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राजनीति: कैसे मिटे वर्दी का दाग

आज वैश्विक स्तर पर पुलिस सुधार के कई नए आयाम गढ़ते जा रहे हैं, जिनमें कम्युनिटी पुलिसिंग भी शामिल है। किंतु भारत में अभी पुलिस सुधार बुनियादी स्तर पर भी लागू नहीं हो सका है। कुछ सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो पुलिस व्यवस्था की एक बदरंग तस्वीर देखने को मिलेगी। मसलन, राज्यों के पुलिस बल में अभी भी करीब चौबीस फीसद पद खाली पड़े हैं। राज्यों के पुलिस विभाग में हथियारों की भारी कमी है।

Author October 11, 2018 3:10 AM
पुलिस का दुर्व्यवहार और शक्तियों का दुरुपयोग रोकने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया कि राज्य और जिला स्तरों पर पुलिस शिकायत अथॉरिटी का गठन किया जाए।

लखनऊ में पिछले दिनों एक पुलिसकर्मी के हाथों एक आइटी कंपनी के एरिया मैनेजर की हत्या की घटना ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया है। इस घटना से कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पहला सवाल तो यही कि देश के राज्यों में पुलिस व्यवस्था इतनी असंवेदनशील और अमानवीय क्यों है? दूसरा, क्या यह घटना पुलिस सुधार की बुनियादी आवश्यकता पर जोर नहीं देती? तीसरा, क्या उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इस तरह के कृत्यों को पुलिस बर्बरता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए? बहरहाल, जो मामला सामने है उसमें पुलिस द्वारा किए गए कृत्य की चौतरफा आलोचना हुई है। निश्चित तौर पर यह घटना पुलिस प्रशासन की संवेदनहीनता और अमानवीय चेहरा पेश करने वाली है। ऐसी तमाम घटनाएं हैं जो पुलिस की वर्दी पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। इसके बावजूद इस दिशा में कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए। पुलिस संस्कृति अकेले उत्तर प्रदेश की समस्या नहीं है। राजधानी दिल्ली सहित देश के विभिन्न राज्यों में अक्सर इस तरह की घटनाएं देखने-सुनने में आती रहती हैं। कई बार इस तरह की घटनाओं को पुलिस पर बढ़ते काम के बोझ और चौबीस घंटे ड्यूटी का नतीजा बता कर रफा-दफा करने का प्रयास किया जाता है। किंतु यहां बुनियादी सवाल यह है कि पुलिस की इस समस्या खमियाजा आम जनता क्यों भुगते? क्या यह राज्य सरकार का दायित्व नहीं है कि वह पुलिस व्यवस्था को मानवीय मूल्यों और मानवाधिकार के दायरे में रखे? यह सत्य है कि आज देश के लगभग सभी राज्यों में पुलिस पर कार्य का अत्यधिक बोझ है और उसे बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा है। पुलिसकर्मियों के वेतन और अवकाश भी दूसरे सरकारी कर्मचारियों की तरह नहीं हैं। इसलिए उनमें तनाव, कुंठा या अन्य मनोविकार पैदा होना स्वाभाविक है और इन विकृतियों की परिणति अमानवीय कृत्यों के रूप में परिलक्षित होती है।

एक संवेदनशील और लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था का निर्माण तभी संभव है जब हम पुलिस सुधार को इस रूप में ही लागू करें। यहां सवाल यह भी है कि एक औपनिवेशिक मानसिकता से रची-बसी पुलिस व्यवस्था में कैसे नवीन लोकतांत्रिक और संवेदनशील गुण समाहित किए जाएं। इस दिशा में वर्ष 1977-81 में बने पुलिस आयोग की सिफारिशें महत्त्वपूर्ण थीं। इन्हें लागू कराने को लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने 1996 में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। इस याचिका में कहा गया कि पुलिस अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करती है। इसमें पुलिस पर कानून का पालन नहीं करने, ताकतवर लोगों के पक्ष में काम करने, गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने और यातना देने जैसे आरोप लगाए गए थे। याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से याचना की गई थी कि अदालत विशेषज्ञ समितियों के सुझावों को लागू करने के निर्देश जारी करे। इस याचिका पर फैसला देने में करीब दस साल लग गए तब वर्ष 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्यों को निर्देश जारी किया। इसमें कहा गया कि प्रत्येक राज्य में एक राज्य सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए जो पुलिस के कामकाज के लिए नीति निर्धारण और पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के साथ ही यह भी देखेगा कि राज्य सरकार पुलिस को अनुचित तरीके से प्रभावित नहीं करे। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश में यह भी कहा गया था कि प्रत्येक राज्य में एक पुलिस इस्टेब्लिशमेंट बोर्ड (पीइबी) का गठन किया जाए, जो डीएसपी रैंक से नीचे के अधिकारियों के तबादले, तैनाती और पदोन्नति का निर्धारण करे और उच्च अधिकारियों के लिए राज्य सरकार को सुझाव दे। पुलिस का दुर्व्यवहार और शक्तियों का दुरुपयोग रोकने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया कि राज्य और जिला स्तरों पर पुलिस शिकायत अथॉरिटी का गठन किया जाए। निर्देश में साफ कहा गया था कि राज्य बलों में पुलिस महानिदेशक और दूसरे मुख्य पुलिस अधिकारियों और केंद्रीय बलों के प्रमुखों के लिए न्यूनतम दो वर्ष की कार्य अवधि निर्धारित की जाए, ताकि उन्हें मनमाने तबादले और तैनाती से बचाया जा सके।

शीर्ष अदालत ने केंद्रीय बलों के प्रमुखों के चयन के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन को भी कहा था। इसके अलावा कानून-व्यवस्था बहाल करने वाली पुलिस से जांच करने वाली पुलिस को अलग करने की भी बात कही गई थी ताकि त्वरित, बेहतर और जनता के साथ अच्छे संबंध सुनिश्चित किए जा सकें। अब तक सिर्फ दो राज्यों को छोड़ कर बाकी सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पुलिस इस्टेब्लिशमेंट बोर्ड का गठन कर चुके हैं। जम्मू-कश्मीर और ओड़िशा को छोड़ कर सभी राज्यों में राज्य सुरक्षा आयोग बना लिए गए हैं। हालांकि देखा जाए तो पुलिस इस्टेब्लिशमेंट बोर्ड और राज्य सुरक्षा आयोग का संगठन और शक्तियां सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों से भिन्न हैं। उदाहरण के लिए बिहार, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में राज्य सुरक्षा आयोग में सरकारी और पुलिस अधिकारियों का प्रभुत्व है। साथ ही, इसमें कई आयोगों के पास बाध्यकारी निर्देश जारी करने की शक्तियां भी नहीं हैं। दूसरी तरफ अभी भी पुलिस शिकायत अथॉरिटी का गठन अधिकतर राज्यों में नहीं किया गया है।

केंद्र सरकार ने पुलिस सुधार की दिशा में एक कदम नए मॉडल पुलिस कानून के रूप में बढ़ाया। वर्ष 2005 में सोली सोराबजी की अध्यक्षता में पुलिस एक्ट ड्राफ्टिंग कमेटी बनाई गई थी। इसका उद्देश्य 1861 के पुलिस एक्ट की जगह नया कानून बनाना था। वर्ष 2006 में कमेटी ने मॉडल पुलिस एक्ट सौंपा, जिसे सभी राज्यों को जारी किया गया। कुल सत्रह राज्यों असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखंड ने इस नए मॉडल पुलिस कानून के मद्देनजर नए कानून पारित किए या मौजूदा कानून में ही जरूरी संशोधन कर लिए। इस पुलिस मॉडल एक्ट में व्यापक बदलाव किए गए थे, जिसमें संगठन, भर्ती, जिम्मेदारियां, जवाबदेही और सेवा शर्तों में सुधार शामिल थे। इसमें राज्य पुलिस सेवा बनाने की बात कही गई थी जिसके द्वारा डीएसपी से नीचे के सभी अधिकारियों की भर्ती करनी थी। पुलिस पर बढ़ते काम के बोझ को देखते हुए इस मॉडल पुलिस कानून में यह प्रावधान किया गया था कि राज्य सरकार को सुनिश्चित करना है कि एक पुलिस अधिकारी की ड्यूटी औसतन आठ घंटे से अधिक न हो। अपवाद की स्थिति में यह बारह घंटे हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि यह मॉडल पुलिस कानून भी अब तक लागू नहीं हो पाया है।

आज वैश्विक स्तर पर पुलिस सुधार के कई नए आयाम गढ़ते जा रहे हैं, जिसमें कम्युनिटी पुलिसिंग भी शामिल है। किंतु भारत में अभी पुलिस सुधार बुनियादी स्तर पर भी लागू नहीं हो सका है। कुछ सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो पुलिस व्यवस्था की एक बदरंग तस्वीर देखने को मिलेगी। मसलन राज्यों के पुलिस बल में अभी भी करीब चौबीस फीसद पद खाली पड़े हैं। राज्यों के पुलिस विभाग में हथियारों की भारी कमी है। राजस्थान और पश्चिम बंगाल का यदि उदाहरण देखें तो वहां अपेक्षित हथियारों में क्रमश: पिचहत्तर फीसद और इकहत्तर फीसद की कमी है। इसके साथ-साथ स्वाभाविक तौर पर अपराध में भारी बढ़ोतरी हुई है। समग्र रूप से यदि पुलिस व्यवस्था और पुलिस व्यवहार को देखें तो इसके मूल में कई कारण नजर आते हैं। पहला कारण तो यह कि पुलिस व्यवस्था को जनोन्मुख बनाने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ। दूसरा, औपनिवेशिक काल के बाद से पुलिस सुधार की दिशा में कोई कारगर और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। तीसरा, पुलिस बलों में पर्याप्त और अपेक्षित कौशल और प्रशिक्षण की कमी रही है। इन कारणों से आज हम पुलिस को विभिन्न नकारात्मक विशेषणों से नवाजने को मजबूर होते हैं। पुलिस व्यवस्था को सुधारने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, जो नजर नहीं आती।

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