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राजनीति: स्मार्टफोन की लत से बढ़ते हादसे

कभी बातचीत का माध्यम रहा मोबाइल अब चलता-फिरता मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन बन गया है। यही कारण है कि कभी सेल्फी लेते मौत, तो कभी सड़क दुर्घटना में जान जाने जैसी खबरें अब आम हो गई हैं। यह तकनीकी सुविधा अब बर्बादी का कारण भी बनती जा रही है। सार्वजनिक परिवहन या स्कूल वाहनों के चालकों की ऐसी गलती से तो एक साथ कई निर्दोष लोगों की जान चली जाती है, जैसा कि कुशीनगर की दुर्घटना में हुआ है।

दुर्घटना की वजह यह रही कि एक अलग ही दुनिया में गुम चालक इयरफोन लगा गाने सुनने में व्यस्त था।

हाल में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में ट्रेन और स्कूल वैन की टक्कर में तेरह बच्चों की मौत के दर्दनाक हादसे के बाद फिर यह सवाल उठा है कि मोबाइल फोन जैसे तकनीकी गैजेट का इस्तेमाल कब और कितना किया जाए? यह पीड़ादायी दुर्घटना यकीनन एक अक्षम्य लापरवाही है जिसमें स्कूल वैन का ड्राइवर इयरफोन लगा कर गाने सुनते हुए बच्चों से भरी गाड़ी चला रहा था। वहां मौजूद लोगों ने उसे आगाह भी किया, लेकिन इयरफोन के चलते वह सुन नहीं पाया। नतीजतन, रेलवे क्रासिंग पर स्कूल वैन ट्रेन की चपेट में आ गई। विडंबना देखिए कि एक ओर मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग और दूसरी ओर वैन में चालक की मौजूदगी के बावजूद इंसानी सूझबूझ की गैर-मौजूदगी। दुर्घटना की वजह यह रही कि एक अलग ही दुनिया में गुम चालक इयरफोन लगा गाने सुनने में व्यस्त था। एक घायल बच्चे के मुताबिक बच्चों ने भी उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने इयरफोन नहीं निकाले और बच्चों की बात को अनसुना कर दिया। चिंतनीय है कि हमारे यहां तो वैसे ही बच्चों का स्कूली सफर असुरक्षा से भरा और असुविधाजनक है। ऐसे में ड्यूटी के दौरान तकनीकी गैजेट में खोए रहने की आदत ऐसी दुर्घटनाओं के आंकड़े बढ़ाने वाली साबित हो रही है। बड़ा सवाल यह भी है कि गैजेट में गुम होकर ऐसे हादसों को खुद न्योता देने की लापरवाही आखिर क्यों बरत रहे हैं हम? इस गैर-जिम्मेदारी के चलते कई परिवारों ने अपने घर के चिराग खो दिए।

रफ्तार के रोमांच, यातायात नियमों की अनदेखी और स्मार्टफोन की दीवानगी का यह कैसा जुनून है, जिसके चलते लोग न केवल अपना जीवन गंवा रहे हैं, बल्कि ऐसे दुस्साहसी वाहन चालकों की गलती का खमियाजा अन्य लोगों को भुगतना पड़ रहा है। कुशीनगर के इस हादसे में भी ऐसे ही पागलपन ने मासूम बच्चों की जिंदगी लील ली। देखने में आ रहा है कि अब लोग वाहन चलाते हुए भी गैजेटों में इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि रास्ते में अपने आगे-पीछे चल रहे वाहनों की भी खबर नहीं रहती। अफसोस कि कभी बातचीत का माध्यम रहा मोबाइल अब चलता-फिरता मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन बन गया है। यही कारण है कि कभी सेल्फी लेते मौत, तो कभी सड़क दुर्घटना में जान जाने जैसी खबरें अब आम हो गई हैं। यह तकनीकी सुविधा अब बर्बादी का कारण भी बनती जा रही है। सार्वजनिक परिवहन या स्कूल वाहनों के चालकों की ऐसी गलती से तो एक साथ कई निर्दोष लोगों की जान चली जाती है, जैसा कि कुशीनगर में हुई दुर्घटना में हुआ है।

आंकड़े बताते हैं कि तेज रफ्तार, नियमों की अनदेखी, शराब पीकर और मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चलाने जैसे कारण इन हादसों की सबसे बड़ी वजहें हैं। ऐसी लापरवाहियों के चलते होने वाले जानलेवा हादसे वो आपदाएं हैं जिन्हें लोग स्वयं आमंत्रित रहे हैं। विशेषज्ञों का भी मानना है कि जब तक भारत में तेज रफ्तार से वाहन चलाने, शराब पीकर गाड़ी चलाने, सुरक्षा बेल्ट का प्रयोग न करने और वाहन चलाते हुए मोबाइल पर बात करने पर सख्ती नहीं दिखाई जाएगी, तब तक सड़क दुर्घटनाओं पर लगाम लगा पाना मुश्किल है। मोबाइल के इस्तेमाल ने तो इन हादसों के आंकड़ों में इजाफा किया है। संचार का यह माध्यम अब जरूरत नहीं, लत बन गया है। अपने परिवेश में ही गौर करें तो नजर आता है कि वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना, गाने सुनना, नंबर डायल करना, वीडियो देखना या वाट्सएप संदेश पढ़ना या लिखना अब आमजन की आदत में शामिल हो चुका है, जो सफर के दौरान चालक का ध्यान भटकाने वाला साबित होता है। अपनी जिंदगी खतरे में डालने के साथ दूसरों के लिए भी जोखिम पैदा करने वाला यह व्यवहार अब जीवनशैली का हिस्सा बन गया है। नतीजतन, सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण अब मोबाइल फोन बनता जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि स्मार्टफोन में लगे रहने की इस आदत के कारण सड़क दुर्घटनाओं में अठारह से पैंतीस आयु वर्ग के लोगों की मृत्यु सबसे ज्यादा हो रही है। इतना ही नहीं, सनतानवे फीसद सड़क दुर्घटनाएं लापरवाही से वाहन चलाने की वजह से हो रही हैं। भारत में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और उनमें मरने वालों के आंकड़े इतने डरावने हैं कि प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो संदेश ‘मन की बात’ में भी इसका जिक्र किया था।

संयुक्त राष्ट्र ने सर्वाधिक सड़क दुर्घटनाओं वाले जिन दस देशों की पहचान की है, उनमें भारत सबसे ऊपर है। अफसोस कि जिन तकनीकी माध्यमों से हमें और जागरूक बनना चाहिए था, वे इन हादसों की संख्या और बढ़ा रहे हैं। विचारणीय है कि आज जीवन के लिए जरूरी सुविधा बने मोबाइल की संचार क्रांति में अहम भूमिका है, पर इसकी वजह से विश्व में हर साल बीस फीसद सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। इसमें से आधी दुर्घटनाएं भारतीय राजमार्गों पर होती हैं। दरअसल, मोबाइल फोन के जरिए उपलब्ध सभी तरह की गतिविधियां अब सुविधा नहीं, बल्कि सनक की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं। गांव हो या शहर, वाहन चलाते समय मोबाइल इस्तेमाल करने की यही सनक दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बन रही है। खासकर इयरफोन लगा कर वाहन चलाने से तो हादसे की आशंका गई गुना बढ़ जाती है। इयरफोन लगाकर अपने परिवेश से कटे लोग कई बार पैदल चलते हुए भी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। दुपहिया वाहन पर भी लोग मोबाइल फोन इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। जबकि पूरे देश में वाहन चलाते समय मोबाइल का इस्तेमाल करना न सिर्फ प्रतिबंधित है, बल्कि यातायात पुलिस द्वारा भी वाहन चलाते समय मोबाइल के उपयोग नहीं करने की सलाह दी जाती है। भारत में वाहन चलाने के दौरान मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर किए गए अध्ययन में सामने आया था कि उनतीस फीसद नागरिक वाहन चलाने के दौरान मैसेज और ई-मेल करने के साथ सोशल मीडिया का भी उपयोग करते हैं। गौरतलब है कि ये चौंकाने वाले आंकड़े वर्ष 2013 के हैं। जबकि बीते पांच सालों में हमारे यहां न केवल मोबाइल फोन के उपयोगकर्ता बढ़े हैं, बल्कि इंटरनेट की पहुंच में भी इजाफा ही हुआ है। नतीजतन, ऐसी दुर्घटनाओं के आंकड़े भी बढ़े हैं। मोबाइल की वजह से बढ़ती दुर्घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए कुछ समय पहले राजस्थान सरकार ने वाहन चालकों में समझ और सजगता लाने के उद्देश्य से मोबाइल जब्त करने का सख्त कदम उठाने का भी फैसला किया था। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि अपनी और दूसरों की जान बचाने के लिए दी जा रही सलाह के लिए भी सरकार को सख्ती दिखानी पड़ रही है।

विचारणीय है कि किसी नागरिक के अनमोल जीवन की क्षति उसके परिवार के लिए ही नहीं समाज और राष्ट्र के लिए भी होती है। इसीलिए यह समझना जरूरी है कि तकनीक बेहतरी और बदलाव का माध्यम न बने, तो कम से कम इसे ऐसी अपूरणीय क्षति की वजह तो न बनाएं। निस्संदेह आत्मनियंत्रण व संयम से सड़क की बहुत सी दुर्घटनाएं टाली जा सकती हैं। तकनीकी गैजेटों के प्रयोग को लेकर भी यही सोच अपनाने की दरकार है। अपने और दूसरों के जीवन का मोल समझने का भाव ही यह सार्थक सोच ला सकता है। साथ ही तकनीक से मिली कोई सुविधा सनक न बन जाए, यह समझना भी जरूरी है। ऐसी जीवनशैली से परहेज करना आवश्यक है जिसमें तकनीक की जरूरत और लत का अंतर ही भुला जाए। वाहन चलाते समय बुनियादी अनुशासन का पालन करने और स्वनियंत्रण से गैजेट के बेजा इस्तेमाल से बचना ही ऐसे हादसों को रोक सकता है।

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