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राजनीति: सितारों पर जीवन की आस

वैज्ञानिकों को विश्वास है कि वे अंतरिक्ष में एक न एक दिन जीवन की खोज जरूर कर लेंगे। हो सकता है कि पृथ्वी जैसी ही सभ्यताएं मिल जाएं। अभी हम बहुत कम ग्रहों तक ही पहुंच सके हैं। जिन ग्रहों तक हम पहुंचे हैं, वे पृथ्वी से ज्यादा पुराने नहीं हैं। इसलिए हो सकता है कि भविष्य में हम ऐसे ग्रहों तक पहुंच जाएं जो हमसे ज्यादा पुराने हों, जहां हमारी सभ्यता से भी अधिक विकसित सभ्यताएं मौजूद हों।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

क्या हम अंतरिक्ष में अकेले हैं? अंतरिक्ष और खगोल विज्ञानियों के लिए इससे बड़ा कोई और सवाल आज नहीं है। सदियों से वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब खोज रहे हैं। लेकिन आसमान के उस पार उन्हें जीवन नहीं मिला। आज भी जीवन की संभावना वाले ग्रहों की संख्या का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। ऐसा अनुमान है कि हमारी आकाशगंगा में ही दस हजार से लेकर दस करोड़ तक परग्रही सभ्यताएं हो सकती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि जीवन उन ग्रहों पर मुमकिन है जो धरती से खास दूरी पर हैं। जीवन की संभावना वाले इस जोन को गोल्डीलॉक जोन कहा जाता है। नासा के कैपलर मिशन ने हमारे सौर मंडल के बाहर अब तक ऐसे दो सौ सोलह ग्रह खोजे हैं जो गोल्डीलॉक जोन में आते हैं। मंगल ग्रह पर 2012 में उतरे नासा के खोजी रोबोट क्यूरियोसिटी को चट्टानों में तीन अरब साल पुराने कार्बनिक अणु मिले थे। यह खोज इशारा करती है कि उस समय इस ग्रह पर जीवन रहा होगा। फिर भी इससे इस बात की पुष्टि नहीं होती कि अणुओं का जन्म कैसे हुआ। नासा ने कहा है कि इस प्रकार के कण मंगल ग्रह पर काल्पनिक सूक्ष्मजैविकी के खाद्य स्रोत भी हो सकते हैं। मंगल ग्रह पर पाए गए ये कार्बनिक अणु जीवन के विशिष्ट प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि वे ‘गैर-जैविक’ चीजों के भी हो सकते हैं। दरअसल, हम जिस जीवन के बारे में जानते हैं, वह कार्बनिक अणुओं पर आधारित है। ऐसे प्रमाण अभी किसी अन्य ग्रह पर नहीं मिले हैं। हालांकि मंगल की वर्तमान सतह पर जीवन नहीं पनप सकता है। लेकिन संभवत: पहले कभी मंगल ग्रह की जमीन पर पानी मौजूद था।

यूरोपीय स्पेस मिशन के वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना को तलाशने के लिए ‘द ट्रेस गैस आॅर्बिटर स्पेसक्राफ्ट’ 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर उतारा था। वैज्ञानिकों के इस खास मिशन पर निकलने का कारण मंगल ग्रह पर कुछ इलाकों में मीथेन गैस और पानी काफी मात्रा मिलना भी बताया जा रहा है। 2014 में नासा को मंगल ग्रह के वायुमंडल में मीथेन गैस होने का प्रमाण मिला था। वैज्ञानिकों का मानना है कि मीथेन गैस की मौजूदगी का कारण जैविक और भूगर्भीय गतिविधि भी हो सकता है। मंगल ग्रह पर कुछ इलाकों में मीथेन गैस और पानी काफी मात्रा में मिलने से इसे जीवन का संकेत माना जा सकता है। पानी तो जीवन के लिए आवश्यक है ही और मीथेन गैस भी जैविक क्रियाओं के लिए आवश्यक है। मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं को लेकर कई तरह के वैज्ञानिक विचार सामने आए हैं। कुछ समय पहले ही नासा को पहली बार मंगल ग्रह पर विशाल भूमिगत झील होने का संकेत मिला है। इससे वहां अधिक पानी और यहां तक कि जीवन की उपस्थिति की संभावना और बढ़ गई है। अमेरिकी जर्नल ‘साइंस’ में प्रकाशित अध्ययन में अनुसंधानकर्ताओं ने कहा है कि मार्सियन हिम खंड के नीचे स्थित झील बीस किलोमीटर चौड़ी है। यह मंगल ग्रह पर पाया गया अब तक का सबसे बड़ा जल स्रोत है।

विज्ञान पत्रिका ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि पृथ्वी पर अधिकांश फास्फोरस बाहरी अंतरिक्ष में उत्पन्न हुआ था और उल्कापिंडों और धूमकेतुओं के माध्यम से पृथ्वी पर पहुंचा था। जीवन के लिए जरूरी रासायनिक तत्त्वों में से एक फास्फोरस है। लेकिन ताजा शोध से पता चलता है कि ब्रह्मांड में इसकी मात्रा कम हो रही है। यह अंतरिक्ष में जीवन खोजने की उम्मीद के लिए बुरी खबर कही जा सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवों के विकास में फास्फोरस का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अंतरिक्ष में फास्फोरस की मौजूदगी से ही अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावनाएं दिखती हैं। फास्फोरस यौगिक एडेनोसाइन ट्राइफास्फेट, या एटीपी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। यह ऊर्जा को संग्रहीत और स्थानांतरित करता है। अगर अंतरिक्ष में फास्फोरस की कमी हुई तो इसका असर धरती पर भी होगा। इस नए अध्ययन के लिए, शोधकर्ताओं ने कैनरी द्वीपों में विलियम हर्शेल टेलीस्कोप से जांच की और क्रैब नेबुला में फास्फोरस और लौह द्वारा उत्पादित इन्फ्रारेड प्रकाश को मापा, जो सुपरनोवा के बचे हुए भाग थे। ये पृथ्वी से लगभग साढ़े छह हजार प्रकाश वर्ष दूर हैं। इसके पहले सुपरनोवा अवशेष से ली गई रीडिंग की तुलना में वैज्ञानिकों ने क्रैब नेबुला में बहुत कम फास्फोरस पाया था। यदि सुपरनोवा द्वारा अंतरिक्ष में फास्फोरस को अवशोषित कर लिया जा रहा है तो इसका मतलब है कि अन्य ग्रहों पर जीवन पनपने की संभावना क्षीण हो जाएगी। ऐसे में अंतरिक्ष में मानव के जीवित रहने की संभावना भी कम हो जाएगी। यदि फास्फोरस का स्रोत सुपरनोवा है और यह उल्कापिंड चट्टानों द्वारा अंतरिक्ष में फैला है तो ऐसे में फास्फोरस की खोज में अंतरिक्ष जीव जीवन की तलाश में बाहर आ सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को जीवन तलाशने में बहुत आसानी होगी।

हमारे शरीर में कई खनिज लवण पाए जाते हैं, जिनमें से फास्फोरस भी एक खनिज है। शरीर के विकास के लिए अन्य तत्त्वों और खनिज लवणों की तरह फास्फोरस की भी अत्यंत आवश्यकता होती है। शरीर के कुल भार का एक फीसद भाग फास्फोरस होता है। यह शरीर की सभी कोशिकाओं में उपस्थित रहता है और कोशिकाओं के केंद्र में रह कर यह इनके विभाजन में सहायक होता है। मानव जीवन के लिए फास्फोरस कितना महत्त्वपूर्ण है, इसका अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि हम व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में करते हैं। ऐसा क्यों? इसका कुछ वैज्ञानिक कारण है। दरअसल, वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार गंगा जल से कई मील तक भूमि की सिंचाई की जाती है जिससे गंगा जल की उपजाऊ क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। किंतु इसमें अस्थियों के विसर्जन से फास्फोरस युक्त खाद सदा बनी रहती है, क्योंकि अस्थियों में फास्फोरस की मात्रा अधिक होती है। दांतों और हड्डियों के निर्माण में फास्फोरस का अस्सी फीसद भाग कैल्शियम के साथ मिल कर कैल्शियम फास्फेट बनाता है। कैल्शियम फास्फेट ही हड्डियों और दांतों के निर्माण में काम आता है। ब्रह्मांड में फास्फोरस अपेक्षाकृत दुर्लभ तत्त्व है। लेकिन जीवन के लिए जरूरी छह तत्त्वों में से एक है जिस पर जीवविज्ञानी निर्भर रहते हैं। अन्य जरूरी तत्त्वों में कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आॅक्सीजन और सल्फर हैं। अंतरिक्ष में अभी भी जीवन होने की अनंत संभावना है। यह जरूरी है कि जीवन की खोज जारी रहे। हाल में नासा के न्यू होराइजन अभियान के तहत उसका अंतरिक्ष यान सबसे दूर, कुईपर बेल्ट में स्थित एक पिंड अल्टिमा थुले तक पहुंचने की तैयारी में है। संभवत यह एक जनवरी, 2019 को इस पिंड तक पहुंचने में कामयाब हो सकता है। यह अभियान अंतरिक्ष यान के सबसे दूर स्थित पिंड तक पहुंचने का रेकार्ड बनाएगा। इस वक्त यह यान इसी पिंड की ओर बढ़ रहा है। यह इतिहास में सबसे दूर स्थित दुनिया की खोज है जो प्लूटो से एक अरब मील से भी अधिक दूर है। अल्टिमा थुले धरती से 6.6 अरब किलोमीटर दूर है। दुनिया ही नहीं, ब्रह्मांड के इतिहास में भी यह पहला मौका होगा जब धरती का कोई यान इतनी दूर पहुंचेगा और वह भी जीवन की खोज में। इसीलिए वैज्ञानिकों को विश्वास है कि वे अंतरिक्ष में एक न एक दिन जीवन की खोज जरूर कर लेंगे। हो सकता है कि पृथ्वी जैसी ही सभ्यताएं मिल जाएं। अभी हम बहुत कम ग्रहों तक ही पहुंच सके हैं। जिन ग्रहों तक हम पहुंचे हैं, वे पृथ्वी से ज्यादा पुराने नहीं हैं। इसलिए हो सकता है कि भविष्य में हम ऐसे ग्रहों तक पहुंच जाएं जो हमसे ज्यादा पुराने हों जहां हमारी सभ्यता से भी अधिक विकसित सभ्यताएं मौजूद हों।

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