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राजनीति: अनुच्छेद 35-ए : भ्रम और निदान

यह आश्चर्य की बात है कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान के अनुसार पूरे भारत का अटूट अंग है, परंतु वहां रहने वाले भारतीय नागरिक आज भी मानवाधिकारों से वंचित हैं, जो पूरे भारत के नागरिकों को हासिल हैं। इसकी बहुत बड़ी वजह यह है कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार के अध्याय को लागू नहीं किया गया और इसका कारण था कि सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सरकार जब चाहे जनसुरक्षा कानून के तहत जानवरों की तरह जेलों में बंद कर सकती है।

Author September 8, 2018 1:58 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

भीमसिंह

यह दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुखद ऐतिहासिक घटना है, जिसके कारण जम्मू-कश्मीर आज भी भारतीय संविधान के साथ जुड़ नहीं पाया है। भारतीय संविधान का निर्माण भारत की संविधान सभा ने 1949 में संपन्न किया था और 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान को लागू कर दिया था। संविधान में सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय था, अध्याय-3 जिसमें अनुच्छेद 12 से 35 तक मानवाधिकारों का उल्लेख है। ये मानवाधिकार सभी भारतीय नागरिकों के अलावा कुछ गैर-नागरिकों को भी दिए गए थे, जैसे अनुच्छेद 21, जो मानवाधिकार अध्याय-3 में दर्ज है। इसके अनुसार जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भारत वर्ष में रह रहे सभी लोगों को प्राप्त है, चाहे वे नागरिक हों या भारत में रह रहे हों। त्रासदी यह रही कि अध्याय-3 को जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं किया गया, बल्कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के प्रश्न को संविधान के अनुच्छेद 370 को अस्थायी रूप से डाल कर एक भयंकर गलती की गई। इसके लिए कौन जिम्मेदार है, कौन कसूवार है, इस वक्त इस बारे में विचार-विमर्श करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इतिहास के पन्नों को पलटने और उन पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

दूसरी गलती भारत सरकार ने 1954 में की, जब जम्मू-कश्मीर के लिए वहां के नागरिकों के मानवाधिकारों, जो भारतीय संविधान में सुनिश्चित थे, पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। 14 मई, 1954 को शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की हिरासत का औचित्य सिद्ध करने के लिए भारतीय संविधान के अध्याय-3 में अनुच्छेद 35 के साथ ‘ए’ जोड़ दिया गया। अध्याय-3 के अनुच्छेद 12 से 35 तक को समझने की जरूरत है, जिसमें भारतीय संविधान में दिए गए सभी मानवाधिकार शामिल हैं। ये मानवाधिकार भारत के सभी नागरिकों को प्राप्त थे, इनमें जम्मू-कश्मीर में रहने वाले सभी नागरिक भी शामिल थे। इस मानवाधिकार के अध्याय को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35-ए ने किस तरह रौंद डाला, इसका उल्लेख मैं सभी नागरिकों, भारतवासियों और जम्मू-कश्मीर में रहने वाले नागरिकों से करना चाहूंगा कि जो भारतीय संविधान के अनुसार भारतीय नागरिक हैं और उनमें मैं भी शामिल हूं। इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना यह हुई थी कि जब 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ तो भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर राज्य को शामिल नहीं किया गया, बल्कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के पद को भी नहीं छेड़ा गया, क्योंकि महाराजा हरिसिंह 1949 में स्वेच्छा से जम्मू-कश्मीर छोड़ कर बंबई चले गए थे। 26 जनवरी, 1950 जिस दिन भारत का संविधान लागू किया गया, उस दिन भी जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ही अस्थायी शासक थे। उनकी अनुपस्थिति के बहाने उनके बेटे युवराज कर्णसिंह को जम्मू-कश्मीर का राजप्रमुख (सदर-ए-रियासत) नियुक्त किया गया। सबसे दुखदायी घटना यह थी कि महाराजा हरिसिंह के ऐतिहासिक विलयपत्र के अनुसार महाराजा को तीन विषयों रक्षा, विदेश और संचार इत्यादि के अधिकार विलयपत्र को स्वीकार करते हुए भी संसद को नहीं सौंपे गए, यानी भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़कर इन विषयों पर भी भारतीय संसद को कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया गया। ये विषय महाराजा हरिसिंह ने भारतीय संसद को सौंप दिए थे, जैसे बाकी पांच सौ पचहत्तर रियासतों ने भारत के सौंपे थे। उन रियासतों के शासकों ने बाद में भारत संघ में विलय कर दिया था, परंतु जम्मू-कश्मीर के बारे में कोई भी निर्णय भारतीय संसद आज तक नहीं कर सकी। यहां इस बात का उल्लेख करना भी आवश्यक है कि दो रियासतों- हैदराबाद और जूनागढ़, जिन्हें भारत संघ में 26 जनवरी, 1950 में शामिल किया गया था, के शासकों ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। एक बहुत बड़ा प्रश्न यह है कि भारतीय संसद ने जम्मू-कश्मीर में राजशाही को क्यों नहीं हटाया था, जबकि वहां के महाराजा और लोकप्रिय नेतृत्व ने जम्मू-कश्मीर की विलय प्रक्रिया को पूरा समर्थन किया था। इस प्रश्न का उत्तर भी एक दिन भारत के इतिहासकारों को देना होगा।

26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर में जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हुआ, जिसमें भारतीय संविधान के अध्याय-3 में दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लेख तक नहीं है। आज भी जम्मू-कश्मीर के संविधान में भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का कोई उल्लेख नहीं है। उच्चतम न्यायालय का योगदान है कि भारतीय संविधान में दिए गए कई मानवाधिकार जम्मू-कश्मीर में रहने वाले भारतीय नागरिकों को भी उपलब्ध हैं। यह आश्चर्य की बात है कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान के अनुसार पूरे भारत का अटूट अंग है, परंतु वहां रहने वाले भारतीय नागरिक आज भी मानवाधिकारों से वंचित हैं, जो पूरे भारत के नागरिकों को हासिल हैं। इसकी बहुत बड़ी वजह यह है कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार के अध्याय को लागू नहीं किया गया और इसका कारण था कि सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सरकार जब चाहे, जनसुरक्षा कानून के तहत जानवरों की तरह जेलों में बंद कर सकती है। इसका उल्लेख भी आवश्यक है कि 1954 में शेख अब्दुल्ला के ब्रिटेन से आए हुए वकील डिंगल फुट ने जम्मू की एक अदालत में यह प्रश्न उठाया था कि शेख अब्दुल्ला को तीन महीने से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह गारंटी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 इत्यादि में दी गई है। तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद को असीमित शक्ति और अधिकार देने के लिए अनुच्छेद 35-ए को जन्म दिया गया, जिसके कारण भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार को असीमित अधिकार दे दिया, जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर सरकार को अपना जनसुरक्षा कानून बनाने का अधिकार मिल गया। आज भी जम्मू-कश्मीर में जनसुरक्षा कानून 1978 लागू है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति / राजनीतिक कार्यकर्ता को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखा जा सकता है, इनमें आज भी सैकड़ों लोग जम्मू-कश्मीर से राज्य की जेलों में ही नहीं, बल्कि पूरे देश की जेलों में बंद हैं।

आज का इतिहास इस बात पर जोर दे रहा है कि जम्मू-कश्मीर के ही नहीं पूरे भारतवर्ष के लोग विशेषकर यहां के सांसदों को इस बात को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि इस अन्याय से भरे हुए अनुच्छेद 35-ए में दर्ज कानून को जम्मू-कश्मीर के भूतपूर्व शासक क्यों समर्थन दे रहे हैं। इसका उत्तर मेरे पास है कि ऐसे ही जनविरोधी कानून का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर के हजारों नौजवानों, राजनीतिक कार्यकर्ता इत्यादि को जेलों में रखा गया। आश्चर्य की बात यह है कि आज जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35-ए के विरुद्ध युद्ध कौन कर रहा है नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और बाकी वे लोग, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों पर रोक लगा रखी थी और आज भी यही सोच रहे हैं कि कल ऐसा न हो कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को विशेषकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मानवाधिकार प्राप्त हो जाएं, जिसका आश्वासन भारतीय संविधान के अध्याय-3 में दर्ज अनुच्छेद 12 से 35 में है। भारतीय संविधान के अध्याय-3 को अनुच्छेद 370 के किसी भी दायरे में नहीं रखा गया है। अनुच्छेद 370 का विषय क्या है और अनुच्छेद 370 संसद से लेकर राष्ट्रपति तक हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देता। अनुच्छेद 35-ए को राष्ट्रपति छह महीने तक संविधान के अनुसार लागू कर सकते थे और यह संशोधन सिर्फ छह महीने तक ही लागू रह सकता था, यानी 1955 से अनुच्छेद 35-ए भारतीय संविधान में असंवैधानिक चल रहा है। जम्मू-कश्मीर में भी वहां के लोगों को भारतीय संिधान में दिए गए सभी मानवाधिकार उसी तरह प्राप्त हैं, जिस तरह देश के बाकी नागरिकों को। जहां तक जम्मू-कश्मीर ‘स्टेट सब्जेक्ट’ के विषय का संबंध है, यह कानून महाराजा हरिसिंह ने 1927 में लागू किया था, जिसे भारतीय संविधान ने स्वीकार किया है।
(लेखक नेशनल पैंथर्स पार्टी के मुख्य संरक्षक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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