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राजनीति: प्रदूषण की भेंट चढ़ता बचपन

हमारे देश में हालिया बरसों में महानगरों में प्रदूषण अत्यधिक तेजी से फैला है। राजधानी दिल्ली में तो हर साल प्रदूषण की स्थितियां चेतावनी देती रहती हैं। सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु ही नहीं बची है। इसीलिए देश के हर भूभाग में प्रदूषणजनित स्वास्थ्य विकार तेजी से फैल रहे हैं और नई पीढ़ी इनकी चपेट में सबसे ज्यादा आ रही है। यही वजह है कि वायु प्रदूषण पर्यावरण और सेहत से संबंधित दुनिया का अकेला सबसे बड़ा खतरा है, जो वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन गया है।

Author November 2, 2018 2:42 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

प्रदूषण के कारण बच्चों में सेहत से जुड़ी परेशानियां तो बढ़ ही रही हैं, उनकी बौद्धिक क्षमता भी प्रभावित हो रही है। हालिया वर्षों में यह चर्चा का विषय रहा है कि हमारे यहां बच्चों की बदलती जीवनशैली और खानपान के कारण उनकी बौद्धिक क्षमता घट रही है लेकिन अब एक शोध में इस बात पुष्टि हुई है कि बच्चों की बौद्धिक क्षमता वाकई कम हो रही है। ऑस्ट्रेलिया के मैकक्वेरी विश्वविद्यालय के एक शोध के दौरान 2010 से 2018 के बीच भारतीयों के खून में सीसे की औसत मात्रा निकाल कर उसका विश्लेषण किया गया था। इसमें बच्चों के प्रत्येक डेसी लीटर रक्त में करीब सात माइक्रोग्राम सीसा पाया गया है, जो बहुत खतरनाक है। गौरतलब है कि ऐसा वायु प्रदूषण और खाद्य पदार्थों में सीसे की मात्रा ज्यादा होने के कारण हो रहा है।

वायु में सीसे की मात्रा बढ़ने का कारण भारत में मोटरबाइक या कार जैसे वाहनों में लगने वाली बैट्री को रिसाइकिल करने की प्रक्रिया को बताया गया है। गौरतलब है कि भारत में हर साल बड़ी संख्या में कार और दुपहिया वाहनों की बैट्री को रिसाइकिल किया जाता है लेकिन इस प्रक्रिया में प्रदूषण नियंत्रण की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। इसके कारण सीसा हवा में मिलता है। सांस के द्वारा शरीर में पहुंचने वाली सीसे की यह मात्रा रक्त को दूषित कर देती है। इस शोध के मुताबिक आयुर्वेदिक दवाओं, कुछ सौंदर्य प्रसाधनों और नूडल्स जैसे खाद्य पदार्थों के जरिये भी बच्चों के खून में सीसे की मात्रा बढ़ती है। इसके चलते बच्चों में शारीरिक व्याधियां तो पैदा होती ही हैं, नई पीढ़ी की दिमागी सेहत पर भी असर पड़ रहा है।
दरअसल, वायु प्रदूषण हो या मिलावटी खाद्य पदार्थ, बच्चों के स्वास्थ्य पर ये वयस्कों से कहीं ज्यादा असर डालते हैं। उनके शरीर के विकासशील अंग काफी संवेदनशील होते हैं जिसके चलते जहरीली हवा का दुष्प्रभाव ज्यादा होता है। यही वजह है कि हवा में घुलता जहर कम उम्र में ही बच्चों को बड़ी समस्याओं की ओर धकेल रहा है। हालिया कुछ बरसों में लगभग हर अध्ययन में भारत को उच्च वायु प्रदूषण के मामले में विश्व के कुछ सबसे खराब देशों की श्रेणी में रखा जा रहा है। वाहनीय उत्सर्जन की जहरीली गैसें और रासायनिक कण संपूर्ण पर्यावरण को हद दर्जे तक दूषित कर रहे हैं। बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हुए न्यायालय ने भी एक टिप्पणी में राजधानी दिल्ली में रहने को ‘गैस चैंबर’ में रहने जैसा बताया था। ऐसे अस्वास्थ्यकर हालात में बच्चों को अनगिनत शारीरिक और मानसिक व्याधियां तो घेर ही रही हैं, उनकी बौद्धिक क्षमता पर हो रहा दुष्प्रभाव भी बेहद चिंताजनक है। गौरतलब है कि भारत में बच्चों के खून में सीसे के मिश्रण का स्तर करीब सात माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रत्येक डेसी लीटर रक्त में एक माइक्रोग्राम सीसे से करीब आधा प्वाइंट आइक्यू (इंटेलीजेंट कोशेंट) स्तर घटता है। इस शोध की गणना के मुताबिक 2010 से 2018 के बीच खून में सीसे के स्तर को बताने वाले आंकड़ों से बौद्धिक क्षमता में कमी का ही नहीं, दूसरे रोगों के लिए जिम्मेदार डिसेबिलिटी अडजस्टेड लाइफ इयर्स (डीएएलवाई)का भी पता चलता है। दरअसल, डीएएलवाई यह बताता है कि खराब स्वास्थ्य, अक्षमता आदि से जीवन का कितना समय कम हो जाता है। ऐसे में कम उम्र में बच्चों का जीवन लील रहा प्रदूषण कई मोर्चों पर बचपन के लिए मुसीबत बन रहा है। चिंतनीय है कि हवा में घुलते इस जहर के चलते बच्चों में जीवन भर के लिए स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं। आमतौर पर यही समझा जाता है कि दूषित हवा सिर्फ शारीरिक रोगों का कारण बनती है जबकि इसका मानसिक स्वास्थ्य और विकास पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। हर साल बड़ी संख्या में बच्चे अतिसार, मलेरिया और दमा सरीखी पर्यावरण से जुड़ी बीमारियों के कारण तो दम तोड़ते ही हैं, अब दूषित वातावरण उनकी दिमागी सेहत पर भी गहरा असर डाल रहा है। यह बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कम कर रहा है। स्कूल से लेकर खेल के मैदान तक, बच्चे ज्यादा समय घर के बाहर बिताते हैं इसीलिए जहरीले रसायनों और कणों से दूषित हवा में सांस लेने को विवश होते हैं। वातावरण की जहरीली हवा के कारण बच्चों के फेफड़ों को भी बहुत ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है। इतना ही नहीं, वायु प्रदूषण बच्चों के मस्तिष्क के विकास और अनुभूति से जुड़ी संवृद्धि को भी प्रभावित कर सकता है।

पिछले साल आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सहित दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण से 1.22 करोड़ शिशुओं के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदूषणकारी तत्त्वों से दिमाग के ऊतक क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और संज्ञानात्मक विकास कमतर हो सकता है। बौद्धिक स्तर को कम करने के साथ ही प्रदूषण स्मृति लोप की समस्या भी साथ लाता है। इसी विषय पर स्वीडन के विश्वविद्यालय का नया शोध कहता है कि वायु प्रदूषण का घातक असर दिमाग पर भी होता है। इसकी चपेट में बच्चे और किशोर सबसे ज्यादा आते हैं। बच्चों के दिमाग पर बुरा असर पड़ने से कभी-कभी वे मानसिक रोगों के शिकार भी हो जाते हैं। यहां तक कि अगर गर्भवती स्त्री वायु प्रदूषण की चपेट में आती है तो उससे ज्यादा खतरा उसके होने वाले बच्चे को होता है। इसके कारण अजन्मे शिशु के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। निस्संदेह, यह समझना मुश्किल नहीं कि सांस के साथ शरीर में जाने वाले हानिकारक तत्त्व बच्चों की सेहत के हर पहलू पर घातक असर डालते हैं। जहरीली हवा से उपजा यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बेहद गंभीर है। हमारे देश में हालिया बरसों में महानगरों में प्रदूषण अत्यधिक तेजी से फैला है। चौबीसों घंटे कल-कारखानों और मोटर-वाहनों से निकलता काला धुआं हवा में फैलता है। राजधानी दिल्ली में तो हर साल प्रदूषण की स्थितियां चेतावनी देती प्रतीत होती हैं। चिंतनीय है कि महानगर तो प्रदूषण की गिरफ्त में हैं ही, दूसरे बड़े शहर भी दूषित हवा की भीषण चपेट में हैं। सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु ही नहीं बची है। इसीलिए देश के हर भूभाग में प्रदूषणजनित स्वास्थ्य विकार तेजी से फैल रहे हैं। नई पीढ़ी इनकी चपेट में सबसे ज्यादा आ रही है। यही वजह है कि वायु प्रदूषण पर्यावरण और सेहत से संबंधित दुनिया का अकेला सबसे बड़ा खतरा है, जो वैश्विक स्तर पर चिंता और सरोकार का विषय बन गया है। ऐसे में जरूरी है कि देश की भावी पीढ़ी के तन और मन की सेहत के लिए दंश बने वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए हर स्तर पर कोशिश हो। प्रदूषण के बढ़ते स्तर पर लगाम लगाने और भविष्य की बेहतरी के लिए न केवल सरकार को सचेत होगा होगा बल्कि आमजन को भी अपनी जीवन शैली में बदलाव लाना होगा। बिना विलंब किए यह समझना निहायत जरूरी है कि किसी भी तरह के विकास के मायने मानवीय जीवन से बढ़ कर नहीं हैं।

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