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राजनीति: सुरक्षित आहार की चुनौती

खाद्य पदार्थों की मांग और आपूर्ति के बढ़ते अंतराल के कारण मुनाफाखोर व्यापारी चावल-दाल से लेकर दूध, दही, घी, मक्खन, फल, सब्जियां आदि में बड़े पैमाने पर अपमिश्रण कर रहे हैं। मिलावटी, अधोमानक, मिथ्याछाप, रासायनिक पदार्थों, एसेंस, रंगों आदि से निर्मित खाद्य पदार्थों के रूप में मीठा जहर परोस कर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

Author November 3, 2018 2:15 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

देवाशीष उपाध्याय

आज जहां एक ओर हम विकास की ऊंची छलांग लगाने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुर्भाग्य से कृषि प्रधान देश होने के बावजूद लगभग एक चौथाई आबादी को एक वक्त का ही भोजन नसीब हो रहा है। यह भोजन भी उनकी पोषण आवश्यकताओं की पूर्ति के बजाय, सिर्फ उन्हें जिंदा रखने के लिए पर्याप्त होता है। देश आधुनिक वैज्ञानिक और सूचना तकनीकी सहित अनेक क्षेत्रों में विश्व के बड़े से बड़े देश को मात देने की क्षमता रखता है, लेकिन बढ़ती जनसंख्या की पोषण आवश्यताओं की पूर्ति के लिए संतुलित और सुरक्षित आहार मुहैया कराने में विफल है। इसके चलते आधुनिक वैज्ञानिक और चिकित्सा तकनीकी के तीव्र विकास और विस्तार के बावजूद अस्पतालों में मरीजों की संख्या घटने के बजाय दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

देश का हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है। पाश्चात्य संस्कृति आधारित अनियमित दिनचर्या और खाने में पोषण और पौष्टिकता के बजाय, स्वाद को प्राथमिकता देने के कारण युवा पीढ़ी बीमार होती जा रही है। खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक और परंपरागत तत्त्वों के स्थान पर तुरंता आहार की बढ़ती मात्रा और संतुलित और सुरक्षित आहार की कमी से मनुष्य के शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी और हानिकारक रासायनिक तत्त्वों की वृद्धि हो रही है। इससे मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो रही है। छोटे-छोटे बच्चे असंख्य बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं। यह देश के उन्नत और सुरक्षित भविष्य के लिए भयावह संकेत है। विकास और तीव्र उद्योगीकरण के बावजूद कृषि क्षेत्र दिन-प्रतिदिन पिछड़ता जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और कृषि योग्य भूमि का औद्योगिक क्षेत्र में रूपांतरण होने के परिणामस्वरूप कृषि जोत का आकार या क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। इससे प्राकृतिक पर्यावरण बिगड़ रहा है। मानसून की अनिश्चितता और आकस्मिक प्राकृतिक प्रकोप और आपदा के कारण अक्सर बड़े पैमाने पर तैयार फसल नष्ट हो जाती है। इससे किसानों को व्यापक आर्थिक क्षति होती है। कठोर परिश्रम के बावजूद किसानों को कृषि उत्पादों का समुचित मूल्य नहीं मिल पाता है। लक्ष्यविहीन, लचर और उदासीन सरकारी व्यवस्था के कारण दिन-प्रतिदिन खेती घाटे का सौदा होती जा रही है। किसान खेती करना छोड़ अन्य रोजगार तलाश रहे हैं।

खाद्य पदार्थों की मांग और आपूर्ति के बढ़ते अंतराल के कारण मुनाफाखोर व्यापारी चावल-दाल से लेकर दूध, दही, घी, मक्खन, फल, सब्जियां आदि में बड़े पैमाने पर अपमिश्रण कर रहे हैं। मिलावटी, अधोमानक, मिथ्याछाप, रासायनिक पदार्थों, एसेंस, रंगों आदि से निर्मित खाद्य पदार्थों के रूप में मीठा जहर परोस कर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। खाद्य उत्पादों में जहर घोलने का काम कृषकों के स्तर से आरंभ होकर अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने में प्रत्येक चरण पर हो रहा है। किसान फसल की अधिक पैदावार के चक्कर में बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। इससे कृषि उत्पाद में पोषण की जगह हानिकार रासायनिक तत्त्व प्रविष्ट कर जाते हैं। खाद्य पदार्थों के प्रसंस्करण और संरक्षण के लिए भी रासायनिक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। यही नहीं, मांग और आपूर्ति के बड़े अंतराल का लाभ उठाने के लिए मुनाफाखोर व्यापारी खाद्य उत्पादों में कृत्रिम, रासायनिक, मिलावटी, अधोमानक और मिथ्याछाप उत्पाद भी मिला देते हैं। विकास की अंधी दौड़ में आधुनिकता के चक्कर में पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर बड़े पैमाने पर आमजन की जीवन शैली और दिनचर्या बदल रही है। स्वास्थ्य के बजाय स्वाद पर बल दिया जा रहा है। पारंपरिक और प्राकृतिक खानपान की जगह पाश्चात्य संस्कृति आधारित व्यंजन का प्रचलन तेजी बढ़ रहा है। बाजारों में भारतीय व्यंजन के बजाय ‘जंक फूड’ और ‘फास्ट फूड’ में फैशन के नाम पर जहर बेचा जा रहा है। जागरूकता के अभाव में लोग बड़े पैमाने पर इनका सेवन कर रहे हैं। ‘जंक फूड’ और ‘फास्ट फूड’ में ट्रांसफैट, सुगर, टेस्टमेकर, सोडियम और सीसा सहित कई खतरनाक रसायनों का बड़े पैमाने पर उपयोग कर ‘टेस्टी’ तो बनाया गया है, लेकिन ‘हेल्दी’ नहीं। इनमें प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स का अभाव होता है। इनमें ट्रांसफैट और सुगर अधिक मात्रा में होती है। इससे मोटापा, शुगर, ब्लडप्रेशर, कैंसर, किडनी, कब्ज, लीवर संबंधी अनेक बीमारियां हो रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक साठ से सत्तर प्रतिशत बीमारियां मनुष्य की अनियमित दिनचर्या, असंतुलित और असुरक्षित खानपान के कारण हो रही हैं।

अंधी विकास की दौड़ में तेजी से भागती दुनिया ‘रेडी-टु-ईट’ भोजन की ओर आकर्षित हो रही है। मल्टीनेशनल कंपनियां युवाओं को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने के लिए नामी हस्तियों का सहारा लेकर विज्ञापन कर रही हैं। आम आदमी भोजन पकाने की झंझट और परिश्रम से बचने के लिए बाजार में उपलब्ध डिब्बाबंद खाद्य और पेय पदार्थों का उपयोग बड़े पैमाने पर कर रहा है, जबकि इन खाद्य पदार्थों में मानक के अनुरूप गुणवत्ता नहीं पाई जाती। डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। आज तो दूध, दही, घी, मक्खन, छाछ, क्रीम आदि समस्त दुग्ध पदार्थ डिब्बाबंद मिल जाते हैं। दूध में पानी की मिलावट की जाती थी, पर अब तो मिल्क पाउडर, स्टार्च, रिफाइंड, डिटर्जेंट, यूरिया आदि मिश्रित कर सिंथेटिक दूध बना देते हैं। दूध, पनीर और खोए से प्राकृतिक वसा निकाल कर कृत्रिम वनस्पति तेल या वसा मिला दिया जा रहा है। इतना ही नहीं, पशुपालक गाय-भैंस से आसानी से दूध निकालने के लिए आक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगाते हैं, जो दूध में में भी मिल जाता है। दुग्ध विक्रेता दूध को लंबे समय तक संरक्षित रखने के लिए हाइड्रो या फार्मलीन का प्रयोग कर रहे हैं, जो मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को दुष्प्रभावित करता है। दुर्भाग्य से आज दूध के नाम पर जहर का कारोबार हो रहा है।

फल और सब्जियों में विटामिन, कैल्शियम, मिनरल्स, आयरन और एंटीआॅक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर के सर्वांगीण विकास और बीमारियों से बचने के लिए प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण करते हैं, पर बढ़ती मांग को देखते हुए फल और सब्जियों की ज्यादा पैदावार के लिए रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। यह फल और सब्जियों के पोषक तत्त्वों को कम कर देता है। फल और सब्जियों को लंबे समय तक संरक्षित रखने, फलों को कृत्रिम ढंग से पकाने के लिए भी रसायनों का प्रयोग हो रहा है। खराब सब्जियों और फलों को ताजा और आकर्षक बनाने के लिए रासायनिक रंगों से रंगा जा रहा है। इससे इनकी प्राकृतिक संरचना में परिवर्तन हो जाता है और ये शारीरिक पोषण के बजाय क्षरण का कारक बन जाते हैं। इनके माध्यम से रासायनिक तत्त्व मनुष्य के शरीर में पहुंच कर अनेक बीमारियों को जन्म देते हैं। युवा पीढ़ी प्राकृतिक पर्यावरण से दूर होता जा रहा है। आज आमजन येन-केन प्रकारेण धन अर्जन और पाश्चात्य संस्कृति आधारित सुख-सुविधा के चक्कर में आलसी और सुविधाभोगी होता जा रहा है। वह न तो समुचित शारीरिक व्यायाम कर रहा है और न ही संतुलित और सुरक्षित भोजन ले पा रहा है। इससे अस्पतालों में मरीजों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। मनुष्य के शारीरिक