ताज़ा खबर
 

राजनीति: प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता

जो प्राथमिक शिक्षा अधिक से अधिक किताबों का बोझ लाद कर कक्षा में प्रथम स्थान लाने के लिए प्रेरित करने तक सीमित हो, उससे ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। विकसित राष्ट्रों में प्रारंभिक शिक्षा में कक्षा में प्रथम आने मात्र के लिए ही पढ़ाई नहीं करवाई जाती, अपितु व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास पर जोर दिया जाता है। बेहतर है कि हम भी अपने यहां विद्यालयों में बच्चों के बहुआयामी व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करें, नवाचार के लिए प्रारंभिक स्तर से ही उन्हें शिक्षित किया जाए।

Author August 17, 2018 2:44 AM
स्कूल जाते बच्चे (फाइल फोटो)

अनुराग सिंह

वर्तमान सरकार ने जब से ‘भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’ के गठन की बात की है, तब से ही भारत में उच्च शिक्षा पर बहस तेज हो गई है। एक वर्ग इसे शिक्षा के हित के लिए उठाया गया बड़ा कदम बता रहा है, तो दूसरी ओर कुछ लोग इसे उच्च शिक्षा के पतन की शुरुआत मान रहे हैं। लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि इन बहसों के अलावा हमें अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्रणाली में आए बदलावों का भी अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि यहीं से उच्च शिक्षा का मार्ग प्रशस्त होता है। अगर खामियां यहीं पर मौजूद हैं तो बेहतर होगा कि ‘भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’ के गठन से ज्यादा ध्यान प्रारंभिक शिक्षा पर दिया जाए। अगर नींव ही खराब होगी तो निश्चित तौर पर इमारत ढहेगी। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि उच्च शिक्षा पर ध्यान न दिया जाए, लेकिन प्राथमिकता प्रारंभिक शिक्षा होनी चाहिए।

हाल के दिनों में प्रारंभिक शिक्षा के सुधार के लिए सरकार ने दो बड़े प्रयास किए। लेकिन उच्च शिक्षा की बहसों में ये बातें दब गर्इं। अब जरूरी है कि प्रारंभिक शिक्षा पर भी उसी स्तर की बहस हो। शिक्षा के अधिकार में बदलाव का बिल लोकसभा में ध्वनि मत से पारित हो गया। इसके अंतर्गत अभी जो नीति है, जिसके तहत आठवीं तक के बच्चे फेल नहीं होते थे, उसमें बदलाव किया गया है। अब फेल न करने की नीति समाप्त हो जाएगी। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा और यह बात बिलकुल ठीक भी है। केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (सीएबीई) में भी इस बिल पर चर्चा की गई थी। फेल न करने की नीति लागू करने से जिन छात्रों को अप्रत्यक्ष रूप से यह आश्वासन मिल गया था कि वे बिना पढेÞ, बिना परिश्रम किए अगली कक्षा में प्रवेश पा सकेंगे, उनका वह भरोसा टूटेगा और वे मजबूरी में ही सही, पढ़ाई की ओर आगे आएंगे। इससे जो नींव लगातार कमजोर हो सकती थी, उसको बल मिलेगा और हम सिर्फ साक्षरों की फौज ही नहीं तैयार करेंगे, अपितु उसमें गुणवत्ता की मात्रा को भी बढ़ता देख सकेंगे। दूसरी बात जो प्रारंभिक शिक्षा से जुड़ी है, वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। अंग्रेजों की बनाई शिक्षा नीति में हम आज तक बहुत कुछ बदलाव नहीं कर पाए हैं और लगातार उसी ढर्रे पर काम कर रहे हैं। लेकिन आज जब जरूरतें अलग हैं, तो तरीके भी अलग होने चाहिए। विद्यालयी पाठ्यक्रम में बड़े परिवर्तन करने में जुटी सरकार ने किताबी पाठ्यक्रम को आधा करने का फैसला किया है। पाठ्यक्रम को आधा कर उसमें रोचकता कैसे लाई जाए, इसका प्रयास किया जा रहा है, क्योंकि कुछ विद्यार्थी अभी भी शिक्षा को बोझ ही मान कर चलते हैं। शिक्षा क्षेत्र में बच्चों की लगातार बढ़ रही अरुचि को इसी माध्यम से दूर करने का प्रयास किया जाएगा। इस बारे में सुझाव मांगे गए थे और करीब चालीस हजार लोगों ने अपने सुझाव भेजे थे। इनमें से ज्यादातर लोगों ने पाठ्यक्रम को कम करने के सुझाव को सबसे ज्यादा तवज्जो दी और फिर इसके लिए गठित समिति ने भी इस सुझाव पर चर्चा कर अपनी सहमति जताई। फलस्वरूप सरकार अगले दो वर्षों में इस योजना को क्रियान्वित करने की दिशा में तेजी से कार्य कर रही है।

परंतु पाठ्यक्रम को आधा कर देना तो कोई विकल्प नहीं है। उसमें कुछ नया जोड़ा जाना भी आवश्यक है। सरकार ने पाठ्यक्रम को कम कर खेलकूद को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। इसके लिए विशेष कोष स्थापित करने की भी मंजूरी दे दी है। इससे दो स्तरों पर बेहतरी होने की उम्मीद है। पहला तो यह कि बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास पहले की तुलना में बेहतर होगा, और दूसरा यह कि लोगों में धीरे-धीरे यह संदेश जाएगा कि खेलकूद कोई बुरा काम न होकर, विकास में सहयोग प्रदान करने वाली गतिविधि ही है। अभी हमारे समाज में पढ़ाई और खेल को दो विपरीत ध्रुवों पर रख कर देखा जाता है, जबकि दोनों के मध्य समन्वय होना चाहिए, विरोध नहीं। सिर्फ किताबी बोझ से दबे बच्चों को इससे न केवल राहत मिलेगी, अपितु वे अपनी पसंद के खेल को भी अपने शिक्षा के जीवन में शामिल कर पाएंगे। एक नए प्रयास के रूप में नीति आयोग की मदद से ‘अटल टिंकरिंग लेबोरेटरीज’ की शुरुआत की गई। इसका मुख्य उद्देश्य माध्यमिक विद्यालयों में कक्षा छह से आठ तक के विद्यार्थियों को ऐसा कौशल प्रदान करना और उन्हें उस प्रौद्योगिकी तक पहुंच प्रदान करना है जो उन्हें समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम बनाए। सरकार इसके पीछे जो उद्देश्य बता रही है, वह यह है कि इसकी मदद से आने वाली पीढ़ी में भारत के पास लाखों की संख्या में अन्वेषक तैयार होंगे, जिनमें उद्यम की बेहतर क्षमता विकसित होगी। फलस्वरूप, भारत के विकास की गति में वृद्धि की संभावना बनेगी। यह अपेक्षाकृत दूरदर्शी कदम है जिसके परिणाम हमें तुरंत नहीं मिलने वाले हैं। लेकिन जिस उद्देश्य से इसकी शुरुआत की गई है, वह काफी महत्त्वपूर्ण है। प्रशासनिक स्तर पर केंद्र सरकार ने इसमें स्वयं हस्तक्षेप करते हुए हर राज्य के लिए एक परफार्मिंग ग्रेडिंग इंडिकेटर (पीजीआइ) वार्षिक रूप से तैयार करने को कहा है। यह वह पैमाना होगा जिसके आधार पर केंद्र सरकार राज्य सरकारों की वित्तीय सहायता को घटा-बढ़ा पाएगी। इस पीजीआइ का निर्धारण बुनियादी सुविधाओं, मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता, शिक्षकों की तैनाती और हर जनपद में इसकीनिगरानी के लिए शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति से होगा। इससे राज्य सरकारें अधिक से अधिक वित्तीय सहायता पाने के प्रयास में इन मानकों का खयाल रखेंगी, साथ ही राज्यों के मध्य प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता सुधरेगी।
आज जब हम दुनिया के विश्वविद्यालयों से अपनी तुलना करते हैं, या फिर भारत के खाते में आए नोबल पुरस्कारों की बात करते हैं, तो हमें विश्व के कई देशों की तुलना में काफी पीछे स्थान मिलता है। कुछ लोग यह कहते हुए पाए जाते हैं कि ये कोई पैमाने नहीं हैं।

पहली बात तो इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि जिन विश्वविद्यालयों को शीर्ष स्थान मिल रहा है वे विज्ञान, तकनीकी के साथ अन्य क्षेत्रों में भी लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी बात यह कि अगर ये पैमाने नहीं हैं तो फिर कौन से पैमाने हैं? क्या आप नई खोज और आविष्कार को पैमाना मानेंगे? इसमें भी भारत विदेशी विश्वविद्यालयों की तुलना में काफी पिछड़ा हुआ है। जो प्राथमिक शिक्षा अधिक से अधिक किताबों के बोझ से लाद कर कक्षा में प्रथम स्थान लाने के लिए प्रेरित करने तक सीमित हो, उससे ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। विकसित राष्ट्रों में प्रारंभिक शिक्षा में कक्षा में प्रथम आने मात्र के लिए ही पढ़ाई नहीं करवाई जाती, अपितु व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास पर जोर दिया जाता है। बेहतर है कि हम भी अपने यहां विद्यालयों में बच्चों के बहुआयामी व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करें, नवाचार के लिए प्रारंभिक स्तर से ही उन्हें शिक्षित किया जाए। जब यह क्षमता प्रारंभिक स्तर पर विकसित होगी, तो उच्च शिक्षा के तमाम विषयों में नवाचार स्वयं ही दिखाई देने लगेगा। जिन नवाचारों व तकनीकी विकास के बल पर बहुत से राष्ट्र आज विश्व शक्ति बन कर उभर रहे हैं, हमें उनकी प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था को समझ कर अपने यहां भी उसके सकारात्मक पहलुओं को लागू करना चाहिए। अन्यथा भारतीय उच्च शिक्षा आयोग का मकसद कभी पूरा नहीं हो पाएगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App