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राजनीति: कैसे रुकेगी वैवाहिक प्रताड़ना

हमारे समाज में विवाहित महिलाओं के लिए यह बात कोई नई नहीं है कि उन्हें कई बार अपने जीवन साथी से हैवानियत के स्तर तक प्रताड़ना मिलती है और परिवार नाम की संस्था को बनाए रखने के नाम पर संबंध बनाने को विवश किया जाता है। यह बात दबे-छिपे स्वीकार तो की जाती है कि व्यक्ति की अपनी इच्छा के विरुद्ध बलात विवाह के ज्यादातर मामलों की परिणति वैवाहिक बलात्कार के रूप में ही होती है, लेकिन खुले तौर पर इसे मानने में संकोच किया जाता है।

Author July 30, 2018 1:28 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

अगर विकसित समाजों को छोड़ दें, तो ज्यादातर में यह परंपरा प्रचलित है कि एक बार विवाह हो जाने के बाद स्त्री के जीवन से संबंधित फैसले करने का अधिकार उसके पति या ससुराल का ही हो जाता है। जहां तक कानून का सवाल है कि हमारा संविधान हर नागरिक को यह स्वतंत्रता तो देता है कि विवाह के संबंध में एक वयस्क दूसरे वयस्क का चुनाव कर सकता है। इसी तरह बाल विवाह की इजाजत नहीं है, यानी उम्र से पहले और इच्छा के विरुद्ध विवाह अमान्य है और ऐसा करने वालों या ऐसा करने को मजबूर करने वालों को दंडित किए जाने प्रावधान है। लेकिन इससे आगे, खासतौर से स्त्री के साथ कैसा व्यवहार होता है, इस पर कानून भी अपनी तमाम सदीच्छाओं के बावजूद खामोश हो जाता है। हाल में दिल्ली हाई कोर्ट के एक खंडपीठ ने वैवाहिक बलात्कार संबंधी जनहित याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘शादी का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि बीवी सेक्स के लिए हमेशा तैयार बैठी हो।’ असल में, देश की कानूनी व्यवस्था में बलात्कारियों को कठघरे में लाने और उन्हें सजा दिलाने के इंतजाम तो हैं, लेकिन यदि बलात्कार पति ही करता है, तो वह अपराध बलात्कार की परिभाषा में नहीं आता।

हमारे समाज में विवाहित महिलाओं के लिए यह बात कोई नई नहीं है कि उन्हें कई बार अपने जीवन साथी से हैवानियत के स्तर तक प्रताड़ना मिलती है और परिवार नाम की संस्था को बनाए रखने के नाम पर संबंध बनाने को विवश किया जाता है। यह बात दबे-छिपे स्वीकार तो की जाती है कि व्यक्ति की अपनी इच्छा के विरुद्ध बलात विवाह के ज्यादातर मामलों की परिणति वैवाहिक बलात्कार के रूप में ही होती है, लेकिन खुले तौर पर इसे मानने में संकोच किया जाता है। महिलाओं की मजबूरी यह है कि वे ऐसे संबंधों को विवाह बचाने की मजबूरी में सह लेती हैं। ऐसा करने की एक बड़ी वजह यही है कि उन्हें इससे बचाने में न तो समाज कोई मदद करता है और न ही कानून। ऐसे मामले केवल तभी प्रकाश में आते हैं जब संबंध बनाने से इनकार करने पर कोई मामला अदालत में पहुंचता है या महिलाओं को घर में कैद या नजरबंद कर लिया जाता है, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है और कहना नहीं मानने यानी जिस व्यक्ति से शादी कराई जाती है, उससे संबंध बनाने पर इनकार को लेकर हत्या तक कर दी जाती है। पुलिस में रिपोर्ट कराए जाने या किसी समाजसेवी संस्था द्वारा मामले को प्रकाश में लाए जाने पर ही ऐसी घटनाओं का खुलासा हो पाता है। आज समाज के जागरूक तबकों में भी यदि तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, तो उनके पीछे बड़ा कारण या तो बेमेल विवाह हैं, या फिर विवाह उपरांत की जाने वाली जबर्दस्ती। महिलाओं में अवसाद जैसी बीमारियों के बढ़ने की बड़ी वजह जबरन शादी भी है। लेकिन हमारा समाज विवाह के इस पहलू पर शायद विचार ही नहीं करता। इसके लिए मान्यताओं और परंपराओं की दुहाई दी जाती है। वर्ष 2015 में संसद में भी यह मामला उठा था। तब राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में सरकार की ओर से यह दलील दी गई थी कि भारतीय समाज की मान्यताओं, धार्मिक भावनाओं और सामाजिक स्थापनाओं के मद्देनजर यह संभव नहीं है कि वैवाहिक बलात्कार के संबंध में अंतरराष्ट्रीय कानूनों को भारत में भी लागू किया जा सके। इसके लिए भारतीय विधि आयोग की 172वीं रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया था, जिसमें बलात्कार संबंधी कानूनों की समीक्षा करते हुए इस विषय में कोई सिफारिश नहीं की गई है। इसलिए इस बारे में कोई कानून बनाने की संभावना से इनकार कर दिया गया था।

वर्ष 2017 में केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपराध करार देने के लिए दायर की गई याचिका के जवाब में कहा था कि इससे ‘विवाह की संस्था अस्थिर’ हो सकती है, क्योंकि यह पतियों को सताने का एक आसान औजार बन सकता है। ऐसे ही रवैये और विधि आयोग की इस बारे में खामोशी से ही यह सवाल बार-बार उठता रहा है कि क्या भारतीय समाज में महिलाओं को वैवाहिक बलात्कार जैसा जुल्म हमेशा सहते रहना पड़ेगा? क्या आधुनिकता का मुलम्मा पहने हुए हमारा समाज और देश का कानून उन्हें इस संबंध में ऐसे उपाय मुहैया नहीं करा पाएगा जिससे वे ऐसे जुल्म के खिलाफ आवाज उठा सकें? कोई माने या नहीं, पर सच यही है कि अभी भी हमारा समाज विवाह संबंधी मामलों में पुरातनपंथी जड़ताओं से बाहर नहीं आ पाया है। ज्यादातर मां-बाप बच्चों की शादी में अपनी मनमर्जी थोपते हैं। इस मामले में वे जाति, गोत्र, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब जैसे तमाम दायरों से बाहर नहीं निकल पाए हैं। पढ़ाई-लिखाई और समझदारी के पैमाने इस मामले में उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखते। इस समस्या का सबसे खराब पक्ष तो यह है कि जब कोई व्यक्ति पैसे के बल पर गरीब मां-बाप की बेटियों या अनाथ लड़कियों को अपने साथ शादी के लिए मजबूर करता है। ऐसी ज्यादातर शादियों का अंजाम वैवाहिक बलात्कार के रूप में ही सामने आता है, क्योंकि वहां संबंध बनाने के मामले में स्त्री की इच्छा-अनिच्छा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। यही नहीं, अब तक सरकार का इस मामले में यह पक्ष रहा है कि वह वैवाहिक बलात्कार को अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रावधानों के तहत नहीं ला सकती, क्योंकि हमारे देश में शिक्षा, साक्षरता और गरीबी के साथ ही सामाजिक मूल्यों व धार्मिक भावनाओं में काफी अंतर है।

यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्या हमारा समाज जबरन शादी के फलस्वरूप होने वाली वैवाहिक प्रताड़ना की समस्या को जड़ से खत्म करने का कोई उपाय कर पाएगा? इस पर विचार करना अब वक्त की जरूरत है। अब भारत सहित अन्य एशियाई देशों में यह समस्या एक गंभीर रूप धारण कर चुकी है। विकसित देशों में बसे एशियाई परिवारों में भी इस कारण काफी उथल-पुथल मची है। यह एक विचित्र बात है कि हमारे पुराणों में जहां स्वयंवर जैसी प्रथाओं का उल्लेख है और जहां आधुनिक कानून व्यक्ति को अपनी इच्छा से अपने लिए वर या वधू के चुनाव की स्वतंत्रता देता है, वहां का समाज आज भी शादी के मामले में काफी जड़ रवैया अपनाए हुए है। ब्रिटेन जैसे कुछ विकसित देशों में वहां की सरकारें विवाह में जबर्दस्ती को गैरकानूनी मान कर ऐसे मामलों की रोकथाम के प्रयास कर रही हैं। वर्ष 2012 में ब्रिटेन में फोर्स्ड मैरिज (सिविल प्रोटेक्शन) एक्ट लागू किया गया था और इसका पालन इंग्लैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में कराया जा रहा है। इस कानून के तहत पुलिस जानकारी मिलने पर न केवल जबरन विवाह की घटनाओं को रोकती है, बल्कि जो व्यक्ति इस मामले में दोषी पाया जाता है, उसे कड़ी सजा देने का प्रावधान है। पर भारत में कानून बनाए बिना ऐसी घटनाओं की प्रभावी रोकथाम मुमकिन नहीं है। जाति-गोत्र आदि को अहमियत देने वाली सामाजिक रूढ़ियों और खाप पंचायतों जैसी व्यवस्था के दबाव में कई राजनीतिक दल घुटने टेक देते हैं और ऐसे मामलों को संबंधित समाजों के रीति-रिवाजों का हिस्सा बता कर उसमें दखल देने से इनकार कर देते हैं। बलात विवाह और वैवाहिक बलात्कार के मामले में पितृ सत्तात्मक समाज की विकृत सोच के कारण असहनीय पीड़ा झेल रही महिलाओं की नियति तभी बदलेगी, जब समाज के जागरूक लोग सरकार और प्रशासन को ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रेरित करेंगे और पीड़ित व्यक्ति को उनके कानूनी अधिकारों की जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें कानूनी मदद मुहैया कराएंगे।

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