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राजनीति: मीडिया से भिड़ते ट्रंप

प्रेस की स्वतंत्रता का जन्म अमेरिका में नहीं हुआ था, पर ऐसे कुछ ही देश हैं जिनके इतिहास में स्वतंत्र प्रेस इतनी बारीकी से बुना गया है। अब सच्चाई कहने और लिखने की अमेरिकी परंपरा खतरे में है। अमेरिकी प्रेस पर हमला करने वाले डोनाल्ड ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं, लेकिन वे पहले ऐसे व्यक्ति अवश्य हैं जो बराबर और नियमित रूप से पत्रकारिता के संबंध में ऊल-जलूल बोलते रहते हैं और पत्रकारों के काम में तरह-तरह से अड़ंगे लगाते रहते हैं।

Author August 28, 2018 2:19 AM
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (फोटो सोर्स: रॉयटर, फाइल फोटो)

महेंद्र राजा जैन

केवल अमेरिकी पत्रकारिता में ही नहीं, बल्कि विश्व पत्रकारिता के इतिहास में भी संभवत: यह पहला अवसर है जब किसी देश के लगभग सारे अखबारों ने एक साथ एक ही दिन एक ही विषय पर अलग-अलग संपादकीय लिखे। समय-समय पर ट्रंप मीडिया के संबंध में अनर्गल बातें कहते रहते हैं। हाल ही में उन्होंने मीडिया को ‘जनता का दुश्मन’ तक कह डाला। ट्रंप द्वारा मीडिया के विरुद्ध छेड़े गए ‘गंदे युद्ध’ के विरोध में अमेरिका के तीन सौ पचास से अधिक अखबारों ने अपने 16 अगस्त के अंकों में तीखे संपादकीय लिखे। यह अभियान ‘बोस्टन ग्लोब’ द्वारा छेड़ा गया था, जिसके संपादकीय विभाग के लोगों ने देश भर के मीडिया से संपर्क कर डोनाल्ड ट्रंप की मीडिया के प्रति ‘दुश्मनी’ को नकारते हुए संपादकीय लिखने की अपील की थी। अपील में कहा गया था कि ‘मीडिया के प्रति ट्रंप का यह ‘गंदा युद्ध’ समाप्त होना चाहिए। किसी भी अखबार की राजनीतिक विचारधारा चाहे जो हो, पर हम सब एक साथ मिल कर अपने पेशे की रक्षा, साथ ही जनता के लिए और जनता के द्वारा चुनी गई सरकार के प्रति जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उसके लिए बहुत ही शक्तिशाली संदेश दे सकते हैं’।

प्रेस की स्वतंत्रता का जन्म अमेरिका में नहीं हुआ था, पर ऐसे कुछ ही देश हैं जिनके इतिहास में स्वतंत्र प्रेस इतनी बारीकी से बुना गया है। अब सच्चाई कहने और लिखने की अमेरिकी परंपरा खतरे में है। अमेरिकी प्रेस पर हमला करने वाले डोनाल्ड ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं, लेकिन वे पहले ऐसे व्यक्ति अवश्य हैं जो बराबर और नियमित रूप से पत्रकारिता के संबंध में ऊल-जलूल बोलते रहते हैं और पत्रकारों के काम में तरह-तरह से अड़ंगे लगाते रहते हैं। ट्रंप के विरुद्ध इस अभियान की सफलता का अंदेशा पिछले 11 अगस्त को ही हो गया था, जब सौ से अधिक प्रमुख अखबार इस अपील पर दस्तखत कर चुके थे। दस्तखत करने वालों में सभी महानगरों से प्रकाशित होने वाले प्रमुख दैनिक जैसे ‘न्यूयार्क टाइम्स’, ‘शिकागो सन टाइम्स’, ‘ह्यूस्टन क्रॉनिकल’, ‘मियामी हेराल्ड’ और ‘डेनेवर पोस्ट’ के साथ ही बहुत से साप्ताहिक अखबार भी थे। उसके बाद तो फिर और भी अखबार इस अभियान में शामिल हो गए। प्रत्येक अखबार ने अलग-अलग शब्दों में अपना संपादकीय लिखा। सभी का निष्कर्ष एक था, यानी राष्ट्रपति ट्रंप के मीडिया विरोधी वक्तव्यों की आलोचना। अमेरिकी पत्रकारों के समर्थन में ब्रिटेन के ‘द गार्डियन’ ने भी 16 अगस्त के अंक में बहुत ही विचारोत्तेजक संपादकीय लिखा कि जहां कहीं भी प्रेस के प्रति इस प्रकार का व्यवहार किया जाता है या किया जा रहा है, उसका हर संभव तरीके से विरोध किया जाना चाहिए। ट्रंप के व्यवहार से अमेरिका को बचाना प्रेस का काम नहीं है, प्रेस का काम तो अपनी तरफ से निर्भयतापूर्वक सही समाचारों को देना है। प्रेस में भी कुछ कमियां हो सकती हैं। निश्चय ही प्रेस में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सच्चाई की ओर से मुंह मोड़ कर गलत समाचार देते हैं और ट्रंप उन्हें हर तरह की सहायता देते हैं। पर स्वतंत्र प्रेस यदि कहीं देखता है कि उसे धमकाया और भड़काया जा रहा है तो उसे इसके खिलाफ आवाज उठाना चाहिए। प्रेस को जहां तक संभव हो, तथ्यों के प्रति सजग रहते हुए उनकी छानबीन कर अपना संतुलानात्मक निर्णय देना चाहिए। ट्रंप के व्यवहार, प्रेस को तरह-तरह से धमकाना आदि से निश्चय ही प्रेस को खतरा है। प्रेस और पाठकों के प्रति जो विश्वास का संबंध है और जिसके कारण प्रेस की इज्जत है, यदि उस पर किसी भी रूप में आंच आती है तो हम सब उसके साथ हैं- केवल अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं दुनिया भर में अन्य सभी जगह इस प्रकार के तानाशाहों के विरुद्ध।

अपील में प्रेस पर शासन के हमलों के खतरों से आगाह करते हुए लिखने को कहा गया था कि ‘हमारे शब्द अलग-अलग रहेंगे, पर उनका आशय यही होगा कि मीडिया पर इस प्रकार के आक्रमण भविष्य के खतरों की सूचना देते हैं’। इस अभियान को ‘अमेरिकन सोसायटी आफ न्यूज एडीटर्स’ से भी सहयोग मिला था। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बार-बार मीडिया के विरुद्ध बोलने और अभी मीडिया को ‘जनता का दुश्मन’ कहने पर संयुक्त राष्ट्र के ‘ह्यूमन राइट्स (मानवाधिकार) कमिश्नर जिद राद अल हुसैन ने भी विरोध करते हुए लंदन के ‘द गार्डियन’ से कहा था कि ट्रंप की वक्तृता एक प्रकार से मीडिया को हिंसात्मक कार्रवाई करने के लिए उकसाना है। उनका कहना था कि हम काफी समय से मीडिया के खिलाफ ट्रंप का यह अभियान देखते आ रहे हैं जो निकट भविष्य में शीघ्र ही पत्रकारों को उनका काम नहीं करने देने और प्रेस पर सेंसरशिप का रूप भी ले सकता है। मीडिया और ट्रंप के बीच यह तनाव मुख्यत: ट्रंप की रैलियों में देखा जा सकता है जहां उनके समर्थक मीडिया का उपहास करते हैं, मीडियाकर्मियों पर तरह-तरह के ताने कसते हैं और उनके कार्य करने में तरह-तरह से बाधा डालते हैं। यह सब निश्चित ही राष्ट्रपति की शह पर होता है। प्रेस के प्रति ट्रंप के व्यवहार से अब सभी परिचित हैं। वे प्रेस को ‘जनता का दुश्मन’ कहते हैं। उनका मानना है कि प्रेस ‘झूठी खबरें’ छापता है। हाल में उन्होंने प्रेस को ‘बीमार और खतरनाक’ बतलाया था और यहां तक कह दिया था कि प्रेस के कारण युद्ध भी छिड़ सकता है। उन्होंने पत्रकारों को मानवता के लिए ‘निम्नतम अधम’ कहा है। उन्होंने सीएनएन, न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट को विशेष रूप से अपना विरोधी मान कर समय-समय पर उनका अपमान किया है। अभी कुछ ही दिन पूर्व उन्होंने व्हाइट हाउस में मीडिया संबंधी एक मीटिंग में सीएनएन के एक रिपोर्टर को नहीं आने दिया था।

ट्रंप विरोधी इस अभियान के कुछ आनुषंगिक परिणाम भी निकल सकते हैं। चवालीस फीसद रिपब्लिकन मतदाताओं यानी ट्रंप समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रपति को अपने अधिकार का उपयोग कर कुछ संस्थाओं को उनके ‘गलत व्यवहार’ के कारण बंद कर देना चाहिए। हाल में ही किए गए एक अन्य सर्वे में इक्यावन फीसद ट्रंप समर्थकों ने माना कि मीडिया जनता का दुश्मन है। ट्रंप की कुछ रैलियों में मीडिया का ट्रंप विरोधी रुख देखते हुए विशेषकर महिला पत्रकारों को तरह-तरह की धमकियां दी गई हैं, उन पर हमले भी किए गए, यहां तक कि उन्हें यौन प्रताड़ना का शिकार भी होना पड़ा है। ‘बोस्टन ग्लोब’ द्वारा शुरू किए गए इस अभियान में भी निश्चित रूप से कुछ खतरे हैं और इस बात पर अमेरिकी प्रेस में भी अलग-अलग मत हो सकते हैं। सबसे पहली बात तो यही है कि कुछ लोगों के साथ ही ट्रंप को भी यह कहने का मौका मिलेगा कि प्रेस शुरू से ही राष्ट्रपति के खिलाफ ‘युद्धरत’ है। लेकिन यह तथ्य कि प्रत्येक संपादकीय बिलकुल अलग-अलग और स्वतंत्र रूप से लिखा गया है और कुछ और ही कहता है जैसे कि एक संपादकीय में लिखा गया है- हम ट्रंप शासन के साथ ‘युद्धरत’ नहीं हैं, हम तो केवल अपना काम कर रहे हैं, ट्रंप की इस धारणा को गलत सिद्ध करता है। पिछले महीने ट्रंप न्यूयार्क टाइम्स के प्रकाशक से इसी बात पर विचार-विमर्श करने के लिए मिले थे और उन्होंने बाद में कहा था कि वह मीटिंग सद्भावानापूर्ण रही और आपसी मतभेद भुला दिए गए हैं। पर उसके कुछ ही घंटों बाद वे ट्विटर पर अखबार उद्योग में ट्रंप विरोधियों पर अपनी भड़ास निकालने में नहीं चूके। उनका कहना था कि लगभग बंद होने वाला न्यूयार्क टाइम्स और ‘अमेजान वाशिंगटन पोस्ट’ हमारे द्वारा किए गए अच्छे कार्यों की भी आलोचना करते हुए हमारे विरोध में लिखते रहते हैं। कुत्तों की पूंछ कभी भी सीधी नहीं होती।

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