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राजनीति: सवालों के घेरे में गंगा की सफाई

गंगा के तट पर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से नदी के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। उचित होगा कि गंगा तट पर बसे औद्योगिक शहरों के कल-कारखानों के कचरे को गंगा में गिरने से रोका जाए। गंगा की सफाई हिमालय क्षेत्र से इसके उद्गम से शुरू करके मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी और अन्य सहायक नदियों तक में होनी चाहिए। प्रदूषण की वजह से गंगा नदी में आक्सीजन की मात्रा काफी कम हो गई है।

Author August 4, 2018 1:45 AM
बनारस में गंगा नदी का अस्सी घाट (फोटो सोर्स- पीटीआई)

गंगा में बढ़ते प्रदूषण को लेकर राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने एक बार फिर गंगा सफाई मिशन पर तल्ख टिप्पणी की है। एनजीटी ने कहा है कि अगर सिगरेट के पैकेट पर ‘स्वास्थ्य के लिए हानिकारक’ चेतावनी लिख सकते हैं, तो फिर प्रदूषित गंगा के पानी को लेकर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता। हाल में एनजीटी को कहना पड़ा है कि हरिद्वार और उन्नाव के बीच गंगा नदी का पानी पीने लायक नहीं है। लिहाजा, एनजीटी ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को हर सौ किलोमीटर पर बोर्ड लगाने का निर्देश देते हुए यह सुनिश्चित करने को कहा है कि वह लोगों को बताए कि यह जल पीने या नहाने योग्य नहीं है। यह स्थिति तब है जब अधिकरण गंगा में गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ संबंधित एजंसियों को पचास हजार रुपए जुर्माना लगाने का आदेश दे चुका है। एनजीटी ने न केवल जुर्माने का आदेश दिया था, बल्कि आदेशों का उलंघन करने वालों पर नजर रखने के लिए कमेटी भी बनाई थी। एनजीटी ने पिछले साल गंगा को निर्मल बनाने के लिए अपने ऐतिहासिक फैसले में नदी के किनारे से सौ मीटर की दूरी तक के क्षेत्र को ‘नो डवलपमेंट जोन’ घोषित करने का आदेश दिया था। इस आदेश के मुताबिक इस सौ मीटर दायरे में अब किसी तरह का निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता। इस बार के आदेश में भी एनजीटी ने हरिद्वार से लेकर उन्नाव तक गंगा तट से सौ मीटर की दूरी तक किसी भी तरह का निर्माण नहीं करने का आदेश दिया है। साथ ही कहा है कि अगर सौ मीटर के दायरे में कोई फैक्ट्री या निर्माण कार्य हो रहा है तो उसे तुरंत कहीं और ले जाया जाए।

हैरानी की बात है कि एनजीटी की इतनी सख्ती के बावजूद गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में प्रयास नहीं हो रहा है। इसी से नाराज होकर एनजीटी ने गत वर्ष यह सवाल दागा था कि हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद गंगा की स्थिति में सुधार क्यों नहीं हो रहा है? क्यों न समझा जाए कि अगर गंगा में प्रदूषण बढ़ रहा है तो इसका सीधा मतलब यह है कि गंगा निर्मलीकरण की रफ्तार सुस्त है और इसे लेकर नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय गंभीर नहीं है। एनजीटी की नाराजगी अस्वाभाविक नहीं है। हालत यह है कि सरकार द्वारा गंगा की सफाई के लिए जारी धनराशि भी पूरी तरह खर्च नहीं हो पा रही है। ऐसे में इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है कि तय समय में गंगा को प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है।
गौरतलब है कि 1985 में उच्चतम न्यायालय के वकील एमसी मेहता ने गंगा की सफाई को लेकर याचिका दायर की थी। 2014 में उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका को एनजीटी के पास भेज दिया। तब याचिकाकर्ता ने गंगा की सफाई के नाम पर हुए खर्च की सीबीआइ या कैग से जांच कराने की मांग की थी। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने गंगा को निर्मल बनाने के लिए अलग मंत्रालय का गठन कर 2037 करोड़ रुपए की नमामि गंगे योजना शुरू की थी। इसके तहत गंगा को प्रदूषित करने वाले उद्योगों पर निगरानी रखने, उनके खिलाफ कार्रवाई करने और गंगा किनारे स्थित एक सौ अठारह शहरों और जिलों में जल शोधन संयंत्र बनाने, गंगा किनारे स्थित श्मशान घाटों पर लकड़ी से बने प्लेटफार्म को उन्नत बनाने और प्रदूषण एवं गंदगी फैलाने वालों पर लगाम लगाना सुनिश्चित हुआ था। लेकिन अभी तक यह सिर्फ कागजी कार्रवाई ही प्रतीत हुई है। हालत यह है कि आज भी प्रतिदिन गंगा में तीन करोड़ लीटर गंदा पानी बहाया जा रहा है। इसमें दो करोड़ लीटर सीवेज और एक करोड़ लीटर औद्योगिक कचरा होता है। गंगा की दुर्गति के लिए मुख्य रूप से सीवर और औद्योगिक कचरा ही जिम्मेदार है जो बिना शोधित किए नदी में बहा दिया जाता है।

गंगा नदी के तट पर स्थित साढ़े सात सौ से ज्यादा उद्योग और इससे निकलने वाले हानिकारक अवशिष्ट संकट का कारण बने हुए हैं। इनमें साढ़े चार सौ चमड़ा उद्योग, सत्ताईस रासायनिक उद्योग, सड़सठ चीनी मिलें और तैंतीस शराब कारखाने शामिल हैं। जल विकास अभिकरण की मानें तो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा तट पर स्थित इन उद्योगों द्वारा प्रतिदिन एक सौ बारह करोड़ लीटर से ज्यादा जल का उपयोग किया जाता है। इनमें रसायन उद्योग इक्कीस करोड़ लीटर, शराब उद्योग आठ करोड़ लीटर, चीनी उद्योग तीस करोड़ लीटर, कागज उद्योग तीस करोड़ करोड़ लीटर, कपड़ा एवं रंग उद्योग डेढ़ करोड़ लीटर और अन्य उद्योग करीब सत्रह करोड़ लीटर गंगाजल का उपयोग प्रतिदिन कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा नदी के तट पर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से नदी के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। उचित होगा कि गंगा तट पर बसे औद्योगिक शहरों के कल-कारखानों के कचरे को गंगा में गिरने से रोका जाए। गंगा की सफाई हिमालय क्षेत्र से इसके उद्गम से शुरू करके मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी और अन्य सहायक नदियों तक में होनी चाहिए। प्रदूषण की वजह से गंगा नदी में आक्सीजन की मात्रा काफी कम हो गई है। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरे को बहाने से पानी में घातक रसायनों की मात्रा बढ़ी है। गोमुख से गंगोत्री तक कालीफार्म बैक्टीरिया की उपस्थिति दर्ज की गई है जो अनेक बीमारियों की जड़ है। वैज्ञानिकों ने माना कि इस बैक्टीरिया की मुख्य वजह गंगा में मानव और जानवरों का मल-मूत्र बहाया जाना है। ई-कॉइल बैक्टीरिया की वजह से सालाना लाखों लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आते हैं। प्रदूषण के कारण गंगा के जल में कैंसर कारक तत्व भी बढ़ रहे हैं। पानी में क्रोमियम, जिंक, सीसा, आर्सेनिक, मरकरी की मात्रा बढ़ती जा रही है।

एनजीटी ने गोमुख से हरिद्वार तक गंगा किनारे प्लास्टिक पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। आज भी गंगा के तट पर हर साल लाखों शव जलाए जाते हैं और उनकी राख पानी में प्रवाहित कर दी जाती है। यह भी देखा जाता है कि गंगा में फूल, पत्ते, नारियल, प्लास्टिक और ऐसे ही अन्य अवशिष्टों को बहाया जाता है। आखिर इस तरह के कृत्यों से गंगा कैसे प्रदूषण मुक्त होगी? ध्यान रखना होगा कि जब तक आस्था के उफनते ज्वार पर नैतिक रूप से लगाम नहीं लगेगी, तब तक गंगा का निर्मलीकरण संभव नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर सरकार ने गंगा के किनारे दो किलोमीटर के दायरे में पॉलिथिन और प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया था। लेकिन यह प्रतिबंध सिर्फ दिखावा साबित हुआ है। मनाही के बावजूद गंगा किनारे पॉलिथिन और प्लास्टिक के ढेर देखे जा सकते हैं। इसके लिए सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि समाज भी जिम्मेदार है। पर्यावरणविदों की मानें तो गंगा की दुर्दशा के लिए गंगा पर बनाए जा रहे बांध भी जिम्मेदार हैं। गोमुख से निकलने के बाद गंगा का सबसे बड़ा कैदखाना टिहरी जलाशय है। इस जलाशय से कई राज्यों को पानी और बिजली की आपूर्ति होती है। यह भारत की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजनाओं में से है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी कीमत गंगा को विलुप्त होकर चुकानी पड़ेगी। ऐसा इसलिए कि गंगा पर बांध बनाए जाने से जल प्रवाह में कमी आई है। प्रवाह की गति धीमी होने से गंगा में बहाए जा रहे कचरे, सीवर के पानी और घातक रसायनों का बहाव समुचित रूप से नहीं हो रहा है। उचित होगा कि गंगा के प्रवाह को गति दी जाए और एनजीटी के निर्देशों का समुचित पालन किया जाए, ताकि गंगा का पानी पीने योग्य हो सके।

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