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राजनीति: मोटापे से हो जाएं सावधान

आमतौर पर यह माना जाता है कि मोटापा पश्चिमी देशों की ही समस्या है, लेकिन भारत में भी यह समस्या अपने पैर पसार रही है। मोटापा न सिर्फ इससे ग्रस्त व्यक्तियों के व्यक्तित्व को बेढब बनाता है, बल्कि उनके समग्र कार्यकलाप और कार्य-क्षमता को भी बुरी तरह प्रभावित करता है। साथ ही, मोटापे के कारण उनमें अनेक प्रकार की बीमारियां भी घर कर लेती हैं।

Author April 16, 2018 3:19 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पीयूष द्विवेदी

संयुक्त राष्ट्र के एक शोध के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, पिछले लगभग डेढ़ दशक में पांच साल तक के बच्चों के वजन में अड़तीस प्रतिशत का इजाफा हुआ है। बच्चों में मोटापा बढ़ना इस लिहाज से चिंताजनक है, क्योंकि ये बच्चे बड़े होने पर भी इसी प्रकार मोटापे से ग्रस्त हो सकते हैं और दुनिया में पहले से ही मौजूद मोटापे की समस्या को और बढ़ा सकते हैं। इस संदर्भ में गौर करें तो वर्ष 2016 में आई मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) की एक अध्ययन रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया था कि मोटापा दुनिया के लिए धूम्रपान और आतंकवाद के बाद तीसरा सबसे बड़ा संकट बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में सामान्य से अधिक वजन वाले लोगों समेत पूरी तरह से मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या लगभग 2.1 अरब है, जो कि दुनिया की कुल आबादी का तीस प्रतिशत है। रिपोर्ट ने यह तथ्य भी पेश किया है कि लोगों में बढ़ रहे मोटापे के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष तकरीबन दो हजार अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। अगर दुनिया में इसी तरह मोटापा बढ़ता रहा तो अगले डेढ़ दशक में दुनिया की आधी आबादी पूरी तरह इसकी चपेट में आ सकती है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि विकासशील देशों में मोटापे की समस्या कुछ अधिक ही है। एक आंकड़े के मुताबिक विकासशील देशों में स्वास्थ्य के मद में होने वाले कुल खर्च में मोटापे से बचाव के मद की हिस्सेदारी यों तो अधिकतम सात प्रतिशत है, लेकिन अगर इसमें मोटापाजनित बीमारियों के इलाज पर आने वाले खर्च को भी जोड़ दें तो ये आंकड़ा बीस प्रतिशत के पास पहुंच जाता है।

इन तथ्यों को देखते हुए सर्वाधिक चिंताजनक प्रश्न यह उठता है कि अभी जब दुनिया में तीस फीसद लोग कमोबेश मोटापे से ग्रस्त हैं, तब यह समस्या वैश्विक अर्थव्यवस्था को दो हजार अरब डॉलर यानी वैश्विक जीडीपी के 2.8 प्रतिशत का नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में, उक्त रिपोर्ट के अनुसार अगर अगले डेढ़ दशक में दुनिया की आधी आबादी पूरी तरह से इसकी चपेट में आ गई, तब यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को कितनी हानि पहुंचाएगा? संभव है कि तब मोटापा दुनिया के लिए सबसे बड़ी और चुनौतीपूर्ण समस्या बन जाय, एक ऐसी समस्या जिसके लिए दुनिया किसी भी तरह से तैयार न हो। आमतौर पर यह माना जाता है कि मोटापा आर्थिक रूप से संपन्न पश्चिमी देशों की ही समस्या है, लेकिन यह धारणा पूरी तरह से सही नहीं है। क्योंकि भारत जैसे विकासशील देश में भी यह समस्या धीरे-धीरे अपने पैर पसार रही है। पिछले दिनों ‘ग्लोबल अलायंस फॉर इंप्रूव्ड न्यूट्रीशन’ (गेन) द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि मोटापे के मामले में अमेरिका व चीन के बाद दुनिया में तीसरा स्थान भारत का ही है। इसी अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के कुल मोटापाग्रस्त किशोरों का ग्यारह फीसद और वयस्कों का बीस फीसद अकेले भारत में है। भारत में अधिकांश आबादी भोजन-प्रेमी है। यहां स्वादिष्ट भोजनों की विविधता है। पहले लोग खेतों में कठिन शारीरिक श्रम करते थे, जिससे भोजन शरीर में कैलोरी की मात्रा नहीं बढ़ा पाता था। आज के सुविधाभोगी दौर में लोग खा तो पहले जैसे या उससे बढ़ कर ही रहे हैं, पर शारीरिक श्रम ना के बराबर कर रहे हैं। फलस्वरूप मोटापे व भार की समस्या तेजी से बढ़ रही है।

इसी क्रम में अगर इस बात पर विचार करें कि आखिर मोटापा किस प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुप्रभावित करता है, तो कई बातें हमारे सामने आती हैं। दरअसल, मोटापा एक ऐसी समस्या है जो न सिर्फ इससे ग्रस्त व्यक्तियों के निजी व्यक्तित्व को बेढब बनाती है, बल्कि उनके समग्र कार्यकलाप, कार्य-क्षमता व गतिविधियों को भी बुरी तरह से प्रभावित करती है। इसको थोड़ा और अच्छे से समझने की कोशिश करें तो एक तरफ तो मोटे व्यक्तियों की खाद्य आवश्यकता सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक होती है, वहीं दूसरी तरफ वे अपने सामान्य से अधिक वजन के कारण सामान्य वजनी लोगों की अपेक्षा काफी सुस्त व ढुलमुल रवैये वाले हो जाते हैं। साथ ही मोटापे के कारण उनमें अनेक प्रकार की बीमारियां भी घर कर लेती हैं, जिनके इलाज पर काफी व्यय होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि मोटापे से ग्रस्त लोगों की स्वास्थ्य संबंधी लागत जहां सामान्य व्यक्ति से बहुत अधिक होती है, वही सुस्त व ढुलमुल रवैये के कारण उनकी उत्पादकता का स्तर काफी कम होता है। सीधे शब्दों में कहें, तो मोटे व्यक्तियों में खपत बहुत अधिक होती है, जबकि उनके सुस्त व ढुलमुल रवैये के कारण उनकी उत्पादकता बेहद कम होती है। अब मोटे लोगों में खपत और उत्पादकता के बीच का यह असंतुलन ही वह कारण है कि आज मोटापा वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी हानि पहुंचा रहा है। हालांकि ऐसा नहीं है कि आज दुनिया इस समस्या को लेकर बिलकुल भी सचेत नहीं है। दुनिया में मोटापे को नियंत्रित करने के लिए कमोबेश प्रयास किए जा रहे हैं। ब्रिटेन ने तो बच्चों में बढ़ते मोटापे से निपटने के लिए सॉफ्ट पेय पदार्थों पर शुगर टैक्स लगा दिया है। हालांकि इसे मोटापे से निपटने की आड़ में राजस्व वृद्धि का उपाय माना जा रहा है। वैसे, मोटापे के खात्मे के लिए खाद्य पदार्थों पर कैलोरी व पोषण की जानकारी देने से लेकर जन स्वास्थ्य जैसे अभियान चलाने तक उपायों की लंबी फेहरिस्त है। हालांकि ऐसे उपाय दुनिया भर में अपनाए गए हैं, लेकिन इनमें से अधिकाधिक प्रयास मोटापे की रोकथाम में कोई खास कारगर साबित होते नहीं दिख रहे। विचार करें तो इन उपायों के विशेष रूप से कारगर न रहने के पीछे मूल कारण जागरूकता का अभाव है।

मोटापा उन्हीं लोगों को सर्वाधिक चपेट में लेता है, जो खान-पान के विषय में लापरवाह, चटोर व आलसी होते हैं। ऐसे लोग स्वाद के चक्कर में उच्च कैलोरीयुक्त खाना तो खूब खाते हैं, लेकिन आलस के मारे उस कैलोरी की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए व्यायाम आदि नहीं करते। परिणाम यह होता है कि उनके शरीर में धीरे-धीरे कैलोरी की मात्रा काफी अधिक हो जाती है और वे मोटापे की समस्या से ग्रस्त हो जाते हैं। बच्चों के लिए खेल-कूदने की गुंजाइश कम होती जा रहा है, गली-गली में खुले तथाकथित पब्लिक स्कूलों में खेलने का मैदान ही नहीं होता है।बहरहाल, मोटापे की समस्या पर रोकथाम के लिए सबसे पहली आवश्यकता जागरूकता लाने की है। इसके अलावा इस दिशा में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा रखी गई ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ की सोच को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिलना भी काफी कारगर सिद्ध हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से योग व व्यायाम आदि को लेकर लोगों में स्वत: ही काफी जागरूकता आएगी। अब अगर लोग अपने जीवन में नियमित योग व व्यायाम को स्थान देने लगें तो मोटापे की समस्या को छूमंतर होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। अगर दुनिया को मोटापे की इस समस्या से पार पाना है, तो उसे अभी से इस दिशा में गंभीर होते हुए उपर्युक्त प्रयास करने की जरूरत है। अगर अभी इसको लेकर गंभीरता न दिखाई गई, तो संभव है कि एक समय ऐसा आ जाएगा जब दुनिया के लिए मोटापे की समस्या से मुक्ति पाना तो दूर, इसको झेलना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

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