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राजनीति: दूरस्थ शिक्षा की चुनौतियां

उच्चस्थ नीति-निर्माता अब भी मुक्त और दूरस्थ शिक्षा की महत्ता, गुणवत्ता और प्रयोजन से वाकिफ नहीं हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था डिग्री पाने का एक आसान रास्ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अभी भी पत्राचार शिक्षण व्यवस्था का भाव स्थायी रूप से उनके मन-मस्तिष्क पर अंकित है। अब भी उन्होंने मान रखा है कि ‘कक्षा शिक्षा पद्धति’ ‘दूरस्थ और मुक्त शिक्षा पद्धति’ से बेहतर और उत्कृष्ट है।

Author July 20, 2018 6:34 AM
दूरस्थ शिक्षा पद्धति द्वारा अंग्रेजी और हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं में अध्ययन सामग्री निर्मित हुई है। आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब विद्यार्थी अपनी भाषा में पढ़ाई कर सकते हैं।

सत्यकाम

पिछले कुछ समय से सरकार शिक्षा को लेकर गहन मंथन की प्रक्रिया में है और पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था पर आधारित शिक्षा और शिक्षण संस्थाओं के आमूलचूल परिवर्तन की बात चल रही है। इस परिवर्तन में ‘दूरस्थ शिक्षा’ अब भी नजरों से दूर है और है भी तो कहीं किनारे कोने में। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के गलियारे में, दूरस्थ शिक्षा से दूर विशेषज्ञों के जिम्मे सब कुछ सौंप दिया गया है। भारत में सबसे पहले केंद्रीय दूरस्थ और मुक्त शिक्षण संस्थान के रूप में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) की स्थापना 1985 में संसद के अधिनियम के तहत हुई थी। इसकी स्थापना का उद्देश्य उन लोगों तक शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार करना था, जो आर्थिक, सामाजिक और अन्य कारणों से शिक्षा से वंचित रह गए। इस विश्वविद्यालय की स्थापना के पहले 1962 में दिल्ली विश्वविद्यालय के तहत पत्राचार शिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी, पर भौगोलिक और शैक्षिक दृष्टि से उसका दायरा सीमित था और यह दूरस्थ शिक्षण पद्धति का आरंभिक चरण था, जब केवल मुद्रित सामग्री विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाती थी और इसे ‘पत्राचार’ के नाम से जाना जाता था। शिक्षा जगत में इसकी स्थिति ‘अछूत’ जैसी थी।

यह दूरस्थ शिक्षा की पूर्व पीठिका थी। बीस वर्ष बाद 1982 में ‘आंध्र प्रदेश ओपन यूनिवर्सिटी’ की स्थापना हुई। 2011 में इसका नाम बदल कर डॉ. बीआर आंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी कर दिया गया। इग्नू की स्थापना के बाद पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर इस ‘नई अध्ययन पद्धति’ की शुरुआत हुई, जिसे मुक्त और दूरस्थ शिक्षा / अध्ययन (ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग) के नाम से जाना गया। आज देश और विदेश के लगभग तीस लाख विद्यार्थी इग्नू में पढ़ाई कर रहे हैं। इसके अलावा पूरे देश में चौदह राज्य मुक्त विश्वविद्यालय हैं। एक सौ दस अन्य विश्वविद्यालय भी यह अध्ययन पद्धति अपनाते हैं। विश्वविद्यालयों में अध्ययन, अध्यापन, अनुसंधान, प्रशिक्षण और विस्तार सेवा से संबंधित कार्यक्रमों द्वारा दूरस्थ मुक्त शिक्षा का आयाम विस्तृत हुआ है। देश में पहली बार ‘च्वाइस बेस्ड’ कार्यक्रम की शुरुआत इग्नू से हुई, जिसका अभी हाल में यूजीसी ने भी अनुकरण किया। आज सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ‘च्वाइस बेस्ड सिस्टम’ के तहत पाठ्यचर्या तैयार की गई है। दूरस्थ शिक्षा प्रणाली में अध्ययन-अध्यापन की आधारभूत धारणा विद्यार्थी केंद्रित अध्ययन पद्धति है। यह परंपरागत शिक्षा-व्यवस्था से इस मायने में भिन्न है कि इसमें विद्यार्थी केंद्र में होते हैं, शिक्षक नहीं। इससे शिक्षा जगत में एक नई दृष्टि विकसित हुई। पहली बार शिक्षा पद्धति में विद्यार्थी केंद्र में आए, उनकी जरूरत को ध्यान में रख कर शिक्षण कार्यक्रम, पाठचर्या और पाठ्यक्रम तैयार किए गए। इतना ही नहीं, दूरस्थ मुक्त शिक्षा ने शिक्षा का लोकतंत्रीकरण किया और यह जन-जन तक शिक्षा पहुंचाने का माध्यम बनी। यह शिक्षा व्यवस्था उन लोगों को ध्यान में रख कर तैयार की गई, जो परंपरागत शिक्षा-व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक कारणों से भागीदार नहीं बन सके। किसी की उम्र ज्यादा हो गई थी, कोई अपनी निर्धनता के कारण स्कूल और कॉलेज नहीं जा सके थे, कई समूहों की सामाजिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे परंपरागत विद्यालय और विश्वविद्यालय में जा सकें। पहली बार ऐसे वंचितों, निर्धन और सुविधाहीन लोगों के लिए एक नया द्वार खुला, जिन्होंने शिक्षण संस्थानों का मुंह नहीं देखा या इसकी दहलीज पर पैर नहीं रखा था और जो शिक्षा प्राप्ति का सपना भी नहीं देख सकते थे, अब ऐसे विद्यार्थी भी स्नातक कार्यक्रम में दाखिला ले सकते थे और ले सकते हैं जिन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की। उन बहुत से विद्यार्थियों को स्नातक उपाधि कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला, जिनके पास योग्यता तो थी, लेकिन कोई डिग्री नहीं थी। बहुत से कामगार, मजदूर, किसान, महिलाएं, वंचित समूहों के लिए स्नातक बनने का रास्ता खुला और उन्हें समाज में अपना स्थान निर्धारित करने का मौका मिला। जैसे- जेल के कैदियों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करना, जिन गांवों में स्कूल नहीं है या पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है, उन स्थानों पर विशेष अध्ययन केंद्रों की स्थापना, घर-घर जाकर शिक्षा के महत्त्व को समझाना, जुलाहों, बुनकरों, कारीगरों का शिक्षण-प्रशिक्षण आदि के माध्यम से शिक्षा घर-घर पहुंच रही है।

उच्चस्थ नीति-निर्माता अब भी मुक्त और दूरस्थ शिक्षा की महत्ता, गुणवत्ता और प्रयोजन से वाकिफ नहीं हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था डिग्री पाने का एक आसान रास्ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अभी भी पत्राचार शिक्षण व्यवस्था का भाव स्थायी रूप से उनके मन-मस्तिष्क पर अंकित है। अब भी उन्होंने मान रखा है कि ‘कक्षा शिक्षा पद्धति’ ‘दूरस्थ और मुक्त शिक्षा पद्धति’ से बेहतर और उत्कृष्ट है। यह धारणा कोरा भ्रम और पूर्व निर्धारित अवधारणा की प्रतिच्छाया है। उन्हें ऐसा लगता है कि जिन विद्यार्थियों को कहीं दाखिला नहीं मिलता, वे मुक्त विश्वविद्यालयों में दाखिला लेते हैं और वे दोयम दर्जे के होते हैं, उनमें स्तरीयता नहीं होती। जिस प्रकार की शिक्षण व्यवस्था हमारे देश में व्याप्त है जिसमें अंकों और ग्रेडों से विद्यार्थियों की गुणवत्ता मापी जाती है, वहां ऐसी सोच का जन्म लाजिमी है। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी की गुणवत्ता और कौशल पीछे रह जाते हैं और अगर एक बार उसे कम अंक प्राप्त हो जाते हैं तो उसके लिए उच्च शिक्षा के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। मुक्त विश्वविद्यालय ऐसे ही ‘सर्जनात्मक’ विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का द्वार खोलता है, जो परंपरागत घुड़दौड़ में अव्वल नहीं आ पा रहे हैं, जबकि उनमें अपार संभावनाएं और क्षमताएं हैं। यह सही है कि इनमें प्रवेश लेना आसान है, लेकिन उनके परीक्षाफल बताते हैं कि यहां की उच्च गुणवत्ता के मानदंडों को पूरा कर उत्तीर्ण होना एक टेढ़ी खीर है। दूरस्थ शिक्षा को लेकर नजरिया स्पष्ट था कि स्नातक स्तर का विद्यार्थी जब अपनी डिग्री लेकर बाहर निकले तो वह बेरोजगार किताबी कीड़ा न हो, बल्कि उसके पास कौशल हो। पर अफसोस यूजीसी ने ‘हैंड्स ऑन ट्रेनिंग’ के नाम पर दूर शिक्षा प्रणाली को कौशल विकास के कार्यक्रम बनाने से वंचित कर दिया है। यही भारतीय शिक्षा पद्धति का अंतर्विरोध और विरोधाभास है। यूजीसी तकनीकी प्रयासों को ‘कक्षा-शिक्षण पद्धति’ में लागू करने की वकालत कर रहा है। मसलन भारतीय संस्करण-स्वयंप्रभा, मल्टीमीडिया अप्रोच, स्मार्ट क्लास- ये सब दूरस्थ शिक्षण से जुड़ी प्रौद्योगीकियों या कहें दूरस्थ शिक्षा द्वारा प्रयुक्त प्रौद्योगीकियों का अनुसरण है। यूजीसी के इस प्रयास से दूरस्थ शिक्षण पद्धति और कक्षा केंद्रित शिक्षण पद्धति की दूरी मिटती जा रही है। शिक्षकों की लगातार होती कमी और विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या की समस्या दूरस्थ शिक्षण पद्धति और उसके द्वारा प्रमुख नवीनतम प्रौद्योगीकियों के माध्यम से ही हल हो सकती है।

अगर भारत को पूर्ण साक्षर और शिक्षित बनना है तो हमें इसे सम्मान सहित अपनाना होगा और वही दर्जा देना होगा, जो कक्षा शिक्षण पद्धति को प्राप्त है। रूढ़िग्रस्त मानसिकता से बाहर निकल कर ही हम अपने को कुएं का मेढक बनने से रोक सकते हैं। दूरस्थ शिक्षा पद्धति द्वारा अंग्रेजी और हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं में अध्ययन सामग्री निर्मित हुई है। आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब विद्यार्थी अपनी भाषा में पढ़ाई कर सकते हैं। इससे भारतीय भाषाओं में आधुनिक ज्ञान और विज्ञान का विपुल भंडार निर्मित हुआ है। इससे भारतीय भाषाएं भी समृद्ध हुई हैं और विद्यार्थी भी लाभान्वित हुए हैं। दूरस्थ अध्ययन पद्धति प्रौद्योगिकी के साथ-साथ बदलती है और वही दूरस्थ विश्वविद्यालय और संस्थाएं बेहतर शिक्षा दे पाएंगी, जो तेजी से बदलेंगी। पत्राचार से, स्वाध्याय साम्रगी और आडियो-वीडियो, रेडियो, टेलीविजन की ओर कदम आगे बढ़े। अब ऑनलाइन अध्ययन का आगाज है। अब देश ‘ओपन डिस्टेंस लर्निंग’ से ‘ओपन डिजिटल लर्निंग’ की ओर बढ़ रहा है। इसलिए जरूरत इस बात को स्वीकार करने की है कि भविष्य दूरस्थ शिक्षा का है और इसे जितनी जल्दी समझा जाएगा, भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए उतना ही उत्तम और श्रेयस्कर होगा।

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