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राजनीति: हिंदी समाज और हमारी संस्कृति

जो देश दुनिया की परवाह न कर परमाणु परीक्षण कर सकता है और अब चीन तथा जापान के साथ प्रतियोगिता में अग्रणी रहना चाहता है, वह किसी एक वर्ष को आधार बना कर हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सही ढंग से सिंहासन पर बैठा सकता है। अब संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के सहयोग के लिए भारत सरकार की ओर से ही विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन में न्यूयार्क में एक सौ करोड़ रुपए दिए जाने की घोषणा हुई। लेकिन एक दशक तक लालफीताशाही ने इस काम के लिए कोई पहल नहीं की।

Author September 15, 2018 3:03 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

आलोक मेहता

संस्कृति का मूल आधार भाषा है और भाषा का चरम उत्कर्ष साहित्य में प्रकट होता है। भाषा और साहित्य का उत्थान समाज, संस्कृति और जीवन का उत्थान है। सारी आधुनिक चुनौतियों के बावजूद हिंदी आश्चर्यजनक उन्नति कर रही है। पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में ही नहीं, अमेरिका, यूरोप और चीन जैसे एशियाई देशों में भारत की बढ़ती सामाजिक-आर्थिक शक्ति के साथ हिंदी के पठन-पाठन के प्रति तेजी से लगाव देखने को मिल रहा है। दूसरी तरफ मशीनी युग सामाजिक जीवन को सस्ता और अर्थहीन बना रहा है। इससे हिंदी समाज-संपूर्ण भारत को बचाने का उपाय संस्कृति की रक्षा और निर्माण की चिर जागरूक चेष्टा और उस चेष्टा की आवश्यकता में अखंड विश्वास, का ही मार्ग है। इस शक्ति को उत्पन्न करने का एकमात्र रास्ता है- शिक्षा। शिक्षा जो निजी साक्षरता, हिंदी का ज्ञान, जानकारियां नहीं, वरन समाज में व्यक्ति की रुचि-संस्कार की, परख करने की क्षमता और संस्कृति के प्रति जगाव एवं गौरव की। बिना गहरी और विस्तृत अनुभूति के संस्कृति नहीं है।

हिंदी समाज का वर्तमान इतने बड़े दायरे में फैला हुआ है कि उसमें परंपरा भी निभ रही है। आधुनिकता भी ध्वनित हो रही है और उत्तर आधुनिकता भी अपना रूप गढ़ रही है। इस दायरे की व्यापकता शिल्प और शैली में भी है और वस्तु तथा विचार में भी। कहीं नए विचार परंपरावादी शैलियों में व्यक्त हो रहे हैं, तो कहीं नए शिल्प और मुहावरे में परंपरावादी कथ्य को आयाम दिए जा रहे हैं। आज हिंदी का युवा साहित्यकार पारंपरिक जीवन मूल्यों को अपने संघर्षों के आईने में परख रहा है। सच यह है कि परंपरा के घर से निकल कर ही आधुनिकता की पहचान की जा सकती है। संस्कृत हिंदी की जननी है। संस्कृत में सभ्यता और संस्कृति के वाहक लोग ‘आर्य’ अथवा ‘अर्य’ कहलाते थे। वास्तव में ये लोग चिंतन के पथिक थे। सतत मनन से जीवन को भौतिक और आध्यात्मिक स्तरों पर संपन्न करते थे। आर्य शब्द ‘ऋ’ धातु से बना है। इसका अर्थ ‘जाना, चलना, आगे बढ़ना’ है। नए विचारों द्वारा नए आविष्कार, नए आविष्कारों से नवनिर्मित पदार्थ, उनसे नए जीवन-स्तर और उनसे नए जीवन क्रमों का प्रसार- इनको लेकर हम पश्चिम की ओर अग्रसर हुए। हिंदी समाज को अपनी संस्कृति पर गौरव के साथ जननी संस्कृत की गौरव-गाथा का भी स्मरण रखना होगा। चार हजार वर्ष ईसा पूर्व, नदियों और भीषण वनों को पार करते हुए भारतीय यूरोप की ओर अग्रसर हुए और यूरोप की भाषाएं संस्कृत से जुड़ीं। मदर, फादर, सन, डॉटर जैसे मूलभूत शब्द संस्कृत के मातृ, पितृ, सूनु, दुहित के वंशज हैं। भारत की यूरोप को और उसके द्वारा आधुनिक संसार को सबसे बड़ी देन भाषा का परिष्कार है- ऐसी भाषा जो सतत सर्जनशील है। इस पृष्ठभूमि में हिंदी समाज को समय के साथ अपनी भाषा को अधिक ग्राह्य और व्यापक बनाना होगा। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। प्राचीनकाल में हिंदू संस्कृति ही भारत की प्रतिनिधि संस्कृति रही है। इसके दो कारण रहे हैं- एक तो हिंदू संस्कृति ने अपनी विविधता और समन्वयवृत्ति से बौद्ध, जैन आदि मतों के अधिकांश मूल्यवान विचारों एवं शिक्षाओं को बहुत कुछ आत्मसात किया। दूसरे, भारत में जैसा सर्वांगीण विकास हिंदू संस्कृति का हुआ, वैसा किसी दूसरी संस्कृति का नहीं हो सका।

संस्कृति से जुड़ा मुद्दा है- हिंदी समाज की सक्रियता का। अपनी भाषा और संस्कृति पर गौरव के साथ अपने कर्तव्य को भी याद रखना होगा। हिंदी के अध्यापकों, लेखकों, प्रकाशकों, पत्रकारों, छात्रों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हिंदी भाषी लोगों की संख्या करोड़ों में हैं। फिर भी ऐसा क्यों होता है कि हिंदी समाज पुस्तक प्रेमी समाज नहीं बन पाया है। चीनी, जापानी, जर्मन या अंग्रेजी भाषियों के देशों में क्या आधुनिक संसाधन नहीं पहुंचे हैं? टेलीविजन या इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम भारत से कम नहीं हैं। फिर हिंदी समाज के लिए पुस्तकों के लिए गहरे लगाव का संकट क्यों है? हर हिंदी प्रेमी यदि पांच-दस लोगों को हिंदी पुस्तक खरीदने के लिए प्रेरित करने लगे, तो हिंदी में श्रेष्ठ पुस्तकों के प्रकाशन और बिक्री की संख्या करोड़ों में पहुंच सकती है। पाठकों की अपेक्षाओं के अनुरूप पुस्तकें प्रकाशित होनी चाहिए। जिस तरह पुराने समय में हर मंदिर के साथ गुरुकुल और आयुर्वेद औषधि वितरण केंद्र होता था, वर्तमान दौर में अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए चिंता करने वाले हर मंदिर, गुरद्वारे में थोड़ा स्थान पुस्तकालय और पुस्तक बिक्री केंद्र के लिए क्यों नहीं रख सकते? इससे बौद्धिक और सर्जनात्मक जिंदगी में व्यापक सक्रियता और हिस्सेदारी बढ़ेगी।

अभी तो पुराने शहरों-कस्बों में वर्षों से चल रहे अधिकांश पुस्तकालयों की दशा खराब हो रही है।ऐतिहासिक पुस्तकालयों के दुलर्भ ग्रंथ तक सुरक्षित नहीं रखे जा रहे हैं। आखिरकार, बांग्ला, मराठी, मलयालम, तमिल जैसी भारतीय भाषाओं में पुस्तक प्रेमी पाठकों की कमी नहीं है। फिर हिंदी समाज पुस्तक प्रेमी क्यों नहीं बन पा रहा है? हिंदी को संविधान की राजभाषा मान कर सरकारी औपचारिकता का कर्म कांड बनाए रखने से भाषा और समाज दोनों के लिए समस्याएं पैदा होंगी। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने दशकों पहले लिखा था-‘हमें जीवन को कर्ममय बनाने के लिए भाषा की गति को बढ़ाना चाहिए। भाषा की शिथिलता जीवन को शिथिल कर देती है।’ जो आत्मसंघर्ष, स्वाभिमान और निरंतरता हिंदी साहित्य में है, वह हिंदी समाज में पूरी तरह नहीं बन पा रही है। साहित्य और समाज की यह दूरी घातक सिद्ध हो सकती है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट में भी इस बात को रेखांकित किया गया था कि विकास के लिए सांस्कृतिक परंपरा का उपयोग होना चाहिए और इस उपयोग में मनुष्य की भाषाओं की रक्षा शामिल है। सबसे अधिक आवश्यकता हिंदी समाज की जागरूकता की है। हिंदी ने अपनी अखिल भारतीयता को बहुत ईमानदारी और निष्ठा के साथ निभाया है। हिंदी समाज का दायित्व है कि वह इस भारतीयता को श्रेष्ठतम निरूपित करते हुए विस्तार के लिए व्यापक अभियान चलाए।

हिंदी समाज में निरंतर यह चिंता होती रहती है कि हिंदी का भविष्य सरकार कब तक तय करेगी। लेकिन असलियत यह है कि सरकार से अधिक समाज को ही यह उत्तरदायित्व निभाना होगा। हर वर्ष श्राद्ध की तरह पूर्वजों को स्मरण करना जितना उचित है, उतना ही अधिक आवश्यक है कि पूरे वर्ष ही अपने पूर्वजों के संस्कारों का पालन किया जाए। इसी तरह हिंदी दिवस और पखवाड़े पर संकल्प लेने के साथ आवश्यक यह है कि अपने परिवारों को हिंदी भाषा से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएं। राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए 1967 से लगातार आंदोलन होते रहे। इन आंदोलनों के बल पर छात्र राजनीति से निकले लोग सत्ता की राजनीति में शीर्ष पर भी पहुंचे। लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों के बहाने उनके हाथ बंधे रहे। जो देश दुनिया की परवाह न कर परमाणु परीक्षण कर सकता है और अब चीन तथा जापान के साथ प्रतियोगिता में अग्रणी रहना चाहता है, वह किसी एक वर्ष को आधार बना कर हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सही ढंग से सिंहासन पर बैठा सकता है। अब संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के सहयोग के लिए भारत सरकार की ओर से ही विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन में न्यूयार्क में एक सौ करोड़ रुपए दिए जाने की घोषणा हुई। लेकिन एक दशक तक लालफीताशाही ने इस काम के लिए कोई पहल नहीं की। दुर्भाग्य यह भी है कि भारतीय दूतावासों के माध्यम से हिंदी की पुस्तकों की उपलब्धता के लिए विदेश मंत्रालय के अंग्रेजीदां अधिकारियों ने लगातार पुस्तकों का इंतजाम ही बंद कर दिया, जबकि चीन, जापान, चेक गणराज्य, जर्मनी जैसे देशों में भी विश्वविद्यालयों के छात्रों के लिए हिंदी की पुस्तकें मिलना कठिन होता है। इस तरह केवल मॉरीशस या सूरीनाम जैसे देशों में ही नहीं एशिया और यूरोप के देशों में भी हिंदी की पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए विदेश मंत्रालय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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