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राजनीति: स्वच्छता और बुनियादी शिक्षा

स्कूलों के व्यक्तिगत साफ-सफाई के प्रशिक्षण में हाथ धोना एक प्रमुख गतिविधि है। हालांकि सौ साल से भी ज्यादा समय से इसके लिए अभियान चलाया जा रहा है कि लोग खाने के पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ जरूर धोएं। लेकिन अभी भी इस पर बहुत काम किया जाना है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास के लक्ष्यों में ही स्वच्छता के लक्ष्य के तहत साबुन से हाथ धोने वालों की संख्या बढ़ाने का भी लक्ष्य शामिल है।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

बात 14 फरवरी 1916 की है जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक गुरुकुल में सुझाया था कि स्कूलों में बच्चों को स्वच्छता नियमों का ज्ञान ही नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें इसके पालन के लिए भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। बापू से प्रेरित दो अक्तूबर 2014 से शुरू हुए स्वच्छ भारत मिशन को अगर सफल बनाना है तो देश के सारे स्कूलों में पर्याप्त शौचालय, पानी, उचित कूड़ा प्रबंधन और साफ-सफाई के प्रति बच्चों के व्यवहार में अपेक्षित बदलाव लाने के कार्यक्रमों को रफ्तार देनी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थितियां ज्यादा खराब हैं। स्वच्छ भारत मिशन में भी शहरी क्षेत्रों से भिन्न ग्रामीण पारिवारिक शौचालयों के निर्माण, जल भंडारण और शौचालयों के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए भी वित्तीय प्रावधान हैं।

दशकों से यूनिसेफ जैसी संस्थाओं का मानना रहा है कि बच्चों में मृत्युदर बढ़ने के प्रमुख कारणों में असुरक्षित जल आपूर्ति, खराब स्वास्थ्य और स्वच्छता का खराब स्तर भी है। भारत की कुल जनसंख्या में बच्चों की तादाद उनतालीस फीसद से ज्यादा है। स्कूल जाने वाली उम्र के बच्चों में से करीब छियानवे फीसद का नाम स्कूलों में पंजीकृत हैं। इसलिए स्कूलों में जैसे मिड-डे मील से बच्चों को खासकर वंचित बच्चों को पोषण का लाभ मिलता है, वैसे ही स्कूलों में पर्याप्त जल आपूर्ति, शौचालय सुविधा व स्वच्छता से उन्हें अच्छा स्वास्थ्य पाने और पढ़ाई को बेहतर करने में मदद की जा सकती है। इससे कक्षाओं में बच्चों की बीमारी के कारण होने वाली गैरहाजिरी में भी कमी लाई जा सकती है। इससे सबके लिए प्राथमिक शिक्षा के संयुक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दी लक्ष्य को पाने में भी मदद मिलेगी। स्कूलों के माध्यम से बच्चों को स्वस्थ रखने की रणनीति में उपचार से ज्यादा जानकारी देने, व्यवहार और आदतों में बदलाव से बीमारियों से बचाव कार्यक्रमों पर जोर दिया जाता है। जानकारी, दृष्टिकोण और आचरण तीनों में सकारात्मक समन्वय जरूरी है। इसमें शिक्षकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। स्कूलों में ही साफ जल, उपयुक्त साफ-सफाई- शौचालय व्यवस्था प्रदान कर और वैयक्तिक स्वच्छता संबंधी जानकारी देकर, खासकर छात्राओं को वे अवसर भी दिए जा सकते हैं जो उन्हें घर या समुदाय में उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन उनके लिए बहुत जरूरी हैं। इन सारी जरूरतों को या एकांशों को समेटता हुआ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित अंग्रेजी शब्द ‘वाश’ है। यह अंग्रेजी के अक्षरों डब्ल्यूए (वाटर), एस (सेनीटेशन) और एच (हाइजीन) से बना है। भारत समेत पूरे विश्व में स्कूलों में वाश या उस जैसे ही कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। भारत में कई कारपोरेट घराने समुदाय और स्कूलों के वाश कार्यक्रमों के लिए सीएसआर (कारपोरेट सामाजिक दायित्व) के अंतर्गत वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं। किंतु सरकारों, वित्त प्रदाताओं के धन से र्इंट, गारे व लोहे की सुविधा संरचनाओं के निर्माण मात्र से पूरा लाभ छात्रों को नहीं मिल सकता है।

इसके लिए संवेदनाओं का होना भी वांछित है। इन अवस्थापनाओं के बाद बच्चों को हाथ धोने, शौचालय उपयोग, साफ-सफाई का ज्ञान और आचरण के बारे में जो बताया जाता है, बच्चे उन जानकारियों पर अमल कर सकें, यह सुनिश्चित किया जाना भी जरूरी है। छोटे बच्चों को हैंडपंप चलाने में या ऊंचाई पर लगा नल खोलने व फिर रगड़ कर हाथ धोने में दिक्कत होती है। लेकिन फिर भी कागजी खानापूरी हो जाती है कि स्कूल में शौचालय भी हैं और वाश स्टेशन भी हैं। वाश स्टेशन का अर्थ है जहां बच्चे शौच के बाद तत्काल ही हाथ धो सकें। खुले में हैंडपंप या नल है तो बच्चा कैसे बरसात में वहां जाएगा? नल की टोंटी यदि ऊंचाई पर है या सख्त है तब भी बच्चों को दिक्कत आती है। स्कूलों में लड़कियों के लिए ऐसे कार्यक्रम लड़कों से अलग महत्त्व रखते हैं। इसके अलावा स्कूलों में शौचालयों के अनवरत रखरखाव की भी बड़ी समस्या है। सफाई कर्मचारी हर समय के लिए न के बराबर ही रखे गए हैं। यदा-कदा बच्चों को ही शौचालय साफ करना पड़ता है। यह क्षोभजनक स्थिति है। स्कूलों के व्यक्तिगत साफ-सफाई के प्रशिक्षण में हाथ धोना एक प्रमुख गतिविधि है। हालांकि सौ साल से भी ज्यादा समय से इसके लिए अभियान चलाया जा रहा है कि लोग खाने के पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ जरूर धोएं। लेकिन अभी भी इस पर बहुत काम किया जाना है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास के लक्ष्यों में ही स्वच्छता के लक्ष्य के तहत साबुन से हाथ धोने वालों की संख्या भी बढ़ाने का लक्ष्य शामिल है। बताया जाता है कि साबुन से सही तरीके से हाथ धोने मात्र से बच्चों में डायरिया से होने वाली मौतों में पचास फीसद और श्वसन तंत्र संक्रमण से होने वाली मौतों में पच्चीस फीसद तक की कमी लाई जा सकती है। इससे आखों के संक्रमणों से भी बचाव में मदद मिलती है।

वाश अभियान में सामूहिक हाथ धोने का अभ्यास स्कूलों में कराना जरूरी है। लेकिन इस पर ज्यादा गंभीरता देखने को नहीं मिलती। बच्चों से साक्षात्कार में मालूम चलता है कि बच्चों को इस बात की जानकारी तो रहती है कि बीमारियों से बचने के लिए हाथ धोने चाहिए। वे स्कूलों में इस पर अमल भी करते हैं, लेकिन घर में लापरवाही कर देते हैं। बच्चे ज्यादा समय घरों में रहते हैं। जिन कार्यों को करने के पहले या बाद में साबुन से हाथ धोने की आवश्यकता उन्हें बताई जाती है, उनमें से अधिकांश गतिविधियां जैसे खाना खाना, शौच जाना, जूते पॉलिश करना, कूड़ा इकट्ठा करना और उसे बाहर फेंकना, जानवरों को दुलारना, खाना बांटना या इसी तरह के हाथ धोने के लिए बताए गए नाजुक क्षणों वाले कामों को तो वे घर पर ही करते हैं। किन्तु बार-बार हाथ धोने को बच्चा खुद और परिवार वाले भी झंझट मान सकते हैं, खासकर जब घर में पानी की कमी हो। अत: जानकारी के बाद भी घरों में घरवालों के कारण ही हाथ धोने पर जोर देने की आदत व्यवहार में नहीं बदल रही है। बड़े भी तो घर में अच्छे आदर्श स्थापित नहीं करते हैं। उन परिवारों को विशेष निगरानी की आवश्यकता है जिनके बच्चे स्कूल में हैं। आकलन इसका हो कि क्या सारा सिखाया बेकार जा रहा है, या बच्चे फिर घर वालों को बेहतर हाथ व व्यक्तिगत सफाई की आदतों के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अच्छी आदतों को बच्चे बनाए रखें या अपने वाश अभियानों को अपना मानें, इसके लिए बच्चों की वाश कमेटी बनाई जानी चाहिए। बाद में ऐसी संरचनाओं, अवसरों और सीख से लाभ पाए बच्चे घरों और समुदाय को भी साफ-सफाई व स्वच्छता की आदतों व संरचनाओं को अपनाने में प्रेरक की भूमिका में लाए जा सकते हैं।

स्कूलों में जो कुछ सिखाया जाए, चाहे आचरण के संदर्भ में या ज्ञान के संदर्भ, वह घर में मटियामेट न हो जाए, इसकी जिम्मेदारी घर वालों को लेनी होगी। किताबी होम वर्क में या प्रोजेक्ट में जिस तरह से बच्चों की मदद करते हैं, उसी तरह से बढ़-चढ़ कर उन्हें इस स्वच्छता के होम वर्क को भी पूरा करवाने में मदद करनी चाहिए और यह होम वर्क बच्चे के स्कूल से लौटते ही तत्काल शुरू हो जाता है। स्कूल से घर पहुंचते ही बच्चे को भूख लगती है और वह कुछ खाने को मांगता है। तभी मालूम हो जाएगा कि खाने के पहले हाथ धोने की अपनी जानकारी पर बच्चा अमल कर रहा है कि नहीं। हम न भूलें कि स्कूलों में बच्चों को अच्छी आदत सिखाने के लाभ सीमित परियोजना अवधि तक ही नहीं, जीवन पर्यंत मिल सकते हैं, क्योंकि बचपन में सीखा जीवनभर काम आता है।