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राजनीति: मौत के सीवर से निकलते सवाल

जिस देश में स्वच्छ भारत योजना और स्मार्ट शहर परियोजना का ढिंढोरा पीटा जा रहा हो, वहां यह देखना सचमुच त्रासद है कि सीवर साफ करने उतरे कर्मचारियों को सुरक्षा के जरूरी उपकरण तक नहीं दिए जाते। सीवर में उतारते समय यह खयाल तक नहीं रखा जाता कि किसी आपात स्थिति में उन्हें वहां से बाहर निकालने के क्या प्रबंध होंगे और कैसे उन्हें अस्पताल पहुंचाया जाएगा।

Author September 22, 2018 2:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।(Express Photo by Manoj Kumar)

अभिषेक कुमार सिंह

भारत में दो साल पहले शुरू की गई स्मार्ट शहरों की महत्त्वाकांक्षी योजना का मकसद यह रहा है कि दुनिया इन चमकते-दमकते शहरों की बदौलत हमारे देश को जाने और एक राय बनाए। पर स्मार्ट शहरों और उनसे इतर देश में सैकड़ों बड़े और छोटे शहर और भी हैं, जहां गंदगी को ठिकाने लगाने के लिए बने मेनहोल, सीवर या सेप्टिक टैंक की साफ-सफाई के दौरान मजदूरों को ठेकेदारों की लापरवाही के चलते दुर्घटना का शिकार होना पड़ रहा है। हमारे कई शहरों में सड़क की सफाई करने वाली मशीनें दिखने लगी हैं। लेकिन जब बात सीवर की सफाई की होती है, तो उनमें बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उतरे सफाईकर्मियों के साथ अक्सर वही होता है, जो पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली व दूसरे कुछ शहरों में हुआ। आधुनिक-पॉश सोसायटी के सेप्टिक टैंक या कहें कि सीवर की सफाई करते पांच सफाईकर्मी अकाल मौत मारे गए। सीवर में उतरने वाले सफाईकर्मी अक्सर किसी ठेकदार के तहत काम करने वाले अस्थायी मजदूर होते हैं। उन्हें कोई स्वास्थ्य बीमा भी नहीं दिया जाता और उनके मरने के बाद परिवार को भी प्राय: कुछ नहीं मिलता। यही नहीं, गंदगी से बजबजाते सीवर में उतरते वक्त उन्हें सुरक्षा के उपकरण भी नहीं दिए जाते और बचाव के लिए उनके पास एक रस्सी के सिवाय कुछ नहीं होता। हादसे की शुरुआत अक्सर तब होती है, जब पहले कर्मचारी के सीवर में उतरने के बाद उसकी कोई हलचल नहीं दिखती। इसके बाद उसे बचाने बिना किसी सुरक्षा के दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवां कर्मचारी अंदर जाता है और सब के सब जहरीली गैसों से दम घुटने से शांत हो जाते हैं। आंकड़े देखें तो पिछले दस वर्षों में हजारों सफाईकर्मी सीवर की जहरीली गैसों के शिकार हो चुके हैं। मुंबई के आंकड़े के मुताबिक वहां इन दस सालों में ढाई हजार से ज्यादा सफाईकर्मियों को सीवर लील गए।

जिस देश में स्वच्छ भारत योजना और स्मार्ट शहर परियोजना का ढिंढोरा पीटा जा रहा हो, वहां यह देखना सचमुच त्रासद है कि सीवर साफ करने उतरे कर्मचारियों को सुरक्षा के जरूरी उपकरण तक नहीं दिए जाते। सीवर में उतारते समय यह खयाल तक नहीं रखा जाता कि किसी आपात स्थिति में उन्हें वहां से बाहर निकालने के क्या प्रबंध होंगे और कैसे उन्हें अस्पताल पहुंचाया जाएगा। गांव-गांव में शौचालय बनाने का आह्वान करने वाली सरकार ने कभी सोचा है कि कस्बों-शहरों की गली-मोहल्ले की गंदगी साफ करने के साथ कोई अनहोनी घट जाए तो उन्हें बचाने और उनके नहीं रहने पर उनके परिवारों को मुआवजा दिलाने की व्यवस्था क्या होगी। शहर की सफाई करने वाले लोग सरकार के एजंडे से भले बाहर हो गए हों, लेकिन अदालतें इस समस्या पर कुछ न कुछ कहती रही हैं। जैसे वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से नालियों, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मारे गए कर्मचारियों के परिवारों को दस लाख रुपए मुआवजा देने का फैसला किया था। लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो सका है कि यह मुआवजा वास्तव में दिया जाता है या नहीं। इसकी कुछ अहम वजहें हैं। असल में, सीवर की सफाई जैसे खतरनाक काम को प्राय: बाहरी एजंसियों को सौंपा जाता है जो अस्थायी मजदूरों से यह काम कराती हैं। नगरपालिकाओं को भी मालूम है कि यह काम खतरनाक है और ज्यादातर मौकों पर इसमें जान जाने का खतरा है, इसलिए स्थायी कर्मचारी रखने पर उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही कई गुना बढ़ जाती है।

लिहाजा वे इससे बचने की कोशिश करती हैं। मिसाल के तौर पर मुंबई को साफ-सुथरा रखने के लिए महानगरपालिका में करीब तीस हजार कर्मचारियों को नौकरी पर रखा गया है। लेकिन वहां भी लाखों मेनहोल के जरिए सीवर को साफ रखने का मुश्किल और खतरनाक काम ठेकेदारों के अधीन काम करने वाले अस्थायी कर्मचारियों से कराया जाता है। ऐसे अस्थायी कर्मचारियों को न तो कोई स्वास्थ्य सेवा हासिल होती है और न बीमा सुविधा। ठेकेदार अपनी मजबूरियां तो गिनाते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि आखिर सीवर में उतरने वाले कर्मचारियों को दस्ताने और रबड़ के जूतों के अलावा कोई और सुरक्षा उपकरण, जैसे कि गैस मास्क आदि क्यों नहीं दिए जाते। सीवर में उतर कर मानव मल समेत तमाम गंदगियों को हाथ से उठा कर साफ करने का काम कितना मुश्किल है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। बिना गैस मास्क या सुरक्षा उपकरणों के सीवर में उतरने वाले कर्मचारी पहले शराब पीते हैं, जो उन्हें बदबू और मानव मल को छूने से होने वाली घृणा और उसकी दुर्गंध को सहने की ताकत तो देती है, लेकिन जहरीली गैस की चपेट में आने पर उससे बचाव का उपाय करने की उनकी समझ को कुंद कर देती है। अंधेरे सीवर में उतरे ऐसे मजदूरों-कर्मचारियों के पास अक्सर टॉर्च भी नहीं होती, इसलिए संकट की स्थिति में ऊपर मौजूद साथी को ये कोई संकेत रस्सी हिला कर देते हैं। अक्सर ऐसे संकेत पढ़े जाने में अनावश्यक देरी होती है और मजदूरों की जान चली जाती है।

समस्या का एक और बड़ा पहलू यह है कि जब साफ-सफाई के तमाम यंत्र विकसित हो गए हैं, सड़कें साफ करने तक की मशीनें आ गई हैं, तो फिर सीवर सफाई का काम अभी भी इंसान पर क्यों छोड़ा हुआ है। अगर यह काम कुछ एजंसियों पर छोड़ा गया है जो अस्थायी मजदूरों से यह काम कराती हैं, तो इस आपराधिक लापरवाही के लिए उन एजंसियों को कठघरे में क्यों नहीं लाया जाता? कायदे से व्यवस्था यह बननी चाहिए कि अव्वल तो मशीनों से ही सीवर की सफाई हो। यदि किसी जगह मशीन से यह काम संभव नहीं हो पा रहा है तो यह काम प्राइवेट एजंसियों पर छोड़ने की बजाय नगरपालिकाओं के जिम्मे किया जाए जो सुरक्षा की पूरी तैयारी के साथ कर्मचारियों को इस काम में लगाएं। मामला अगर किसी निजी सोसायटी में सेप्टिक टैंक या सीवर सफाई का है, तो वहां भी नगरपालिकाएं या संबंधित निकाय ही यह जिम्मेदारी निभाएं। वर्ष 2016 से भारत सरकार देश में स्वच्छता अभियान के नाम पर अतिरिक्त टैक्स (सेस) वसूल कर रही है। इस पैसे के कुछ हिस्से से अगर सफाई के लिए मशीनें और अत्याधुनिक उपकरण खरीद लिए जाएं तो सीवर में होने वाली मौतों को रोका जा सकता है।

सीवर में होने वाली मौतों से साफ है कि स्वच्छता से लेकर नागरिकों को स्वस्थ-सुरक्षित माहौल दिलाने के लिए अंतिम रूप से जिस तंत्र को जिम्मेदार होना चाहिए, वह अपनी भूमिका ठीक से निभा नहीं रहा है। इसकी वजह शायद यह है कि देश के अधिकतर शहरों में स्वच्छता (जिसमें मेनहोल की सफाई भी शामिल है) आदि का जिम्मा जिन नगर निगमों या नगरपालिकाओं के पास होता है, वे क्षुद्र राजनीति और भ्रष्टाचार का अड्डा बने हुए हैं। दिल्ली में नगर निगम के भ्रष्टाचार के किस्से तो जगजाहिर हैं कि कैसे कई कर्मचारी अपनी जगह पर किसी और को काम पर भेज देते हैं और खुद निगम की नौकरी करने की बजाय दूसरे धंधों में लगे रहते हैं। दिल्ली और पटना की तरह कानपुर, काशी (वाराणसी), सूरत, हरिद्वार, लुधियाना, आगरा और देहरादून सरीखे तमाम शहरों में नगर निगमों को तो कई बार अंदाजा ही नहीं रहता कि उनके जिम्मे और उनके दायरे में क्या व कितना काम है। विकसित देशों में हुए शहरीकरण की कामयाब मिसालों के मद्देनजर भारत के शहरों का अगर यही हाल रहा, तो कह सकते हैं कि हमारे शहर विकास के सच्चे पैरोकार नहीं बन सकते। अच्छा यही होगा कि शहरों की साफ-सफाई का कोई नया अध्याय शुरू करते समय सीवर सफाई जैसे बेहद पुराने मसले को हाशिये पर न धकेला जाए, बल्कि इससे जुड़ी समस्याओं के हल भी सुझाए जाएं।

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