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राजनीति: नशे की गिरफ्त में कामकाजी महिलाएं

सत्तर फीसद छात्र और अस्सी फीसद छात्राएं पंद्रह साल से कम उम्र में ही नशीले उत्पादों मसलन- पान मसाला, सिगरेट, बीड़ी और खैनी का सेवन शुरू कर देते हैं। एक जमाने में ग्रामीण इलाकों में महिलाओं द्वारा बीड़ी सेवन का मामला सुनने को मिलता था। लेकिन अब तो मॉल, सिनेमा हॉल, बस स्टैंड, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के आसपास विशेष तौर पर महानगरों में होठों में सिगरेट दबाए लड़के-लड़कियां अक्सर दिख जाते हैं। सच कहें तो धूम्रपान अब उनके लिए फैशन बन चुका है।

Author April 3, 2018 3:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

रीता सिंह

देश के महानगरों में युवा कामकाजी महिलाओं में धूम्रपान की लत तेजी से बढ़ रही है। यह चौंकाने वाला तथ्य हाल में पहले एसोचैम के एक सर्वेक्षण में सामने आया है। सर्वे देश के दस शहरों- अमदाबाद, बंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, पुणे और लखनऊ की बाईस से तीस साल के बीच की दो हजार महिलाओं से बातचीत पर आधारित है। इसके मुताबिक युवा महिलाओं ने स्वीकार किया है कि वे कामकाज के भारी बोझ के तनाव को दूर करने के लिए या फिर मित्र-संबंधियों के आग्रह पर धूम्रपान करती हैं। दो फीसद महिलाओं ने बेहिचक स्वीकार किया है कि वे दिन में एक पैकेट या इससे भी ज्यादा सिगरेट पी लेती हैं। वहीं कुछ महिलाओं ने अपना वजन कम रखने यानी छरहरा दिखने के लिए सिगरेट पीने की बात स्वीकारी है। चालीस फीसद महिलाओं ने बताया कि वे दिन में दो-तीन बार सिगरेट का सेवन करती हैं। इसके अलावा भी महिलाओं द्वारा सिगरेट इस्तेमाल के कई कारण गिनाए गए हैं। महिलाओं में धूम्रपान की बढ़ती लत का यह कोई पहला खुलासा नहीं है। पिछले महीने ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (गेट्स) 2016-17 की एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ था कि उत्तर प्रदेश की हर छठी महिला धूम्रपान की आदी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चकाचौंध भरा परिवेश ही युवतियों और महिलाओं को धूम्रपान की ओर आकर्षित कर रहा है। यह खुलासा केंद्रीय परिवार कल्याण विभाग, विश्व स्वास्थ्य संगठन और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज मुंबई की एक साझा रिपोर्ट से हुआ है जिसमें देश भर से कुल चौहत्तर हजार लोगों को और उत्तर प्रदेश से एक हजार छह सौ पिचासी पुरुषों और एक हजार सात सौ उनयासी महिलाओं को शामिल किया गया। इस रिपोर्ट पर गौर करें तो वर्ष 2009-10 में हुए सर्वे के मुताबिक अन्य राज्यों की अपेक्षा धूम्रपान करने वालों की संख्या उत्तर प्रदेश में बढ़ी है। इसमें तंबाकूजनित उत्पादों को प्रयोग करने वाले पुरुषों का औसत 52.1 फीसद है और महिलाओं का औसत 17.7 फीसद है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई महिलाएं मसलन मजदूरी करने वाली भी गुटखा, खैनी और बीड़ी का सेवन कर रही हैं, वहीं कई शौकिया सिगरेट पीने और गुटखा खाना शुरू करने के बाद अब इनकी आदी हो चुकी हैं।

महिलाओं में धूम्रपान की लत के लिए बचपन में आसपास का माहौल एक प्रमुख कारक है। याद होगा पिछले साल भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने इस बात का खुलासा किया था कि देश में 11.2 फीसद छात्र-छात्राएं तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें सत्तर फीसद छात्र और अस्सी फीसद छात्राएं पंद्रह साल से कम उम्र में ही नशीले उत्पादों मसलन- पान मसाला, सिगरेट, बीड़ी और खैनी का सेवन शुरू कर देते हैं। एक जमाने में ग्रामीण इलाकों में महिलाओं द्वारा बीड़ी सेवन का मामला सुनने को मिलता था। लेकिन अब तो मॉल, सिनेमा हॉल, बस स्टैंड, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के आसपास विशेष तौर पर महानगरों में होठों में सिगरेट दबाएं लड़के-लड़कियां अक्सर दिख जाते हैं। सच कहें तो धूम्रपान अब उनके लिए फैशन बन चुका है। वर्ष 2009-10 में वयस्कों में जहां तंबाकू उत्पाद सेवन का औसत 33.9 फीसद था, वहीं 2016-17 में बढ़ कर 35.5 फीसद हो गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि तंबाकू उत्पादों का सेवन करने वालों में उत्तर प्रदेश बारहवें नंबर है। कुल औसत की बात करें तो त्रिपुरा में 64.5 फीसद और मिजोरम में 58.7 फीसद लोग तंबाकू का सेवन करते हैं। पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में 14.2 फीसद महिलाएं तंबाकू उत्पादों का सेवन करती हैं। तंबाकू की खपत के मामले में छह पूर्वोत्तर राज्य- मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा और असम सबसे आगे हैं। एक अन्य आंकड़े के मुताबिक विश्व में तकरीबन बारह फीसद महिलाएं बीड़ी व सिगरेट का सेवन करती हैं जिनमें एक करोड़ दस लाख महिलाएं भारत की हैं। धूम्रपान करने में भारतीय महिलाएं विश्व में तीसरे स्थान पर हैं। विडंबना यह कि तमाम जागरूकता कार्यक्रम के बावजूद धूम्रपान की बुरी प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लग रही है और उसका खतरनाक प्रभाव शरीर और मन पर पड़ रहा है। चिकित्सकों की मानें तो तंबाकू सेवन की वजह से कैंसर, फेफड़ों की बीमारियां और हृदय संबंधी कई रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। अगर महिलाओं को नशे की इस लत से दूर नहीं रखा गया तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में धूम्रपान करने वाली महिलाएं उन महिलाओं की तुलना में आठ वर्ष पहले मर जाती हैं जो बीड़ी-सिगरेट को हाथ तक नहीं लगातीं। भारत सरकार को तंबाकू सेवन के विरुद्ध जनजागरूकता कार्यक्रमों के विस्तार के साथ ही तंबाकू की खेती पर भी रोक लगानी चाहिए। देश में सबसे ज्यादा सेवन खैनी और बीड़ी जैसे उत्पादों का होता है। ग्यारह फीसद वयस्क खैनी का और आठ फीसद वयस्क बीड़ी का सेवन करते हैं, जिनमें युवतियां व महिलाएं भी शामिल हैं। कार्यालयों और घरों के अंदर काम करने वाले हर दस में से तीन स्त्री-पुरुष परोक्ष रूप से धूम्रपान का शिकार होते हैं। जबकि सार्वजनिक स्थानों पर इसके प्रभाव में आने वाले लोगों की संख्या तेईस फीसद है। पिछले साल चबाने वाले तंबाकू की वजह से होने वाले कैंसर, हृदय रोग और मुंह की बीमारियों के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पंद्रह साल और उससे अधिक उम्र की सात करोड़ महिलाएं चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का सेवन कर रही हैं। इससे गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का खतरा सत्तर फीसद बढ़ गया है। गर्भधारण की क्षमता घट रही है और गर्भपात के मामले बढ़ रहे हैं। पेट में पल रहे बच्चे के वजन में कमी तथा पैदा होने के समय में गिरावट आने से समय-पूर्व प्रसूति के खतरे बढ़ रहे हैं। यही नहीं, पैदा होने वाले बच्चे में मनोवैज्ञानिक विकार उत्पन्न होने के खतरे भी बढ़ जाते हैं। भारत में गर्भवती महिलाओं की मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण गर्भपात ही है और उसके लिए एक हद तक धूम्रपान की कुप्रवृत्ति जिम्मेदार है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि तंबाकू के सेवन से हर साल साठ लाख लोगों की मौत होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू का सेवन मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह और बीमारियां उत्पन्न करने के मामले में चौथी बड़ी वजह है। दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों में तीस फीसद लोगों की मौत तंबाकू उत्पादों के सेवन से होती है और इसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं। यहीं नहीं, लोगों को तंबाकू सेवन से उत्पन्न बीमारियों से निपटने के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा भी इलाज पर खर्च करना पड़ रहा है। देश व समाज को चिंतित होना चाहिए कि कम उम्र में धूम्रपान की वजह से महिलाएं दमे और फेफड़े के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार बन रही हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष तंबाकूजनित बीमारियों के इलाज के मद में हर वर्ष देश के सकल घरेलू उत्पाद का 1.16 फीसद यानी एक लाख पांच हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च करना पड़ रहा है। अच्छी बात है कि भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 के तहत देश में तंबाकू उत्पादों के सेवन में 2020 तक पंद्रह फीसद और 2025 तक तीस फीसद की कमी लाने का लक्ष्य रखा है। अगर यह लक्ष्य पूरा हो जाता है तो निस्संदेह धूम्रपान की बुरी लत से महिलाएं दूर होंगी।

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