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राजनीति: चेतावनी भरे ये तूफान

उत्पादन बढ़ाने में हम पूरा प्रयास कर सकते हैं कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों का उपयोग हो, पर यह एक सीमा तक ही संभव होगा। अत: यह जरूरी हो जाता है कि विलासिता की वस्तुओं व गैर-जरूरी वस्तुओं का उत्पादन कम किया जाए। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

Author June 30, 2018 2:43 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

भारत डोगरा

इस वर्ष गरमी के प्रकोप ने दक्षिण एशिया के अनेक स्थानों पर रिकार्ड तोड़े हैं। तिस पर आंधी-तूफानों ने भी इस वर्ष अत्यधिक तबाही की है। केवल भारत के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 1980 और 2003 के बीच नौ बड़े तूफान दर्ज किए गए जिनमें 640 व्यक्ति मारे गए। 2013 और 2017 के बीच ऐसे 22 तूफान दर्ज हुए जिनमें 700 व्यक्ति मारे गए। पर इस वर्ष 2018 के पहले पांच-छह महीनों में ही ऐसे पचास तूफान दर्ज हो चुके हैं व उनमें पांच सौ मौतें हो चुकी हैं। इसे महज संयोग माना जाएगा, या यह मौसम में आ रहे अधिक व्यापक व दीर्घकालीन बदलावों का एक पक्ष मात्र है जो भविष्य में और भी अधिक प्रतिकूल रूप ले सकता है। इस समय विश्व-स्तर पर उपलब्ध प्रामाणिक जानकारियां तो यही बता रही हैं कि ऐसा प्रतिकूल मौसम एक अनहोनी नहीं है। अधिक जलवायु बदलाव के दौर में इसकी आशंका निरंतर बढ़ सकती है। धरती के तापमान में वृद्धि को अधिकतम 2.0 सेल्सियस तक रोकने पर काफी हद तक आम सहमति बनी है। वर्ष 1870 से अभी तक 0.80 से. की वृद्धि पहले ही हो चुकी है। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 2900 अरब टन तक रोकना जरूरी है, पर 1870 से अब तक लगभग 1600 अरब टन की वृद्धि पहले ही हो चुकी है। प्रतिवर्ष पचास अरब टन की वृद्धि हो रही है। इस हिसाब से चलता रहा तो मात्र कुछ वर्षों में पूरी कार्बन स्पेस समाप्त हो जाएगी। उसके बाद जो बदलाव होंगे वे सदा के लिए धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं।

वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने वर्ष 2020 तक के जो उत्सर्जन के अनुमान प्रस्तुत किए वे इक्कीसवीं शताब्दी में तापमान वृद्धि 2.0 से. तक रोकने के अनुकूल नहीं हैं बल्कि इक्कीसवीं शताब्दी के अंत तक 2.50 से. से 5.0 से. तक की वृद्धि का संकेत देते हैं। वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र के महानिदेशक ने टिकाऊ विकास पर विशेषज्ञों का एक पैनल नियुक्त किया जिसने बताया कि वर्ष 1990 तक समस्या की गंभीरता का पता लगने के बावजूद वर्ष 1990 और 2009 के बीच कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन में 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह उत्सर्जन वृद्धि वर्ष 2000-09 में इससे पहले के दशक की अपेक्षा और भी अधिक हो गई।  दूसरी ओर अनेक विकासशील व गरीब देशों विशेषकर छोटे द्वीपीय देशों ने मांग की है कि सहनीय सीमा को 2.0 से. से कम कर 1.50 से. कर दिया जाए। पर 1.50 से. तक तापमान-वृद्धि सीमित करने की शायद अब क्षमता नहीं बची है। अत: अब तापमान-वृद्धि को 2.0 से. तक सीमित करने के लक्ष्य की ही चर्चा हो रही है। यदि तापमान-वृद्धि 2.0 से. से पार कर गई तो चर्चित ‘टिंपिंग प्वाइंट’ पार हो जाएगा अथवा जलवायु बदलाव की समस्या को नियंत्रित करना बहुत हद तक मनुष्य की क्षमता से बाहर हो जाएगा। 2.0 से. पार करने पर धरती की प्राकृतिक प्रक्रियाएं टूटने लगेंगी। बहुत-सी ग्रीनहाउस गैसें जो साइबेरिया के ठंडे क्षेत्र में पर्माफ्रास्ट के रूप में जमी पड़ी हैं वे वायुमंडल में उत्सर्जित हो जाएंगी। आर्द्रता वाले वर्षा-वन अपनी नमी खोकर ज्वलनशील हो जाएंगे व बहुत-सी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इस कारण भी होगा। संक्षेप में स्थिति हाथ से निकल जाएगी। आपदाएं बहुत विकट हो जाएंगी, खाद्य-उत्पादन छिन्न-भिन्न या बेहद अनिश्चित हो जाएगा, कई नई बीमारियों का खतरा झेलना पड़ेगा, विभिन्न प्रजातियों के नष्ट होने की दर और तेज हो जाएगी। अत: तापमान वृद्धि 2.0 से. से कम रखना बहुत जरूरी है। बेहतर होता यदि 1.50 से. तक ही इस वृद्धि को सीमित कर पाते, जैसाकि बहुत-से देशों ने मांग की है।

फिलहाल बेहद चिंताजनक स्थिति यह है कि 2.0 से. तक तापमान वृद्धि सीमित करने का लक्ष्य भी अब बहुत कठिन होता जा रहा है। ग्रीन गठबंधन के निदेशक व कुछ समय पहले तक ब्रिटिश सरकार के सलाहकार स्टीफेन हेल ने हाल ही में लिखा है, ‘‘कड़वी सचाई तो यही है कि हम विफल हो रहे हैं। जलवायु बदलाव पर कार्य करने वाले सब के सामूहिक प्रयासों का अभी तक जो परिणाम मिला वह उससे बहुत कम है जो संकट के समाधान के लिए चाहिए। जिस तेज गति से व जिस बड़े पैमाने पर कार्यवाही चाहिए, इस समय उसकी कोई वास्तविक संभावना नजर नहीं आ रही है। अब हमें पहले से कहीं बेहतर प्रयास करना होगा। औसत विश्व तापमान वृद्धि को 2.0 से. तक सीमित रखना है तो इस दशक में ही विश्व में उत्सर्जन के उत्कर्ष से गिरावट शुरू की जानी चाहिए। पर जलवायु बदलाव के अंतरराष्ट्रीय पैनल ने बताया है कि वर्ष 2000 व 2030 के बीच विश्व-स्तर का उत्सर्जन पच्चीस से नब्बे प्रतिशत बढ़ने की आशंका है।’’  अत: अभी स्थिति बहुत चिंताजनक बनी हुई है। इसका मुख्य कारण यह है कि बुनियादी तौर पर जीवन-शैली बदलने, औद्योगीकरण आधारित विकास का मॉडल बदलने, उत्पादन व उपभोग में बड़े बदलाव लाने व समता तथा सादगी का आदर्श अपनाने की दृष्टि से जो भूल सुधार चाहिए, उस दिशा में दुनिया नहीं बढ़ रही है।
भूल सुधारों में यह बहुत जरूरी है कि पर्यावरण संरक्षण के उद््देश्य को आर्थिक-सामाजिक न्याय से जोड़ कर एक समग्र कार्यक्रम बनाया जाए, जिससे बड़ी संख्या में लोग जलवायु बदलाव रोकने जैसी बड़ी जिम्मेदारियों में जुड़ सकें। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कुछ हद तक हम जीवाश्म र्इंधन के स्थान पर अक्षय ऊर्जा (जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा) का उपयोग कर सकते हैं, पर केवल यह पर्याप्त नहीं है। विलासिता व गैर-जरूरी उपभोग कम करना भी जरूरी है।

यह तो बहुत समय से कहा जा रहा है कि विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बहुत सावधानी से होना चाहिए व वनों, चरागाहों, कृषिभूमि व खनिज-भंडारों का उपयोग करते हुए इस बात का पूरा ध्यान रख जाना चाहिए कि पर्यावरण की क्षति न हो या उसे न्यूनतम किया जाए। जलवायु बदलाव के दौर में अब नई बात यह जुड़ी है कि विभिन्न उत्पादन-कार्यों के लिए कितना कार्बन स्थान या स्पेस उपलब्ध है, यह भी ध्यान में रखना जरूरी है। जब हम इन नई-पुरानी सीमाओं के बीच दुनिया के सब लोगों की जरूरतों को पूरा करने की योजना बनाते हैं तो स्पष्ट है कि करोड़ों गरीब लोगों के लिए पौष्टिक भोजन, वस्त्र, आवास, दवाओं, कापी-किताब आदि का उत्पादन बढ़ाना होगा। उत्पादन बढ़ाने में हम पूरा प्रयास कर सकते हैं कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों का उपयोग हो, पर यह एक सीमा तक ही संभव होगा। अत: यह जरूरी हो जाता है कि विलासिता की वस्तुओं व गैर-जरूरी वस्तुओं का उत्पादन कम किया जाए। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने की योजना से विश्व के सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की योजना को जोड़ दिया जाए व उपलब्ध कार्बन स्पेस में बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देना एक अनिवार्यता बना दिया जाए। जब गैर-जरूरी उत्पादों को प्राथमिकता से हटाया जाएगा तो सब तरह के हथियारों के उत्पादन में काफी कमी लाई जाएगी। मनुष्य व अन्य जीवों की भलाई की दृष्टि से देखें तो हथियार न केवल सबसे ज्यादा गैर-जरूरी हैं बल्कि सबसे अधिक हानिकारक हैं। इसी तरह अनेक हानिकारक उत्पाद हैं (शराब, सिगरेट, कुछ बेहद खतरनाक रसायन आदि) जिनके उत्पादन को कम करना करना जरूरी है।

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