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राजनीति: गरीबी की मार और योजनाएं

लेकिन हकीकत यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के पालन के लिए विभिन्न केंद्र शासित प्रदेशों व राज्यों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। इन केंद्र शासित प्रदेशों व राज्यों के इस ढुलमुल रवैये से गरीबों, कुपोषितों व बुभुक्षितों को कोई राहत नहीं मिल पा रही है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले और अंत्योदय परिवारों को सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का कोई लाभ मिलना तो दूर, उलटे उनका शोषण हो रहा है। उनके शोषण के ऐसे बहुत-से मामले उजागर हो रहे हैं।

Author August 11, 2018 2:22 AM
भारत सरकार को जनसंख्या के असहाय-वर्ग को अंत्योदय अन्न योजना के तहत दिए जा रहे लाभ से संबंधित योजना के विस्तार के भी निर्देश दिए गए थे।

संजय ठाकुर

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो गरीब परिवारों के चयन में देश के बहुत-से केंद्र शासित प्रदेश और राज्य बुरी तरह से पिछड़े हुए हैं। गरीब परिवारों के चयन में पिछड़े इन केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों की जो संख्या निर्धारित की गई है, वह गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की वास्तविक संख्या से बहुत कम है। यही हाल अंत्योदय अन्न योजना में शामिल किए जाने वाले परिवारों की संख्या के संदर्भ में भी है। मतलब साफ है कि इन केंद्र शासित प्रदेशों व राज्यों की सरकारों ने गरीब लोगों के लिए बनाई गई योजनाओं के क्रियान्वयन में न सिर्फ ढील बरती, बल्कि इन योजनाओं को पात्र लोगों तक पहुंचाने के लिए भी कोई कारगर नीति या कार्ययोजना तैयार नहीं की। इससे हुआ यह कि साधनों व संसाधनों के अभाव में करोड़ों की संख्या में गरीब लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हैं।

सरकार द्वारा गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे और अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत शामिल किए जाने वाले परिवारों की चयन प्रक्रिया पूरी न होने के पीछे पात्र परिवारों का न मिल पाना, ग्राम सभाओं द्वारा गरीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों का निर्धारित संख्या से कम परिवारों के नाम ही पारित करना, ऐसे परिवारों की सूची को अंतिम रूप न देना, ग्राम सभाओं का गठन ही न होना, ग्राम सभाओं का न बैठना और ग्राम सभाओं का कोरम पूरा न होने जैसे तर्क दिए जाते हैं। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे जिन परिवारों की पहचान की गई है, उन्हें भी अभी तक रेड कार्ड जारी नहीं किए गए हैं। इस बाबत संबंधित विभाग द्वारा सफाई दी जाती है कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे परिवारों को नंबर बांटे गए हैं। रेड कार्ड जारी न किए जाने से गरीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ वे लोग उठा रहे हैं, जिनका आर्थिक स्तर अच्छा है। फिर चाहे अंत्योदय अन्न योजना और उचित मूल्य की दुकानों पर मिलने वाले सस्ते अनाज की ही बात क्यों न हो। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गरीबों, कुपोषितों के लिए चलाई गई योजनाओं के क्रियान्वयन के संदर्भ में केंद्र, सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को विस्तृत आदेश दिए थे। सर्वोच्च न्यायालय अपने आदेशों में साफ कह चुका है कि सभी राज्य सरकारों के मुख्य सचिव और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक इस बारे में जानकारियां दें। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सचिवों व प्रशासकों को यह अंतिम अवसर है कि वे इस बारे में न्यायालय के आदेशों का अनुवाद करवा कर उनको प्रमुखता के साथ सभी ग्राम पंचायतों, स्कूल भवनों और राशन की दुकानों पर लगवाएं। साथ ही, इन आदेशों को रेडियो और दूरदर्शन पर प्रचारित करने के भी आदेश दिए गए थे। इन आदेशों में भारत सरकार और राज्य सरकारों को अपने-अपने स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त करने को भी कहा गया था, ताकि सरकारी योजनाएं सही ढंग से लागू की जा सकें।

भारत सरकार को जनसंख्या के असहाय-वर्ग को अंत्योदय अन्न योजना के तहत दिए जा रहे लाभ से संबंधित योजना के विस्तार के भी निर्देश दिए गए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि यह सुनिश्चित करवाना सरकार की जिम्मेदारी है कि बूढ़े व लाचार व्यक्तियों, विकलांगों, बेसहारा महिलाओं व ऐसे वृद्धों जो कि भुखमरी के कगार पर हों, गर्भवती महिलाओं व बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं और बेसहारा बच्चों को भोजन उपलब्ध हो। शीर्ष अदालत ने बूढ़ों, लाचार लोगों, विकलांगों, बेसहारा पुरुषों व महिलाओं, गर्भवती महिलाओं व बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं, विधवा व उन एकल महिलाओं जिनका कोई सहारा नहीं है, साठ साल व इससे अधिक आयु के बेसहारा व्यक्तियों व जिनके पास आजीविका का कोई नियमित जरिया नहीं है और उन परिवारों जिनमें कोई विकलांग व्यक्ति है, को इस योजना का लाभ देने के निर्देश दिए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे परिवारों को भी अंत्योदय अन्न योजना में शामिल करने को कहा था जहां वृद्धावस्था, शारीरिक व मानसिक बीमारी, सामाजिक रीति-रिवाजों, विकलांग व्यक्ति की देखभाल तथा अन्य किन्हीं वजहों से कोई ऐसा व्यक्ति न हो जो घर के बाहर कमाई के लिए जा सके। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए थे कि आदिम जनजातियों को भी इस योजना का हिस्सा बनाया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के पालन के लिए विभिन्न केंद्र शासित प्रदेशों व राज्यों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। इन केंद्र शासित प्रदेशों व राज्यों के इस ढुलमुल रवैये से गरीबों, कुपोषितों व बुभुक्षितों को कोई राहत नहीं मिल पा रही है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले और अंत्योदय परिवारों को सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का कोई लाभ मिलना तो दूर, उलटे उनका शोषण हो रहा है। उनके शोषण के ऐसे बहुत-से मामले उजागर हो रहे हैं। अव्यवस्था का आलम यह है कि कई गरीबी रेखा से नीचे वाले और अंत्योदय परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर जीवन-यापन करने वाले परिवारों की सूची में डाल दिया गया है और कई गरीबी रेखा से ऊपर वाले परिवार इन सुविधाओं और योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। इससे सरकार की योजनाओं का लाभ उन लोगों को नहीं मिल पा रहा है जिनके लिए वे योजनाएं बनाई गई हैं।

इसे सरकारी उपेक्षा कहें या राजनीतिक इच्छा-शक्ति का अभाव, गरीब परिवारों के सही और पूर्ण चयन न हो पाने के मुख्य कारण इन्हीं दो बातों में छुपे हैं। रही-सही कसर फिर सरकारी-तंत्र और इससे संबद्ध निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी। यहां सबसे ज्यादा गौर करने लायक यह बात है कि गरीब परिवारों के चयन के दृष्टिगत विभिन्न राज्य सरकारें वास्तविक लक्ष्य से ही भटकी हुई हैं। विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों का जो आंकड़ा निर्धारित किया गया है, वह वास्तविक स्थिति से बहुत कम है। इन सभी बातों पर विचार करें तो गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे परिवारों और अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत शामिल किए जाने वाले परिवारों की चयन प्रक्रिया पूरी न होने के लिए कसूरवार किसे ठहराया जाएगा। सीधी-सी बात है कि इसके लिए केंद्र, केंद्र शासित प्रदेशों व राज्यों की सरकारें व संबंधित प्रशासन सभी दोषी हैं। सरकार व प्रशासन के विरुद्ध पहली बात तो यही चली जाती है कि ये दोनों ही वास्तविक लक्ष्य से बहुत पीछे चल रहे हैं। इन द्वारा निर्धारित लक्ष्य वास्तविक स्थिति से बहुत भिन्न और कम है। दूसरी बात यह कि सरकार द्वारा यही सुनिश्चित नहीं किया जा सका है कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ पात्र लोगों को ही मिले। सरकार व प्रशासन की कार्य-प्रणाली में उत्पन्न विसंगतियों और खामियों को दूर करने की दिशा में कोई भी कारगर कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। ऐसे में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों के लिए बनाई जा रही योजनाओं का औचित्य ही समाप्त हो जाता है। सरकार व प्रशासन को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए ताकि गरीबी, कुपोषण और भुखमरी जैसी समस्याओं से निजात पाई जा सके। तभी समाज के कमजोर तबके को भारत के संविधान द्वारा दिए गए जीवन के अधिकार और भोजन के अधिकार के लाभ से वंचित होने से भी बचाया जा सकता है।

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