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राजनीति : जापान से हम क्या सीखें

दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा किसी भी मामले में जापान के हवाई अड्डों से कमतर नहीं है, यही बात कनाट प्लेस बाजार के बारे में भी कही जा सकती है। लेकिन जब बात नैतिक मूल्यों या अनुशासन की आती है तो हम जापानियों के सामने कहीं नहीं टिकते। किसी भी राष्ट्र के विकास में वहां के नागरिकों की कार्य-संस्कृति, मानवीय मूल्य, सामूहिकता की भावना आदि ज्यादा जरूरी पक्ष होते हैं।

Author July 6, 2018 2:10 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सत्येंद्र श्रीवास्तव

फरवरी, 1897 में मद्रास (अब चेन्नई) के एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हर भारतीय को अपने जीवन में एक बार जापान जरूर जाना चाहिए। सरसरी तौर पर इस सुझाव का निहितार्थ समझ में नहीं आता, लेकिन जब आप विवेकानंद को समग्रता में पढ़ेंगे तो इसकी गंभीरता समझ में आती है। एक गौरवशाली अतीत के होते हुए भी जब तत्कालीन भारत के पिछड़ेपन के कारणों का विश्लेषण उन्होंने किया तो पाया कि हमारी निष्क्रियता, सामाजिक-धार्मिक रूढ़िवादिता और राष्ट्र के प्रति उदासीनता प्रमुख कारण हैं। विश्व धर्म-संसद (शिकागो) में भाग लेने के लिए अमेरिका जाते समय अपने जापान प्रवास (जुलाई 1893) के दौरान वे जापान की कार्य-संस्कृति, अनुशासन, सामाजिक-नैतिक मूल्य और उनके राष्ट्र प्रेम से बेहद प्रभावित हुए। यही वह बात है जिसे देखने, समझने और उससे सीखने के लिए वे हर भारतीय को एक बार जापान जाने की सलाह दे रहे हैं।

अपने वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के बावजूद जापानी लोगों की कार्य-शैली में नैतिक मूल्य सर्वोच्च हैं। इसीलिए जब कुछ दिन पहले यह खबर पढ़ने को मिली कि वहां के एक कर्मचारी का वेतन इसलिए काट लिया गया कि वह दोपहर के भोजनावकाश के लिए तीन मिनट पहले चला गया था या फिर एक ट्रेन के स्टेशन मास्टर ने सार्वजनिक तौर पर इसलिए माफी मांगी कि ट्रेन सत्तर सेकेंड देरी से पहुंची, तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सुनने में यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है। लेकिन जब आप जापान जाएंगे तो ये सारी बातें खुद समझ में आ जाएंगी। हवाई अड्डे को छोड़, कहीं भी पुलिस देखने को नहीं मिलेगी, लोग बिना किसी ट्रैफिक पुलिस के स्वत: ही यातायात नियमों का पालन करते हैं। सार्वजनिक यातायात में उनकी समयबद्धता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कोबे से हिरोशिमा आने-जाने की लगभग साढ़े पांच सौ किलोमीटर की दूरी चार घंटे में पूरी की जा सकती है, जिसमें एक घंटे में हिरोशिमा शांति स्मारक देखने का कार्यक्रम भी हो सकता है। इसकी एक सतही व्याख्या यह हो सकती है कि यह सब तो तकनीक का कमाल है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि उस तकनीक को संचालित करने वाला किसी न किसी बिंदु पर एक इंसान है, जो अपने कार्य के प्रति पूरा मुस्तैद है। जापान या इस तरह का कोई भी देश अपने ऊंचे भवनों, आधुनिक उद्योग-धंधों, चौड़ी सड़कों और चमचमाते शॉपिंग मॉलों या हवाई अड्डों से महान नहीं बनता। ये सभी चीजें किसी राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य शर्त हो सकती हैं, लेकिन पर्याप्त शर्त नहीं। दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा किसी भी मामले में जापान के हवाई अड्डों से कमतर नहीं है, यही बात कनाट प्लेस बाजार के बारे में भी कही जा सकती है। लेकिन जब बात नैतिक मूल्यों या अनुशासन की आती है तो हम जापानियों के सामने कहीं नहीं टिकते।

किसी भी राष्ट्र के विकास में वहां के नागरिकों की कार्य-संस्कृति, मानवीय मूल्य, सामूहिकता की भावना आदि ज्यादा जरूरी पक्ष होते हैं। अफसोस, जहां हम पहले मापदंड पर तेजी से बढ़ रहे हैं वहीं दूसरे पर उतनी ही तेजी से नीचे गिरते जा रहे हैं। हममें से ज्यादातर लोगों के केंद्र में ‘मैं’ रहता है, उसमें दूसरे लोग या समाज तभी आता है, जब उसका सीधा फायदा इस ‘मैं’ को मिलता है। इस ‘मैं’ से पहले दूसरे पीड़ित वर्ग, समाज या राष्ट्र को क्यों और कैसे रखा जाए, यह चीज हमें जापान से सीखनी होगी। हम बात तो वसुधैव कुटुंबकम की करते हैं, लेकिन व्यवहार में हमारा दायरा इतना सीमित होता है कि हम अपने पति-पत्नी या बच्चों से आगे सोच भी नहीं पाते। यही कारण है कि उच्च आर्थिक वृद्धि और प्रतिव्यक्ति आय बढ़ने के बावजूद एक सामूहिक राष्ट्र के रूप में हम पिछड़ जाते हैं। एक सभ्य समाज से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी सोच और व्यवहार दोनों में सभ्य रहे, लेकिन विडंबना यह है कि हमारे आदर्श तो बहुत ऊंचे हैं पर जब बात इन आदर्शों के अनुपालन की होती है तो हम पीछे हट जाते हैं। जापान में होटल, रेस्टोरेंट और अन्य दुकानों पर लगभग अस्सी फीसद कर्मी महिलाएं हैं और वहां की लगभग चालीस फीसद दुकानें चौबीसों घंटे खुली रहती हैं। उनसे बातचीत करने और उनके कामकाज के तरीके से पता चलता है कि उनके अंदर कहीं कोई असुरक्षा का भाव नहीं है। इसके विपरीत हमने ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवता’ के आदर्श को किताबों तक सीमित कर दिया। घर, परिवार व समाज में हम लड़कियों को अपेक्षित सम्मान नहीं दे पाए। हम यह तो चाहते हैं कि हमारी बहन, पत्नी और मां का इलाज कोई महिला डॉक्टर करे, लेकिन यह नहीं चाहते कि हमारे घर कोई बेटी हो। ओलंपियन सायना नेहवाल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उनके पैदा होने के कई महीनों बाद तक रिश्तेदारों ने उन्हें नहीं देखा था, क्योंकि उन्हें लड़का चाहिए था। हमारी सोच और व्यवहार में इतना बड़ा अंतराल कहीं और नहीं मिलेगा।

सन 1963 में जब विश्वस्तर पर विवेकानंद की जन्मशती मनाई जा रही थी तो जापान के प्रमुख शहरों और आठ विश्वविद्यालयों में उनकी शिक्षा और उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस तरह के 20 जनवरी, 1963 को कोलकाता में हुए एक कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- विवेकानंद ने लोगों के मन में देशभक्ति का धर्म पोषित किया, यह देशभक्ति किसी संकीर्णता के बजाय मानवता के धर्म की थी। विडंबना है कि इस तरह के ज्यादातर आयोजन हमारे यहां औपचारिकता मात्र बन कर रह गए, वहीं जापान जैसे देशों में उनके दैनिक क्रियाकलाप का हिस्सा बन गए। यह बात कितनी भी विरोधाभासी लगे, फिर भी सच है कि अपने ज्ञान-विज्ञान और गणितीय विश्लेषण में भारतीयों की एक विशिष्ट पहचान है। इसकी पुष्टि बराक ओबामा, स्टीव जाब्स, स्टीफन हॉकिंग जैसे लोग भी अपनी भारत यात्रा के दौरान कर चुके हैं। लेकिन जब बात सार्वजनिक कर्तव्य, समर्पण और अनुशासन की आती है तो हम पिछड़ जाते हैं। हमारी सोच बहुत आत्मकेंद्रित हो चुकी है। अपने परिवार से इतर देश और समाज से हमारा संबंध बेहद यांत्रिक होता है और वह व्यक्तिगत लाभ-हानि से ऊपर उठ ही नहीं पाता। निश्चित रूप से इसके कुछ अपवाद हैं। जैसे फरवरी, 2018 में राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट का युवा विश्व कप जीतने पर एक कोच के रूप में सभी सहयोगी स्टॉफ को पच्चीस लाख रुपए की समान इनाम राशि देने की सिफारिश बीसीसीआइ से की और खुद को मिलने वाली पचास लाख की राशि में भी पच्चीस लाख की कटौती करवा दी। इसी प्रकार पिछले महीने ओड़िशा के मलकानगिरि जिले के एक डॉक्टर एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए खुद चारपाई उठा कर दस किलोमीटर पैदल चले, क्योंकि सड़क न होने से एंबुलेंस का गांव पहुंचना असंभव था।

हाल में ही तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले के सरकारी स्कूल के एक शिक्षक का स्थानांतरण होने पर छठी से दसवीं कक्षा के सारे बच्चे उनसे लिपट कर इसलिए रोने लगे थे कि उस शिक्षक ने उन बच्चों को पाठ्यक्रम ही नहीं पढ़ाया, बल्कि उनके सपनों को नए पंख भी दिए। सरकार को बाद में उनका स्थानांतरण आदेश वापस लेना पड़ा। अपवाद ही सही, ये उदाहरण हमें आज के यांत्रिक और भौतिकतावादी युग में दूसरों के लिए कुछ करने, उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ने का संदेश देते हैं। आज जरूरत इन उदाहरणों को एक विस्तृत आयाम देने की है, तभी भारत को एक नैतिक और सशक्त राष्ट्र बनाने का विवेकानंद का सपना साकार हो सकेगा।

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