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राजनीति: राष्ट्रभाषा और महात्मा गांधी

Hindi Diwas 2018: हिंदुस्तानी कहने से जिस तरह व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरता का बोध होता है, उस तरह हिंदी कहने से नहीं। इस शब्द में न तो क्षेत्रीयता की गंध है और न जाति-धर्म की संकीर्णता की। यदि हिंदुस्तानी को राजभाषा के रूप में स्वीकृति मिल गई होती तो उर्दू का झगड़ा सदा के लिए खत्म हो गया होता। निश्चित रूप से हिंदुस्तानी की जगह हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल थी।

Author September 14, 2018 5:01 AM
Hindi Diwas 2018: प्रतिकात्मक तस्वीर।

अमरनाथ

आजादी के बहत्तर साल बीत गए। आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति। दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक सब कुछ पराई भाषा में होता है। फिर भी उम्मीद की जाती है कि वह विश्व-गुरु बन जाएगा। महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव किया था। उनके प्रयास से 1925 में संपन्न हुए कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में कांग्रेस की सारी कार्यवाहियां हिंदुस्तानी में किए जाने का प्रस्ताव पास हुआ था। वे जिसे हिंदी कहते थे उसके स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा है, ‘ऐसी दलील दी जाती है कि हिंदी और उर्दू दो अलग-अलग भाषाएं हैं। यह दलील सही नहीं है। उत्तर भारत में मुसलमान और हिंदू एक ही भाषा बोलते हैं। भेद पढ़े-लिखे लोगों ने डाला है… मैं उत्तर में रहा हूं, हिंदू-मुसलमानों के साथ खूब मिला-जुला हूं और मेरा हिंदी भाषा का ज्ञान बहुत कम होने पर भी मुझे उन लोगों के साथ व्यवहार रखने में जरा भी कठिनाई नहीं हुई है। जिस भाषा को उत्तरी भारत में आम लोग बोलते हैं, उसे चाहे उर्दू कहें चाहे हिंदी, दोनों एक ही भाषा की सूचक हैं। यदि उसे फारसी लिपि में लिखें तो वह उर्दू भाषा के नाम से पहचानी जाएगी और नागरी में लिखें तो वह हिंदी कहलाएगी।’

गांधी जी द्वारा प्रस्तावित यह हिंदुस्तानी कोई नई वस्तु नहीं है। हिंदी का पहला व्याकरण हालैंड निवासी जॉन जोशुआ केटलर द्वारा डच भाषा में 1698 ईस्वी में लिखा गया था, जिसका शीर्षक है, ‘हिंदुस्तानी ग्रामर’। बेंजामिन शुल्जे द्वारा लैटिन में लिखे गए और 1745 ईस्वी में प्रकाशित ग्रंथ का नाम है, ‘ग्रामेटिका हिंदोस्तानिका’। जॉन फार्गुसन की पुस्तक है-‘ए डिक्शनरी आफ द हिंदुस्तानी लैंग्वेज,’ (1773 ईस्वी) और जॉन गिलक्रिस्ट के व्याकरण ग्रंथ का नाम है, ‘ए ग्रामर आफ द हिंदुस्तानी लैंग्वेज’ (1790 ईस्वी)। गार्सां द तासी द्वारा लिखित तथाकथित हिंदी साहित्य का पहला इतिहास वास्तव में हिंदुई और हिंदुस्तानी साहित्य का इतिहास है। इससे भी पहले सन 1800 में कलकत्ता में जो फोर्ट विलियम कॉलेज बना था, उसमें भी हिंदी विभाग नहीं, अपितु हिंदुस्तानी विभाग खुला था जिसके पहले अध्यक्ष जॉन गिलक्रिस्ट थे। जॉन गिलक्रिस्ट के अनुसार उस समय हिंदुस्तानी की तीन शैलियां प्रचलित थीं। एक, फारसी या दरबारी शैली, दूसरी- हिंदुस्तानी शैली और तीसरी हिंदवी शैली। गिलक्रिस्ट दरबारी या फारसी शैली को अभिजात वर्ग में प्रचलित और दुरूह मानते थे और हिंदवी शैली को ‘वल्गर’। उनकी दृष्टि में हिंदुस्तानी शैली ही ‘द ग्रेंड पापुलर स्पीच आॅफ हिंदुस्तान’ थी। आगे चल कर इसी हिंदुस्तानी की लड़ाई राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने भी लड़ी, जिसे वे ‘आमफहम और खास पसंद’ भाषा कहते थे। पता नहीं, गांधीजी को हिंदुस्तानी के इस इतिहास की जानकारी थी या नहीं, किंतु अपने अनुभवों से वे भली-भांति समझ चुके थे कि इस देश की एकता को कायम रखने में हिंदुस्तानी बड़ी भूमिका अदा कर सकती है और इसी में निर्विवाद रूप से इस देश की राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता है।

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन से इसी मुद्दे को लेकर उनका विवाद चला और लंबे पत्राचार के बाद हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से गांधीजी को त्यागपत्र देना पड़ा। इन सारे विवादों के पीछे की राजनीति का विश्लेषण करते हुए काका साहब कालेलकर ने लिखा है, ‘हिंदी का प्रचार करते हम इतना देख सके कि, हिंदी साहित्य सम्मेलन को उर्दू से लड़ कर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना है और गांधीजी को तो उर्दू से जरूरी समझौता करके हिंदू-मुसलिमों की सम्मिलित शक्ति के द्वारा अंग्रेजी को हटा कर उस स्थान पर हिंदी को बिठाना था। इन दो दृष्टियों के बीच जो खींचातानी चली, वही है गांधीयुग के राष्ट्रभाषा प्रचार के इतिहास का सार।’ खेद है कि संविधान सभा में होने वाली बहस के पहले ही गांधीजी की हत्या हो गई। देश का विभाजन भी हो गया था और पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रभाषा उर्दू को घोषित कर दिया था। इन परिस्थितियों का गंभीर प्रभाव संविधान सभा की बहसों और होने वाले निर्णयों पर पड़ा। हिंदुस्तानी और हिंदी को लेकर सदन दो हिस्सों मे बंट गया। गांधीजी के निष्ठावान अनुयायी जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित दक्षिण के डा. पी सुब्बारायन, टीटी कृष्णामाचारी, टीए रामलिंगम चेट्टियार, एनजी रंगा, एन गोपालस्वामी आयंगर, एसबी कृष्णमूर्ति राव, काजी सैयद करीमुद्दीन, जी. दुर्गाबाई आदि ने हिंदुस्तानी का समर्थन किया, तो दूसरी ओर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोबिंद दास, रविशंकर शुक्ल, अलगूराय शास्त्री, संपूर्णानंद, केएम मुंशी आदि ने हिंदी का। बहुमत हिंदी के पक्ष में था और संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा तय कर दिया। आज सत्तर वर्ष बाद जब हम संविधान सभा के उक्त निर्णय के प्रभाव का मूल्यांकन करते हैं तो हमें लगता है कि हिंदी को इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। दक्षिण के हिंदी विरोध का मुख्य कारण यही है। जो लोग पहले गांधीजी के प्रभाव में आकर हिंदी का प्रचार कर रहे थे, वे ही बाद में हिंदी के विरोधी हो गए। संविधान सभा में होने वाली बहसों को पलट कर देखने पर तो यही लगता है।

गांधीजी की प्रख्यात अनुयायी जी दुर्गाबाई ने सदन में इस ओर स्पष्ट संकेत किया था। ‘श्रीमान, भारत की राष्ट्रभाषा हिंदुस्तानी के अतिरिक्त, जो हिंदी तथा उर्दू का योग है, कुछ और नहीं होनी चाहिए और कुछ हो भी नहीं सकती।’ इसी तरह संविधान सभा में बहस करते हुए मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा, ‘आज से तकरीबन पच्चीस वर्ष पहले जब यह सवाल आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सामने आया था तो मेरी ही तजबीज से उसने हिंदुस्तानी का नाम इख्तयार किया था। मकसद यह था कि जबान के बारे में तंगख्याली से काम न लें। ज्यादा से ज्यादा वसीह मैदान पैदा कर दें। हिंदुस्तानी का लफ्ज इख्तयार करके हमने हिंदी और उर्दू के इख्तेलाफ को भी दूर कर दिया था। क्योंकि जब आसान उर्दू और आसान हिंदी बोलने और लिखने की कोशिश की जाती है तो दोनों मिल कर एक जबान हो जाती हैं। तब उर्दू और हिंदी का फर्क बाकी नहीं रहता।’ मोहम्मद इस्माईल ने गांधीजी को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘भारत के करोड़ों ग्रामीणों को पुस्तकों से कोई मतलब नहीं है।

वे हिंदुस्तानी बोलते हैं जिसे मुसलिम उर्दू लिपि में लिखते हैं और हिंदू उर्दू लिपि या नागरी लिपि में लिखते हैं। अतएव मेरे और आप जैसे लोगों का कर्तव्य है कि दोनो लिपियों को सीखें।’ वैसे भी हिंदुस्तानी कहने से जिस तरह व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरता का बोध होता है, उस तरह हिंदी कहने से नहीं। इस शब्द में न तो क्षेत्रीयता की गंध है और न जाति-धर्म की संकीर्णता की। यदि हिंदुस्तानी को राजभाषा के रूप में स्वीकृति मिल गई होती तो उर्दू का झगड़ा सदा के लिए खत्म हो गया होता। निश्चित रूप से हिंदुस्तानी की जगह हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल थी। इतिहास की इस भूल का भयंकर दुष्परिणाम आज भी हम झेल रहे हैं। बहरहाल, अब तो संविधान ने देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली ‘हिंदी’ को संघ की राजभाषा बना कर हिंदी और हिंदुस्तानी के विवाद पर विराम लगा दिया है। किंतु यदि हिंदी को उसका वाजिब स्थान दिलाना है तो हमें आज भी गांधी के दिखाए मार्ग पर ही चलना होगा और ‘हिंदी’ शब्द में ‘हिंदुस्तानी’ का अर्थ भरना होगा।

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