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राजनीति: शिक्षकों की कमी से जूझती उच्च शिक्षा

अक्सर कहा जाता है कि विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि जब इतनी बड़ी तादाद में उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के पद रिक्त हों तो दूसरे मानकों पर वे कैसे खरे उतर सकते हैं। आजादी के बाद देश में उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार की जो उम्मीद की गई थी, वह शायद धरी रह गई।

Author August 10, 2018 2:10 AM
देश के इन तमाम विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने क लिए अनुबंध शिक्षकों की भर्ती और पीएचडी करने वाले अभ्यर्थियों से भी पढ़ाई करवाई जा रही है।

देवेंद्र जोशी

जब उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ रही हो और उन्हें शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षकों की संख्या में निरंतर कमी आती जा रही हो, तो ऐसे में विश्व गुरु बनने के दावे को कैसे देखा जाएगा! उच्च शिक्षा पर कराए गए एक सर्वे की 2017-18 की रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन वर्षों में देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की कुल संख्या में दो लाख से ज्यादा की कमी आई है। प्राध्यापकों के खाली पड़े पदों को लेकर पिछले महीने लोकसभा में सवाल भी उठा था। तब मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से बताया गया कि रिक्तियां भरना एक सतत् प्रक्रिया है और यह काम विश्वविद्यालयों का है। इसमें सरकार कोई दखल नहीं दे सकती।

देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के खाली पद भरने का काम भले ही मंथर गति से हो रहा हो, लेकिन उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। इस मसले पर जारी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात पहली बार पच्चीस फीसद से अधिक हुआ है और सरकार का लक्ष्य 2022 तक इसे तीस फीसद करने का है। लेकिन यह लक्ष्य बिना शिक्षकों की संख्या बढ़ाए हासिल कर पाना असंभव है। उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले देश के आठ सौ चौंसठ विश्वविद्यालयों के चालीस हजार से ज्यादा कॉलेजों में कुल शिक्षकों की संख्या तेरह लाख पैंसठ हजार सात सौ छियासी है। इसमें चालीस फीसद महिलाएं हैं। देश के दूरदराज के इलाकों के विश्वविद्यालय और कॉलेज ही शिक्षकों की कमी की समस्या से नहीं जूझ रहे हैं, बल्कि राज्यों की राजधानियों और देश के प्रतिष्ठित महाविद्यालयों में भी शिक्षकों की काफी कमी है। देश में चालीस केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। इनमें प्राध्यापकों के दो हजार चार सौ छिहत्तर पद स्वीकृत हैं, जिनमें से तेरह सौ पद खाली पड़े हैं। यानी करीब चौवन फीसद प्राध्यापकों की कमी है। दिल्ली विश्वविद्यालय में उनसठ और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पचास फीसद शिक्षकों के पद रिक्त हैं। यानी यहां दो सौ प्राध्यापकों का काम सौ शिक्षकों से चलाया जा रहा है। इसी तरह अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापकों की भारी कमी है। देश में हरियाणा और केंद्रीय विश्वविद्यालय ओड़िशा ही ऐसे हैं, जहां शिक्षकों का एक भी पद खाली नहीं है।

देश के इन तमाम विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने क लिए अनुबंध शिक्षकों की भर्ती और पीएचडी करने वाले अभ्यर्थियों से भी पढ़ाई करवाई जा रही है। कई विश्वविद्यालय महज दस-बारह फीसद शिक्षकों के सहारे ही चल रहे हैं, तो कई पाठ्यक्रम और कॉलेज जेआरएफ शिक्षकों के सहारे चल रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में साढ़े चार हजार तदर्थ शिक्षक हैं, जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के मुताबिक दस फीसदी से ज्यादा तदर्थ शिक्षक नहीं होने चाहिए। लेकिन इस मामले में ज्यादातर विश्वविद्यालयों का आंकड़ा पचास फीसद को पार कर गया है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद इन तदर्थ शिक्षकों की नौकरी खतरे में है। प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थिति भी इस मामले में कोई अलग नहीं है। मार्च 2018 तक देश की आइआइटी में दो हजार आठ सौ छह पद खाली पड़े थे। समय-समय पर इसे लेकर संसद और अन्य मंचों पर चिंता जताई जाती रही है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। तमाम कोशिशों के बावजूद ऐसी स्थिति आज तक नहीं बन पाई कि पद रिक्त होने से पहले ही भर्ती की प्रक्रिया शुरू हो जाए। तमाम दावों-घोषणाओं के बावजूद न तो शिक्षकों के पद भरे जा रहे हैं और न ही तदर्थ शिक्षकों को नियमित किया जा रहा है। देश के अनेक उच्च शिक्षा संस्थानों में पंद्रह साल या इससे भी अधिक वर्षों से तदर्थ शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उन्हें तय मानकों के अनुसार वेतन और अन्य सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं। अनेक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय शिक्षकों को तीस हजार रुपए मासिक पारिश्रमिक पर तो कहीं-कहीं प्रति कक्षा के हिसाब से काम लिया जा रहा है, जिसमें आय महीने में बीस हजार रुपए से भी कम है। कुछ पाठ्यक्रम तो ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं हैं। कहीं-कहीं आनुपातिक तौर पर बेहद कम शिक्षक हैं। जैसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में डेढ़ हजार विद्यार्थियों के लिए केवल चार शिक्षक हैं। ऐसे में यह गंभीर सवाल है कि उच्च शिक्षा का स्तर सुधरे तो आखिर कैसे? अक्सर कहा जाता है कि विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि जब इतनी बड़ी तादाद में उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के पद रिक्त हों तो दूसरे मानकों पर वे कैसे खरे उतर सकते हैं। आजादी के बाद देश में उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार की जो उम्मीद की गई थी, वह शायद धरी रह गई। आज देश का युवा उच्च शिक्षा के लिए आतुर है। विविधतापूर्ण विषयों के साथ उच्च शिक्षा के विकल्प भी तेजी से बढ़े हैं। लेकिन सुविधाएं नदारद और शिक्षक गायब हैं। इसी का नतीजा है कि उच्च शिक्षा से छात्रों का पलायन हो रहा है। जबकि सरकार विदेशी विद्यार्थियों को भारत बुलाने के आकर्षण में उलझी है।

यों भारतीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए केंद्र सरकार बड़े स्तर पर काम कर रही है। इसके लिए एक अलग कोष बनाया गया है और दुनिया के कई देशों के साथ शैक्षणिक सुधार को लेकर अनुबंध किया गया है। लेकिन धरातल पर ये सुधार कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। अगर यूजीसी के ही आंकड़ों को सही मानें तो केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के सत्रह हजार एक सौ छह पदों में से करीब छह हजार पद खाली हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद राज्यों के अधीन विश्वविद्यालयों, निजी विश्वविद्यालयों और डीम्ड विश्वविद्यालयों की स्थिति आज भी ज्यों की त्यों ही हैं। शिक्षकों की यह कमी देश में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की कमी से निपटने के लिए पचहत्तर वर्ष तक के शिक्षकों को पुन: नियोजित करने की योजना बना रहा है। इससे उन युवाओं की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है जो नेट और पीचडी उपाधि के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों में नौकरी पाने की आस में बैठे हैं। बीते कुछ वर्षों से यह प्रचारित किया जाता रहा है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों की कमी की एक बड़ी वजह देश में शिक्षक बनने लायक पात्र युवाओं की अनुपलब्धता है। लेकिन यह तर्क इसलिए सटीक नहीं बैठता कि अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वे की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक प्रति वर्ष पच्चीस हजार युवा पीएचडी उपाधि प्राप्त कर रहे हैं। इसके अलावा यूजीसी आइसीए और आइसीएस द्वारा आयोजित नेट परीक्षा में औसत पचास हजार युवा जेआरएफ या नेट परीक्षा पास करते हैं। राज्यों की सेट परीक्षा में पच्चीस से तीस हजार युवा सफल होते हैं। कुल मिला कर उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए हर साल करीब एक लाख दावेदार शिक्षक उपलब्ध होते हैं। बीते दस सालों में करीब दस लाख उपलब्ध आवेदकों की तुलना में कुल प्राध्यापकों की रिक्तियां सिर्फ पांच लाख ही हैं। अगर सभी रिक्त पद भर भी दिए जाएं तब भी पांच लाख योग्य आवेदक नौकरी हासिल करने से वंचित रह जाएंगे। कमी योग्य उम्मीदवारों की नहीं, उन्हें नियुक्त करने की इच्छाशक्ति की है। केंद्र और राज्य सरकारें अगर मिल कर ठोस कार्ययोजना के तहत देश के सभी उपलब्ध योग्य आवेदकों का पंजीयन करें तो यह बात खुद ही स्पष्ट हो जाएगी कि देश में काबिल युवाओं की कोई कमी नहीं है।

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