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राजनीति: ईरान-अमेरिका के बीच भारत

अमेरिका-ईरान संबंध उस वक्त बिगड़ने शुरू हुए थे जब 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका के पिट्ठू कहे जाने वाले शाह मोहम्मद रजा पहलवी को अपदस्थ कर, आयतुल्लाह रूहोल्लाह खोमैनी के अधीन इस्लामिक गणतंत्र की स्थापना हुई थी। शाह और अमेरिकी गठजोड़ के अंत के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई गहराती चली गई। तब से अमेरिका ईरान को सबक सिखाने के लिए मौके की तलाश में था।

Author September 24, 2018 3:49 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फोटोः पीटीआई)

नंद किशोर सोमानी

ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाए जाने की अमेरिकी घोषणा के बाद तेल का वैश्विक बाजार हिल-सा गया है। ईरान को पटरी पर लाने के लिए अमेरिका एक साथ दो मोर्चों पर काम कर रहा है। एक ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ओपेक (तेल उत्पादक देशों का संघ) देशों पर तेल उत्पादन बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वे दुनिया के देशों को ईरान से तेल नहीं खरीदने को बाध्य कर रहे हैं। अब तक जो परिणाम सामने आए हैं, उसमें ट्रंप दोनोें ही मोर्चों पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हंै। ईरान का तेल उत्पादन जुलाई 2016 के बाद अब तक के सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है। अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को चार नवंबर ईरान से तेल का आयात बंद कर देने को कहा है। दूसरी ओर ईरान ने जवाबी कार्रवाई में यूरोपीय संघ (ईयू) के सदस्यों को धमकी दी है कि परमाणु समझौते से अमेरिका के अलग होने के बाद अगर यूरोपीय संघ अपने दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो वह यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने में गुरेज नहीं करेगा। हालांकि ईरान ने समझौते से अलग होने की संभावना से इंनकार किया है। ईरान ने ओपेक देशों पर भी आरोप लगाया है कि इसके कुछ सदस्यों ने पूरे संगठन को अमेरिका की कठपुतली बना दिया है। उसका इशारा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की ओर था।

ईरान और छह देशों रूस, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, अमेरिका और जर्मनी ने 2015 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता किया था। इस समझौते के बाद आर्थिक प्रतिबंधों को कम करने के बदले तेहरान अपनी परमाणु क्षमता को सीमित करने के लिए तैयार हो गया था। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते को एक महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाता है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इस साल मई में घोषणा कर सबको चौंका दिया था कि अमेरिका ईरान परमाणु समझौते से अपने को अलग कर रहा है। ट्रंप का मानना है कि यह समझौता ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने में नाकाम रहा है, साथ ही ईरान सीरिया, यमन और इराक में शिया लड़ाकों और हिजबुल्ला जैसे संगठनों को हथियार सप्लाई कर रहा है। इसी वजह से फिर से उस पर प्रतिबंध लागू किए गए हैं। अमेरिका ने साफ कहा है कि ईरान से तेल आयात करने वाले देशों को ईरान या अमेरिका में से किसी एक को चुनना होगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि ईरान पर लगाए गए ट्रंप के आरोपों का आधार क्या है। वे किस आधार पर कह रहे हैं कि ईरान परमाणु बम न बनाने की अपनी शर्त पर नाकाम रहा है? क्या अमेरिका के पास इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण हैं? अगर हैं, तो क्या उन प्रमाणों को अपने सहयोगी देशों के साथ साझा नहीं किया जाना चाहिए था? अकेले अमेरिका के अलावा क्या किसी अंतरराष्ट्रीय जांच एजंसी ने इस बात का खुलासा किया है कि ईरान परमाणु परीक्षण की तैयारी कर रहा है?

अमेरिका-ईरान संबंध उस वक्त बिगड़ने शुरू हुए थे जब 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका के पिट्ठू कहे जाने वाले शाह मोहम्मद रजा पहलवी को अपदस्थ कर, आयतुल्लाह रूहोल्लाह खोमैनी के अधीन इस्लामिक गणतंत्र की स्थापना हुई थी। शाह और अमेरिकी गठजोड़ के अंत के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई गहराती चली गई। तब से अमेरिका ईरान को सबक सिखाने के लिए मौके की तलाश में था। इस बीच साल 2002 में ईरान के अघोषित परमाणु केंद्रों के खुलासे की खबरें आर्इं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजंसी (आइएईए) का कहना था कि ईरान एक गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम शरू करने की तैयारी कर रहा है, जिसका लक्ष्य मिसाइलों के लिए परमाणु हथियार बना कर उनका परीक्षण करना है। अमेरिका इसी अवसर की तलाश में था। इसके बाद अमेरिका की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा उठी। इसके बाद अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, रूस और चीन के साथ उसकी बातचीत का लंबा दौर शुरू हुआ, जिसका अंत जुलाई 2015 में वियना समझौते (ईरान परमाणु समझौते )के साथ हुआ। इस समझौते के तहत ईरान अपने करीब नौ टन सवंर्धित यूरेनियम भंडार को कम करके तीन सौ किलो तक करने के लिए राजी हो गया। समझौते की एक अन्य शर्त यह भी थी कि आइएईए को समय-समय पर इस बात की जांच करने की स्वतंत्रता होगी कि ईरान संधि के प्रावधानों का पालन कर रहा है या नहीं। इन शर्तों के बदले में पश्चिमी देश ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने पर सहमत हो गए थे।

सच तो यह है कि समझौते से पीछे हटने की असल वजह अमेरिका की आंतरिक राजनीति भी है। साल 2015 में रूस, ईरान और हिजबुल्लाह के गठजोड़ के चलते उसे सीरिया में हार का सामना करना पड़ा था। अमेरिका और इजराइल अपनी लाख कोशिशों के बावजूद सीरिया में बशर-अल-असद को हटा नहीं पाए। बहुत से यूरोपिय देश तो अमेरिका पर खुला आरोप लगा रहे हैं कि सीरिया की हार का बदला लेने और ईरान को सबक सिखाने के लिए उसने परमाणु समझौता तोड़ा है। दूसरा, यह समझौता ट्रंप के लिए व्यक्तिगत तौर पर भी खासा महत्त्व रखता है। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी उन्होंने इस मुद्दे को जम कर भुनाया था। ट्रंप ने प्रचार के दौरान वादा किया था कि ईरान को उसकी हरकत के लिए सजा देंगे और परमाणु समझौता रद्द कर उस पर और कड़े प्रतिबंध लगाएंगे। समझौता तोड़ने की घोषणा के दौरान उन्होंने कहा था- मैं जो कहता हूं, वह करता हूं। हो सकता है कि प्रतिबंधों के जरिए उत्तर कोरिया को काबू में करने वाले ट्रंप संभवत ईरान में भी इसी फार्मूले का प्रयोग कर रहे हों। अगर ऐसा है, तो निसंदेह यहां ट्रंप गलत रास्ते पर हैं। ईरान और उत्तर कोरिया कि स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। उत्तर कोरिया एक कमजोर अर्थव्यवस्था वाला देश है, जबकि ईरान के पास कमाई का सबसे बड़ा जरिया तेल है। दूसरा, उत्तर कोरिया का अपने प्रमुख पड़ोसी दक्षिण कोरिया के साथ भी विवाद था और दक्षिण कोरिया अमेरिका का निकट सहयोगी था। जबकि ईरान के आसपास की स्थिति ऐसी नहीं है, जहां अमेरिकी हस्तक्षेप की संभावना हो। उत्तर कोरिया के पक्ष में एक अकेले चीन था, जबकि ईरान के साथ इस समय रूस व चीन दोनों खड़े हैं। ऐसे मेंं ईरान अमेरिकी धमकियों के आगे आसानी से झुक जाएगा, यह मुश्किल है। सच्चाई चाहे जो भी हो, अमेरिका-ईरान की इस लड़ाई में असल परीक्षा भारत की होनी है। भारत और ईरान के बीच दशकों पुराने संबंध हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए काफी हद तक ईरान पर निर्भर करता है। इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है। इसके अलावा भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह बना रहा है। सामरिक दृष्टि से चाबहार भारत के लिए खासा महत्त्वपूर्ण है। भारत इसे मध्य एशिया, रूस और यूरोप के लिए प्रवेश द्वार के रूप में विकसित कर रहा है। लेकिन फिलहाल भारत असंमजस में है। अमेरीकी दबाव के चलते अगर वह ईरान से तेल का आयात बंद करता है, तो संभव है ईरान में चल रही चाबहार सहित अन्य परियोजनाएं प्रभावित होंगी। दूसरी ओर, अगर वह यूरोपीय संघ, रूस और चीन जैसे देशों का अनुसरण करते हुए ईरान से तेल व्यापार जारी रखता है तो न केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख बढ़ेगी, बल्कि स्वंत्रत विदेश नीति के सिद्वांत की उसकी कल्पना भी दुनिया तक पहुंच सकेगी। संभवत भारत दूसरे मार्ग का ही अनुसरण करे।

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