लिए बढ़ती जद्दोजहद की ओर इशारा करता है। ये नए आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा एक हजार दो सौ तीस युवाओं ने आत्महत्या की थी। दूसरे नंबर पर तमिलनाडु और तीसरे पर छत्तीसगढ़ है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु दो ऐसे राज्य हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों की श्रेणी में आते हैं। यहां देश के दूसरे राज्यों के लोग भी रोजगार की तलाश में आते हैं। ऐसे में इन दो प्रांतों में युवाओं के जिंदगी से हारने के ये आंकड़े महानगरीय जीवन में बढ़ रहे मानसिक तनाव और भागदौड़ के बीच आर्थिक प्रगति के दवाब को भी दिखाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि बीते बरसों में बड़े शहरों में आबादी का दबाव तेजी से बढ़ा है। दूर-दराज के गांवों कस्बों से लोग रोजगार और बेहतरी जिंदगी की तलाश में यहां आकर बस रहे हैं। लेकिन घर-परिवार छोड़ यहां आ बसे लोगों को बुनियादी सुविधाएं जुटाने के लिए भी कड़ा संघर्ष पड़ता है। निसंदेह ऐसे लोगों में बड़ी संख्या युवाओं की ही होती है। अफसोस कि बेहतर भविष्य बनाने के लिए घर से निकले बच्चे कई बार हालात से हार जाते हैं और ऐसा अतिवादी कदम उठा लेते हैं।

विचारणीय तो यह है कि हमारी मेहनतकश पीढ़ी के लिए आज भी सुरक्षित भविष्य एक सपना ही है। यही वजह है कि युवाओं में आत्महत्या की बड़ी वजह बेरोजगारी भी है। रिपोर्ट बताती है कि बेरोजगारी के कारण देश में करीब ढाई हजार से ज्यादा और पेशेवर जीवन में हताशा के चलते सोलह सौ से ज्यादा लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी।
दरअसल, मौजूदा दौर में अनगिनत परेशानियों से जूझ रहे युवा मानसिक द्वंद्व और सामाजिक विरोधाभासों का शिकार हो रहे हैं। कहीं अकादमिक स्तर पर सबसे आगे रहने की दौड़ है, तो कहीं सामाजिक रीति-नीति के बंधनों से मुठभेड़ करने की विवशता है। एनएचपी के आंकड़ों के अनुसार साल 2015 में परीक्षाओं में असफल होने के कारण दो हजार छ सौ से ज्यादा नौजवानों ने आत्महत्या की थी। यह नई पीढ़ी की नंबर रेस में अव्वल रहने जद्दोजहद को बताने वाले आंकड़े हैं। जबकि ऐसी ही कुछ उलझनें सामाजिक-पारिवारिक स्तर भी जड़ें जमाए हुए हैं, जिनमें सिर्फ आगे नहीं निकलने, बल्कि पुरानी परंपराओं को ढोने की विवशता भी जान देने का कारण बनी है। आंकड़े बताते हैं कि प्रेम प्रसंग के कारण करीब साढ़े हजार लोगों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली। आज भी हमारे यहां युवाओं के अपनी शादी और जीवन साथी के चयन से जुड़े फैसलों की स्वीकार्यता नहीं है। आमतौर पर देखने में आता है कि ऐसे बच्चों को न तो परिवार का सहयोग मिलता है और न ही सामाजिक स्वीकार्यता। यही वजह है कि सम्मान के नाम पर होने वाली घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। वैश्विक स्तर पर सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक और अकादमिक मुद्दे हैं जो आमजन की जिंदगी को घेर रहे हैं। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में तो जीवन से जुड़े संघर्ष को मुश्किल बनाने वाले ऐसे मुद्दे और भी ज्यादा हैं। नतीजतन ऐसे कई कारण समग्र रूप में युवाओं में आत्महत्या के आंकड़े बढ़ा रहे हैं।

हर साल दुनिया भर में करीब आठ लाख लोग आत्महत्या कर रहे हैं। बावजूद इसके विश्व स्वास्थ्य संगठन के मेंटल हेल्थ एटलस, 2017 मुताबिक बहुत कम देशों में आत्महत्या से बचाव के लिए योजना या रणनीति तैयार की गई है। हमारे देश में तो मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी जागरूकता की कमी है। जबकि करीब पांच करोड़ भारतीय ऐसी मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे हैं। यह स्थिति आने वाले समय में भयावह रूप ले लेगी। जिस देश में युवाओं में बढ़ते आत्महत्या के आंकड़े भयावह हालात सामने रख रहे हैं, वहां आज भी न मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल से जुड़ी चिकित्सा सेवाएं दुरुस्त हैं और न ही भावनात्मक टूटन झेल रहे लोगों के प्रति सामाजिक संवेदशीलता का भाव दिखाई देता है। चिंतनीय ही है कि सवा करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में सिर्फ पांच हजार मनोचिकित्सक हैं। जिंदगी से कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रही युवा पीढ़ी में बढ़ते मानसिक द्वंद्व और सुध-बुध गंवाने की गंभीर परिस्थितियों का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि हालिया समय में सोशल नेटवर्किंग साइटों पर युवाओं के आत्महत्या के सजीव वीडियो के प्रसारण के भी कई मामले सामने आए हैं। अफसोस कि तकनीक से लेकर परिवेश तक, सब कुछ उनके तनाव और अवसाद को और बढ़ाने वाला ही साबित हो रहा है। जरूरी है कि ऐसे हालात में सरकार भी चेते और समाज भी सहयोगी बने। इतना ही नहीं युवाओं में बढ़ती इस घातक प्रवृत्ति को रोकने के लिए समाज और परिवारों को भी अहम भूमिका निभानी होगी। वरना घर हो या बाहर, युवा जिस उधेड़बुन और भावनात्मक असुरक्षा के जंजाल से हद दर्जे तक जूझ रहे हैं, आने वाले समय में आत्महत्या, अवसाद और तनाव के आंकड़े और भी चिंतनीय स्तर तक बढ़ सकते हैं।

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