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राजनीति : प्लास्टिक बनाम पर्यावरण

पॉलीथिन के थैलों और अन्य प्लास्टिक-निर्मित चीजों का इस्तेमाल लोगों को बहुत सुविधाजनक लगता है। वे इनके इतने आदी हो चुके हैं कि राजी-खुशी इनसे छुटकारा नहीं पा सकते। इसलिए कुछ सख्त उपाय करने होंगे। विश्व को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करना सिर्फ सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। हर नागरिक को भी विश्व को प्लास्टिक-मुक्त बनाने का संकल्प लेना होगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

आपने जहर के अनेक रूप देखे होंगे। लेकिन एक जहर ऐसा है जो आपके घर में छिपा है और आप उससे बेखबर हैं। उस जहर का नाम है प्लास्टिक। दरअसल, जब तक आप इसे जहर नहीं मानेंगे तब तक यह आपके जीवन में जहर घोलता रहेगा। जिंदगी के लिए पांच तत्त्व जरूरी हैं: हवा, आकाश, आग, मिट्टी और पानी। यहीं से हमें चेतना मिलती है। लेकिन नई सभ्यता के इस दौर में चेतना के ये स्रोत दूषित हो रहे हैं। प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह आज प्लास्टिक है। प्लास्टिक आज न केवल हर जगह है, बल्कि हमेशा के लिए सारे संसार में छा गया है। इससे बने बर्तनों में हम खाते हैं, इसकी कुर्सी पर बैठते हैं, प्लास्टिक से बनी कारों में सफर कर रहे हैं। ये चीजें लंबे समय चलें, इसके लिए इन्हें ‘टिकाऊ’ बनाया जा रहा है। उपयोग बढ़े, इसके लिए कई रूपों में बनाया जा रहा है। इसमें सीलन नहीं आती और तरल वस्तुएं लीक नहीं होतीं। यह लचीला है, हल्का भी। यह सोने की तरह महंगा नहीं है। प्लास्टिक का यही गुण पर्यावरण के लिए खतरा बन चुका है।

वर्ष 1972 से हर साल पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस बार के पर्यावरण दिवस पर दुनिया को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करने का संकल्प लिया गया। इसके पहले, पिछले वर्ष दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र की तीसरी पर्यावरण एसेम्बली में 193 देशों ने विश्व को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करने का संकल्प लिया था। लेकिन इस संकल्प का कोई खास परिणाम दिखाई नहीं दिया। बल्कि आज हम चारों तरफ प्लास्टिक के सामानों से घिर गए हैं। शायद आपको मालूम नहीं कि आपके फ्रीज में रखी प्लास्टिक की बोतल को नष्ट होने में साढ़े चार सौ वर्ष लगेंगे? आप जिस प्लास्टिक के बैग में अपना राशन लेकर आते हैं, उसे नष्ट होने में हजार वर्ष लगेंगे। क्या आप जानते हैं कि हम हर साल पूरी दुनिया के लोगों के वजन के बराबर प्लास्टिक का कचरा पैदा करते हैं? वैसे तो पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण बचाने, पेड़-पौधे लगाने, प्रदूषण कम करने की बात होती है। लेकिन इन सारी समस्याओं के बीच जो सबसे बड़ी समस्या है वह है प्लास्टिक प्रदूषण।

आइए हम सबसे पहले आपको कुछ आंकड़े बताते हैं। इससे आपको पता चलेगा कि इंसान कितनी बुरी तरह पृथ्वी का दोहन कर रहा है और उसे प्लास्टिक के बोझ से लाद रहा है। आज पूरे संसार में हर मिनट पेयजल की करीब दस लाख प्लास्टिक की बोतलें खरीदी जाती हैं। जबकि पूरी दुनिया में हर साल 5 लाख करोड़ प्लास्टिक के बैग इस्तेमाल होते हैं। इसके पहले 1950 से लेकर 1970 के दशक तक बहुत ही कम मात्रा में प्लास्टिक का उत्पादन होता था। लेकिन 1990 के दशक में प्लास्टिक से पैदा होने वाला कचरा पिछले दो दशक की तुलना में तीन गुना हो चुका है और प्लास्टिक के उत्पादन में भी तीन गुने की बढ़ोतरी हो चुकी है। 2000 के दशक में तो और बुरे हालात हो गए। इस दौरान इतना प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ, जितना पिछले चालीस वर्षों में भी नहीं हुआ था। आज हम हर वर्ष 30 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा करते हैं जिसका वजन पूरी दुनिया के लोगों के वजन के बराबर है।
शोध से पता यह भी पता चला है कि 1950 से लेकर अब तक 830 करोड़ टन से भी ज्यादा प्लास्टिक का उत्पादन हो चुका है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज तक पूरी दुनिया में पैदा हुए प्लास्टिक के कचरे में से सिर्फ 9 फीसद रीसाइकल हो पाया है। जबकि 12 फीसद प्लास्टिक का कचरा जलाया गया है और बाकी का 79 फीसद अलग-अलग जगह इकट्ठा होकर धरती पर बोझ बन गया है। आप भारत को ही लीजिए, यहां 1995-96 के दौरान हर साल सिर्फ 61 हजार टन प्लास्टिक का इस्तेमाल होता था, जो अब बढ़ कर करीब 1 करोड़ 80 लाख टन तक पहुंच चुका है। अब तो महासागर भी इससे अछूते नहीं रहे। इनमें बड़े-बड़े कूड़े के ढेर बनते जा रहे हैं जिसमें प्लास्टिक की मात्रा बहुत ज्यादा है। ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि इन महासागरों में हर साल 80 लाख टन प्लास्टिक का कचरा जाता है। दरअसल, समुद्र की लहरें इस कचरे को बाहर नहीं जाने देतीं और समुद्र में किसी एक जगह पर यह कचरा जमा हो जाता है। इनमें से ज्यादातर कचरा नदियों से आता है। केवल दस नदियां पूरी दुनिया का नब्बे फीसद प्लास्टिक का कचरा समंदर में डालती हैं। इनमें तीन नदियां प्रमुख हैं- सिंधु, ब्रह्मपुत्र और गंगा। अगर हालात यही रहे तो 2050 तक दुनिया के महासागरों में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगा। समुद्री जीवों का पेट तो आजकल पलास्टिक खाकर ही भर जा रहा है। उनको अब भूख नहीं लगती क्योंकि पेट तो प्लास्टिक से ही भर गया है जो पचता ही नहीं। ऐसे में ये समुद्री जीव-जंतु खाने की तलाश नहीं करते और मर जाते हैं।

दरअसल, समुद्र में रहने वाले छोटे जीव-जंतु प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों को भोजन समझ कर खा लेते हैं। फिर इन जीवों को बड़ी मछलियां खाती हैं। अब इन मछलियां को हम लोग खाते हैं। यानी प्लास्टिक वाला जो कचरा इंसान समुद्र में फेंक देता है वह वापस इंसानों के पेट में पहुंच जाता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है। दरअसल, बीते पचास वर्षों में हमने जितना उपयोग प्लास्टिक का बढ़ाया है, किसी अन्य चीज का नहीं। इसीलिए आज हर जगह प्लास्टिक ही प्लास्टिक नजर आ रहा है। पूरा बाजार प्लास्टिक के सामान से पटा पड़ा है। वर्ष 1960 में दुनिया में 50 लाख टन प्लास्टिक बनाया जा रहा था, आज यह बढ़ कर 300 करोड़ टन के पार हो चुका है। यानी हर व्यक्ति के लिए करीब आधा किलो प्लास्टिक हर वर्ष बन रहा है। ऐसे में आप सोच सकते हैं कि स्थिति कितनी भयावह है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक से बचाव में हो रहा निवेश विभिन्न देशों को आर्थिक रूप से भी नुकसान पहुंचा रहा है। अमेरिका अकेले 1300 करोड़ डॉलर अपने समुद्र तटों से प्लास्टिक साफ करने में खर्च कर रहा है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह बड़ा भार है। महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है। प्लास्टिक की वस्तुएं थोड़ी सस्ती मिलती हैं। इसलिए लोग इन्हें आसानी से या ज्यादा खरीदते हैं। ऐसे में सरकार को प्लास्टिक को पूरी तरह प्रतिबंधित करने से पहले एक प्रभावी रणनीति पर काम करना होगा, जिसमें जन-मानस का सहयोग नितांत आवश्यक होगा। पॉलीथिन के थैलों पर रोक लगाने के प्रयास छिटपुट तौर पर कई बार हुए हैं। लेकिन अब तक ये प्रयास नाकाम ही रहे हैं। दरअसल, ऐसी पाबंदी का इतने बड़े पैमाने पर उल्लंघन होता है कि पाबंदी को लागू कर पाना लगभग असंभव हो जाता है। पॉलीथिन के थैलों और अन्य प्लास्टिक-निर्मित चीजों का इस्तेमाल लोगों को बहुत सुविधाजनक लगता है। वे इनके इतने आदी हो चुके हैं कि राजी-खुशी से इनसे छुटकारा नहीं पा सकते। इसलिए कुछ सख्त उपाय करने होंगे और उन उपायों को लेकर तब तक कड़ाई बरतनी होगी जब तक वे आम चलन का हिस्सा नहीं बन जाते। विश्व को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करना सिर्फ सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। हर नागरिक को भी विश्व को प्लास्टिक-मुक्त बनाने का संकल्प लेना होगा।

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