ताज़ा खबर
 

राजनीति: नासूर बनती मानव तस्करी

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में मानव तस्करी दूसरा सबसे बड़ा अपराध है, जो पिछले एक दशक में चौदह गुना बढ़ा है और सिर्फ वर्ष 2014 में पैंसठ फीसद तक बढ़ा है। वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच ऐसे मामलों में 92 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज हुई, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। लगभग हर राज्य में मानव तस्करों का नेटवर्क फैला है, जहां बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं।

Author August 3, 2018 2:34 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

योगेश कुमार गोयल

सभ्य समाज के माथे पर दाग और मानवता को शर्मसार कर देने वाले मानव तस्करी के बढ़ते मामले गंभीर चिंता का सबब बन गए हैं। हाल के दिनों में मानव तस्करी को लेकर कई ऐसे गंभीर खुलासे हुए हैं, जिनसे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह समस्या धीरे-धीरे किस तरह नासूर बनती जा रही है। पिछले दिनों पुणे में एक मदरसे रूपी यतीमखाने से छत्तीस बच्चों को छुड़ाया गया। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई कि इनमें से कोई भी बच्चा यतीम नहीं था, बल्कि बिहार और झारखंड के इन बच्चों के परिजनों को बहला-फुसला कर अच्छी तालीम देने के नाम पर यहां लाया गया था। इन बच्चों का यहां न केवल यौन शोषण किया जाता था, बल्कि यह यतीमखाना मानव तस्करी का अड्डा भी बना हुआ था। कई बच्चे इस यतीमखाने से गायब हो चुके थे। इसी तरह वाराणसी में नेपाली युवतियों को बंधक बना कर उनसे देह व्यापार कराने के मामले में एक ट्रैवल एजेंट की गिरफ्तारी के बाद खुलासा हुआ कि मानव तस्कर नेपाल के उन गांवों को निशाना बना रहे हैं, जो कुछ साल पहले भूकम्प के कारण तबाह हो चुके थे। कुछ दिन पहले ही दिल्ली में महिला आयोग की छापेमारी के बाद एक फ्लैट से छुड़ाई गई सोलह नेपाली लड़कियों और पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ के बाद खुलासा हुआ कि इन लड़कियों को नौकरी का झांसा देकर यहां लाया गया था और इन्हें कुवैत और इराक भेजने की तैयारी थी। नेपाल सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले तीन साल में मानव तस्कर करीब सत्ताईस हजार नेपाली लड़कियों को भारत से बाहर भेज चुके हैं।

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ विधानसभा में मानव तस्करी से संबंधित चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया गया। अकेले छत्तीसगढ़ में अब तक करीब तीस हजार लड़कियां मानव तस्करों का शिकार हुई हैं। सिर्फ एक राज्य की यह स्थिति है तो पूरे देश में स्थिति कितनी भयावह होगी, इसका अंदाज लगा पाना मुश्किल नहीं है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में भारत में करीब बीस हजार बच्चों और महिलाओं की तस्करी हुई, जिनमें नौ हजार से ज्यादा बच्चे थे और यह आंकड़ा 2015 के मुकाबले पच्चीस फीसद अधिक था। छत्तीसगढ़ के बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष कहते हैं कि ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का अभियान तो जोर-शोर से चलाया जा रहा है, किंतु बेटियां कहां हैं और कैसे हालात में हैं, यह जानने में की दिशा में कोई कार्य नहीं हो रहा। मानव तस्करी के शिकार लोगों की जानकारी सरकार के पास होने के बावजूद उन्हें खोजने और वापस लाने के लिए प्रयास नहीं किए जाते। मानव तस्करी आखिर है क्या? मानव तस्करी को आम भाषा में ‘कबूतरबाजी’ भी कहा जाता है और इसे आधुनिक गुलामी के रूप में भी जाना जाता है। मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी के बाद मानव तस्करी को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध माना गया है और अगर बात एशिया की हो तो भारत इस तरह के अपराधों का गढ़ माना जाता है। यह एक छिपा हुआ अपराध है, जो विश्वभर में लगभग हर देश में सभी तरह की पृष्ठभूमि वाले लोगों को प्रभावित करता है। संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार किसी व्यक्ति को डरा कर, बल प्रयोग कर अथवा दोषपूर्ण तरीके से भर्ती, परिवहन या शरण में रखने की गतिविधि तस्करी की श्रेणी में आती है। देह व्यापार से लेकर बंधुआ मजदूरी, जबरन विवाह, घरेलू चाकरी, अंग व्यापार तक के लिए दुनिया भर में महिलाओं, बच्चों व पुरुषों को खरीदा-बेचा जाता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो करीब अस्सी फीसद मानव तस्करी जिस्मफरोशी के लिए ही होती है, शेष बीस फीसद बंधुआ मजदूरी अथवा अन्य प्रयोजनों के लिए।

मानव तस्करी के मामलों में अधिकांश बच्चे भारत के पूर्वी इलाकों के बेहद गरीब व पिछड़े क्षेत्रों से होते हैं। गरीब परिवारों के पुरुष, महिलाएं या बच्चे काम की तलाश में मानव तस्करों के हत्थे आसानी से चढ़ जाते हैं। कई बार कुछ कर्ज या अग्रिम मेहनताने का लालच देकर ऐसे लोगों को बंधक बना कर रखा जाता है। प्राय: मानव तस्करी जैसे घिनौने अपराध में संलिप्त एजेंट गांवों के बेहद गरीब परिवारों की कम उम्र की बच्चियों पर नजर रखते हैं और अवसर पाकर उनके परिजनों को कुछ रकम का लालच देकर उन्हें शहर में अथवा विदेश में अच्छी नौकरी दिलाने का झांसा देकर, बेहतर जिंदगी के सपने दिखाकर अनैतिक कार्यों में धकेल देते हैं। मानव तस्करी का यह धंधा कम से कम समय में भारी मुनाफा कमा लेने का जरिया बन गया है। आज सोशल मीडिया भी मानव तस्करों के लिए एक बड़ा हथियार बन गया है, जिसके जरिये कानून की गिरफ्त से बचे रह कर ये बड़ी आसानी से अपने शिकार को फांस लेते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में मानव तस्करी दूसरा सबसे बड़ा अपराध है, जो पिछले एक दशक में चौदह गुना बढ़ा है और सिर्फ वर्ष 2014 में ही पैंसठ फीसद तक बढ़ा है। वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच ऐसे मामलों में 92 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज हुई, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। लगभग हर राज्य में मानव तस्करों का नेटवर्क फैला है, जहां बड़े पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को तो मानव तस्करी के मुख्य स्रोत और गढ़ माना जाता है, जहां लड़कियों को रेड लाइट एरिया के लिए खरीदा और बेचा जाता है और मानव तस्करी के दर्ज होने वाले सत्तर फीसद से अधिक मामले इन्हीं राज्यों के होते हैं।

हालांकि मानव तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए हाल में लोकसभा में मानव तस्करी विधेयक-2018 पारित किया जा चुका है। इस विधेयक में मानव तस्करी में दोषी पाए जाने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। मानव तस्करी रोकने के लिए सरकार द्वारा अब देश के हर जिले में मानव तस्करी रोधी इकाई बनाने पर विचार किया जा रहा है, दो सौ सत्तर जिलों में इस प्रकार की इकाई के लिए फंड दिया जा चुका है और अन्य जिलों से प्रस्ताव मंगाए जा रहे हैं। सीमा सुरक्षा बल और सशस्त्र सीमा बल द्वारा सीमावर्ती इलाकों में मानव तस्करी रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। सीमा पार मानव तस्करी पर नकेल कसने के लिए कई देशों से मजबूत सहयोग के लिए भारत बातचीत कर रहा है। देश में बढ़ती मानव तस्करी की घटनाओं के मद्देनजर गृह मंत्रालय अब इसकी जांच में लगे पुलिस कर्मचारियों व अधिकारियों को प्रशिक्षण देने की भी तैयारी कर रहा है। बहरहाल, हमारे यहां बहुत से मामलों में कड़े कानूनों के बावजूद असामाजिक तत्त्व बेखौफ अपना खेल खेलते हैं। देश में कानून बनाने और उन्हें सख्ती से लागू कराने के मामले में बड़ा अंतर देखा जाता रहा है। इसलिए मानव तस्करी के मामले में जिन कड़े कानूनों का प्रावधान किया गया है, उनकी सतत निगरानी की व्यवस्था के साथ-साथ ऐसा निगरानी तंत्र विकसित करना होगा जिससे अपने रसूख के बल पर आरोपी छूट न पाएं। इस गंभीर समस्या से निजात पाने के लिए आदिवासी व पिछड़े इलाकों में व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने के साथ वहां के निवासियों को शिक्षित करने और उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की ओर भी विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि वे अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लालच में उन्हें चंद रुपयों के बदले बेचने को विवश न हों।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App