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राजनीति : मौलिक अधिकार बनाम मौलिक कर्तव्य

वक्त के साथ मौलिक अधिकारों को लेकर सामाजिक चेतना बढ़ी है, पर मौलिक कर्तव्यों की तो जैसे किसी को सुध ही नहीं। बेशक अगर मौलिक अधिकारों पर आंच आए या उनका हनन हो तो हमें उसका पुरजोर विरोध करना चाहिए, वरना हमारे मौलिक अधिकारों के साथ-साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी बलि चढ़ जाएगी। लेकिन मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों को भी हमेशा याद रखने की जरूरत है।

Author June 23, 2018 1:41 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

राजेश वर्मा

छब्बीस जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया। संविधान ही वह दस्तावेज है जिसमें वर्णित मौलिक अधिकारों के बल पर हम देश के हर कोने में अपनी हर प्रकार की स्वतंत्रता का आनंद उठाते हैं। किसी भी प्रकार का अन्याय होने पर यही मौलिक अधिकार हमारी ढाल बन जाते हैं। हर भारतीय खुद को सौभाग्यशाली समझता है कि उसे ऐसे मौलिक अधिकार मिले जिनसे वह अपने जीवन को बिना किसी डर के व्यतीत कर सकता है। हम सब मौलिक अधिकारों की बात तो बड़े जोर-शोर से करते हैं, लेकिन जब बात आती है देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की, तो हम सब पीछे हटने और टालमटोली वाली हालत में आ जाते हैं। इसी संविधान ने हमें समाज व देश के प्रति जो जिम्मेदारी तय करने के मौलिक कर्तव्य दिए उनकी बात या तो कोई करना नहीं चाहता या हम जान-बूझ कर नहीं करते। मतलब साफ है, हम पाना तो सबकुछ चाहते हैं लेकिन बदले में या अपना दायित्व समझ कर कुछ करना नहीं चाहते। इसी संविधान में वर्ष 1976 में किए गए 42वें संविधान संशोधन के द्वारा नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को सूचीबद्ध किया गया था। संविधान के भाग क में सन्निहित अनुच्छेद 51 ‘क’ मौलिक कर्तव्यों के बारे में है। यह अन्य चीजों के साथ-साथ नागरिकों को संविधान का पालन करने, आदर्श विचारों को बढ़ावा देने और अनुसरण करने का आदेश देता है, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेता है, देश की रक्षा करने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर देश की सेवा करने और सौहार्द व समान बंधुत्व की भावना विकसित करने, साथ ही धार्मिक, भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान करने का आदेश व प्रेरणा देता है।

सरदार स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसा पर ही संविधान के 42वें संशोधन-1976 के द्वारा मौलिक कर्तव्यों को संविधान में जोड़ा गया। मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा को रूस के संविधान से लिया गया है। कहने को तो मौलिक कर्तव्यों की संख्या ग्यारह है, पर इनमें कुछेक कर्तव्यों को एक-दूसरे में जोड़ दिया गया है अर्थात नाम अलग-अलग कर दिया गया है। बात की जाए विशेष व जरूरी मौलिक कर्तव्यों की, तो सबसे पहले प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे। प्रत्येक देशवासी का मौलिक कर्तव्य बनता है कि भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे। हमें यह याद जरूर रहता है कि हमें हमारी सुरक्षा का मौलिक अधिकार मिला हुआ है, पर देश की सुरक्षा व अखंडता की आज कितने लोग परवाह कर रहे हैं? देश की रक्षा केवल सीमा पर जाकर या सैनिक बन कर ही नहीं हो सकती। हम देश में या अपने क्षेत्र में भाईचारे की भावना को पैदा कर भी देश की रक्षा कर सकते हैं। आज जाति या धर्म के नाम पर बंटने-बांटने के बजाय हम क्यों नहीं अपने मौलिक कर्तव्य का पालन करते? अपने-अपने धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की बात तो सब करते हैं लेकिन सर्वधर्म स्वतंत्रता व धार्मिक विश्वास को बढ़ाने की बात आखिर क्यों नहीं की जाती? तब हम इसी मौलिक अधिकार के साथ-साथ मौलिक कर्तव्य की बात क्यों नहीं करना चाहते? हम शिक्षा, स्वास्थ्य, व सड़क जैसी जन सुविधाएं पाने के लिए अपने मौलिक अधिकारों की बात भी करते हैं लेकिन इन्हीं जन सुविधाओं को पा लेने के बाद इनके रखरखाव की बात हम क्यों नहीं करते? हमें परिवहन सुविधा मिलती है लेकिन हम उसी सुविधा के प्रति अपने मौलिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। अपने-अपने क्षेत्र में सरकारी बस चले ऐसा अधिकार तो हम चाहते हैं लेकिन उन्हीं बसों को अपने आक्रोश का प्रदर्शन करने या किसी मांग को पूरा करवाने के लिए जला देते हैं। कई बार बस में बैठे-बैठे बस की सीट को फाड़ देना या किसी को ऐसा करते देख कर न रोकना भी मौलिक कर्तव्य का हनन है।
अपनी मांगें मनवाने के लिए हम मौलिक अधिकार की आड़ लेकर आंदोलन करते हैं, लेकिन मौलिक अधिकार में शांतिपूर्वक विरोध प्रकट करने की बात है, न कि हिंसक प्रदर्शन या आगजनी कर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना।

हम तब क्यों भूल जाते हैं कि सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखने का मौलिक कर्तव्य भी इसी संविधान ने दिया है। आपका रोष व्यवस्था से हो सकता है लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मतलब खुद को नुकसान पहुंचाना है। यह कोई मुफ्त में मिला उपहार नहीं होता, यह हम सबके द्वारा करों के रूप में किए गए भुगतान से होने वाली आय से बनी संपत्ति होती है। चाहे कोई ग्रामीण हो या शहरी, सभी को सड़क सुविधा तो चाहिए, लेकिन जब यही सड़क सुविधा मिल जाती है तो देखने में आता है कि कोई अपने घर के व्यर्थ पानी को सड़क पर फेंक रहा है, किसी के शौचालय की निकासी सड़क पर है तो कोई निजी कार्य के लिए सड़क को उखाड़ रहा है। सुविधा के लिए मौलिक अधिकार तो याद रहा लेकिन उसी सुविधा अर्थात सार्वजनिक संपत्ति के प्रति हमें अपने मौलिक कर्तव्य की याद क्यों नहीं रहती! हमारा मौलिक कर्तव्य है पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करना, पर आए दिन जंगलों को अवैध रूप से काटने से खुद को या अन्य को कहां रोक पा रहे हैं? छह से चौदह वर्ष के बच्चों का प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना (86वां संशोधन) जहां बच्चों का मौलिक अधिकार है वहीं दूसरी तरफ इनके अभिभावकों का यह मौलिक कर्तव्य भी है कि बच्चों को शिक्षा दिलाएं। देखा जाए तो अधिकारों और कर्तव्यों का अन्योन्याश्रित संबंध है।

अधिकारों का अभिप्राय है कि मनुष्य को कुछ स्वतंत्रताएं प्राप्त होनी चाहिए, जबकि कर्तव्यों का अर्थ है कि व्यक्ति के ऊपर समाज के कुछ ऋण हैं। समाज का उद््देश्य किसी एक व्यक्ति का विकास न होकर सभी मनुष्यों के व्यक्तित्व का समुचित विकास है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार के साथ कुछ कर्तव्य जुड़े हुए हैं जिन्हें निभाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। देखा जाए तो हम मौलिक अधिकारों को अपनी जागीर मानते हैं जबकि मौलिक कर्तव्यों को दूसरों के लिए छोड़ देते हैं, मतलब लेने का अधिकार हमारा और देने का किसी दूसरे का। यह सोच हमें विकसित होने नहीं दे सकती। एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सबकी अपने राष्ट्र के प्रति जवाबदेही बनती है। मौलिक अधिकार जहां हमें देश में स्वतंत्र रूप से रहने-सहने की शक्तियां देते हैं वहीं मौलिक कर्तव्य हमें देश के प्रति बनते हमारे दायित्व को निभाने के आदेश देते हैं। मौलिक अधिकार व मौलिक कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि विरोधी। वक्त के साथ मौलिक अधिकारों को लेकर सामाजिक चेतना बढ़ी है, पर मौलिक कर्तव्यों की तो जैसे किसी को सुध ही नहीं। यह अंतर्विरोध ही आज हमारी तमाम समस्याओं की जड़ है, और इसी अंतर्विरोध के कारण आए दिन तमाम तरह के टकराव, झगड़े और संघर्ष पैदा होते हैं। बेशक अगर मौलिक अधिकारों पर आंच आए या उनका हनन हो तो हमें उसका पुरजोर विरोध करना चाहिए, वरना हमारे मौलिक अधिकारों के साथ-साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी बलि चढ़ जाएगी। लेकिन मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों को भी हमेशा याद रखने की जरूरत है।

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