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राजनीति: बाहरी दुनिया से अनजान मानव

सेंटीनल जनजाति की उग्रता के मूल में उसके कुछ भय हैं। याद करिए कि किस तरह पोटर्मेन द्वीप पर मिले छह जनों को अपने साथ ले आया था और उनमें से दो जनों ने दम तोड़ दिया। माना जाता है कि बाहरी दुनिया के संपर्क से सेंटीनल जैसी जनजातियों के लोग कुछ ऐसे संक्रमणों के संपर्क में आ जाते हैं जो उनकी जान के दुश्मन बन जाते हैं। अपनी विशिष्ट जीवनशैली के कारण ये लोग बहुत से संक्रामक तत्वों का प्रतिरोध नहीं कर पाते।

अमेरिकी पर्यटक जॉन एलन चाउ की मौत के बाद दुनिया का ध्यान एक बार फिर अंडमान द्वीप समूह के सेंटीनल आदिवासियों की ओर गया है।

अतुल कनक

अमेरिकी पर्यटक जॉन एलन चाउ की मौत के बाद दुनिया का ध्यान एक बार फिर अंडमान द्वीप समूह के सेंटीनल आदिवासियों की ओर गया है। माना जाता है कि जब जॉन एलन इन आदिवासियों के गृह द्वीप के निकट गए तो सेंटीनल आदिवासियों ने अपने तीरों से उनका वध कर दिया। सेंटीनल आदिवासी बाहरी दुनिया के प्रति बहुत उग्र हैं और अपनी जमीन के आसपास किसी का भी फटकना बर्दाश्त नहीं करते हैं। भारतीय कानून के अनुसार उनके गृहद्वीप के तीन मील की परिधि में जाना भी अपराध माना जाता है। इन आदिवासियों के बारे में दुनिया को बहुत कम जानकारी है। यहां तक कि उनकी संख्या भी अनुमानों पर आधारित है। 2001 की जनगणना के अनुसार यह माना गया कि उनकी संख्या उनतालीस है, जिनमें इक्कीस पुरुष और अठारह महिलाएं हैं। जबकि 2011 की जनगणना में इनकी संख्या केवल पंद्रह बताई गई जिनमें महिलाओं की संख्या केवल तीन थी। निरंतर घटते ये आंकड़े सेंटीनल आदिवासियों के डर की कहानी कहते हैं। हालांकि कतिपय मानवशास्त्रियों का मानना है कि उनकी कुल जनसंख्या पंद्रह से लेकर पांच सौ के बीच हो सकती है, क्योंकि जनगणना के दौरान उनका सर्वे एक निश्चित दूरी से किया गया था और संभव है कि कुछ लोग घने जंगलों में हों।

बंगाल की खाड़ी में स्थित कुल पांच सौ बहत्तर द्वीपों में ध्रुव उत्तर के ‘लैंड फॉल द्वीप’ से लेकर ठेठ दक्षिण के ‘ग्रेट निकोबार’ द्वीप तक मानव शास्त्रियों के अनुसार मूल रूप से छह जनजातियां निवास करती हैं। इनमें ओंगे, ग्रेड अंडमानी, जारवा और सेंटीनल जनजाति को नीग्रो प्रजाति का और शोंपेन और निकोबारी जनजाति को मूलत: मंगोल प्रजाति का माना जाता है। अनुमान है कि नीग्रो प्रजाति के लोग इस भूभाग में तकरीबन साठ हजार साल पहले दक्षिण अफ्रीका से आए थे। हजारों सालों से इस भूभाग में रह रहे सेंटीनल जनजाति के लोग किसी भी तरह के बाहरी संपर्क के बिल्कुल विरुद्ध हैं और इसीलिए उनके बारे में अधिकतम जानकारी अनुमानों पर आधारित है। कहा तो यह भी जाता है कि ये लोग कपड़े भी नहीं पहनते हैं। विश्वासपूर्वक यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग भोजन भी पकाना जानते हैं या नहीं। सेंटीनल जनजाति के लोगों की अपनी भाषा है, लेकिन इस भाषा को समझने में अभी कथित विकसित सभ्यता को सफलता नहीं मिल सकी है। डर है कि यदि सेंटीनल जनजाति का लोप हुआ तो यह ऐतिहासिक महत्व की भाषा भी लुप्त हो जाएगी। तेरहवीं शताब्दी में इस हिस्से से गुजरने वाले मार्कोपोलो नामक यात्री ने अपने संस्मरणों में इन्हें सबसे क्रूर और हिंसक कहा था।

सेंटीनल आदिवासियों के स्वभाव की इस उग्रता के मूल में केवल जातीय कारण ही नहीं है, अपितु सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारण भी हैं। सन 1789 में ब्रिटिश लेफ्टिनेंट ब्लेयर ने इस इलाके के चाथम द्वीप में आधुनिक व्यवस्थापन का प्रथम प्रयास किया था। यह द्वीप अब पोर्ट ब्लेयर का हिस्सा है। ब्लेयर को अपनी कोशिशों के प्रारंभ से ही जनजातीय रोष और उपद्रव का सामना करना पड़ा। लेकिन आदिवासियों के पास परंपरागत तीर कमान थे और अंग्रेजों के पास आधुनिक बंदूकें। आदिवासी उनके सामने टिक नहीं सके। एक मानवशास्त्री के अनुसार तब उनकी संख्या पांच सौ से ज्यादा थी, लेकिन कथित तौर पर विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयासों ने उनकी संख्या पंद्रह-बीस तक सीमित कर दी है। सन 1880 में ब्रिटिश नौसैनिक अधिकारी मॉरिस विडाल पोटर्मेन कुछ यूरोपीयों को लेकर उत्तरी सेंटीनल द्वीप गया था। उन दिनों पोटर्मेन अंडमान-निकोबार में औपनिवेशिक प्रशासक के तौर पर काम कर रहा था। पोटर्मेन और उसके दल को देख कर सेंटीनल घने जंगलों में चले गए, जहां उन्हें खोज पाना असंभव था। एक झोंपड़ी में इस दल को एक वृद्ध पुरुष, एक महिला और चार बच्चे मिले। लेकिन पोर्ट ब्लेअर लाते ही दोनों वयस्कों ने दम तोड़ दिया। बच्चों को बाद में उत्तरी सेंटीनल द्वीप पर छोड़ दिया गया। 1967 में टीएन पंडित के साथ बीस लोगों का एक समूह गया, लेकिन मूल निवासियों का व्यवहार उनके प्रति भी उग्रता भरा रहा। इसके बाद 1974 में नेशनल ज्योग्राफिक चैनल ने सेंटीनल आदिवासियों से संबंधित एक फिल्म ‘मैन इन सर्च ऑफ मैन’ (आदमी की तलाश में आदमी) की शूटिंग के सिलसिले में इस द्वीप की यात्रा की, लेकिन फिल्म निर्माताओं को भी भारी मशक्कत के बावजूद किसी सेंटीनल से बात करने का अवसर नहीं मिल सका। वो केवल पदचिन्ह तलाशते हुए उनके बीच दूर जंगल तक गए और इस बीच उन्हें सेंटीनलों की उग्रता का भी सामना करना पड़ा।

सेंटीनलों से परिचय स्थापित करने के प्रयास में उत्तरी सेंटीनल द्वीप तक एकाधिक बार गए ऐंटीस जस्टिन इस जनजाति को सबसे अलग-थलग पड़ी जनजाति बताते हैं। स्थिति यह है कि टीएन पंडित मार्च 1970 में ओंगे जनजाति के तीन सदस्यों को अपने साथ इसलिए ले गए थे कि उनके माध्यम से सेंटीनलों से कुछ संवाद स्थापित किया जा सके। लेकिन पंडित को सफलता नहीं मिली। इस प्रयास से जुड़े मानवशास्त्रियों का मानना है कि वक्त के साथ सेंटीनलों की उग्रता में कमी आई है। अब वो बाहरी दुनिया के व्यक्तियों से उपहार में नारियल आदि स्वीकार करने लगे हैं। इसके लिए वे कमर तक पानी में उतर कर आते हैं लेकिन किनारे पर उनके साथी अपने तीर-कमान साध कर तैयार रहते हैं। दरअसल सेंटीनल जनजाति की उग्रता के मूल में उसके कुछ भय हैं। याद करिए कि किस तरह पोटर्मेन द्वीप पर मिले छह जनों को अपने साथ ले आया था और उनमें से दो जनों ने दम तोड़ दिया। माना जाता है कि बाहरी दुनिया के संपर्क से सेंटीनल जैसी जनजातियों के लोग कुछ ऐसे संक्रमणों के संपर्क में आ जाते हैं जो उनकी जान के दुश्मन बन जाते हैं। अपनी विशिष्ट जीवनशैली के कारण ये लोग बहुत से संक्रामक तत्वों का प्रतिरोध नहीं कर पाते। करीब 60 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले उनके द्वीप का समुद्री तट उन्हें मछलियां, समुद्री कछुए पकड़ने का पर्याप्त अवसर देता है। अपनी आदिम जीवनशैली के कारण सेंटीनलों को अपनी जमीन और अपने जंगलों से अधिक किसी अन्य चीज की जरूरत नहीं पड़ती। जंगलों के प्रति बाहरी दुनिया का व्यवहार ही उन्हें बाहरी दुनिया के संपर्क की संभावना से ही उग्र कर देता है।

दरअसल भय ही व्यक्ति को उग्र बनाता है। चूंकि संख्या में वे बहुत सीमित हैं और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क बिल्कुल शून्य है। सेंटीनल आदिवासियों की चेतना पर तो कोई भी बाहरी प्रभाव इसलिए मुश्किल है, क्योंकि वो बाहरी दुनिया के संपर्क में ही नहीं है। अपने जैसी ही अन्य जनजातियों के संपर्क को भी वो सहन नहीं करते। इसके विपरीत 1998 तक बाहरी दुनिया के प्रति प्राय: हिंसक रहे जारवा जनजाति के लोग आधुनिक विकास की हलचल अपने इलाके में पाकर हतप्रभ भी हैं और बदल भी रहे हैं। यही वो जनजाति है जो अपनी जनसंख्या का घनत्व बनाए रखने में भी कामयाब हुई है। दक्षिणी अंडमान में इन लोगों की रिहाइश वाले इलाके को जारवा संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। इलाके में सड़कें भी बनी हैं और यहां बड़ी तादाद में पर्यटकों का आना-जाना भी है। 1960 और 1070 के दशक में जब यहां सड़कों का निर्माण कार्य शुरू हुआ था, तब जारवा जनजाति के सदस्यों ने बहुत उग्र प्रतिरोध किया था। सन 2000 तक भी वे अपने जंगलों में बाहरी लोगों और बाहरी वाहनों के प्रवेश के खिलाफ रहे। लेकिन अब उन्हें सड़क के किनारे भी सहजता से देखा जा सकता है।

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