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राजनीति: विदेशी नौकरियों का टूटता तिलिस्म

एच1-बी वीजा की कटौती कुल मिला कर भारतीय युवा पेशेवरों के लिए नुकसानदेहसाबित हो रही है। हालांकि बात सिर्फ अमेरिका की नहीं है, देखने में आ रहा है कि पूरी दुनिया में रोजगार क्षेत्र स्थानीय कारणों से दबाव में है। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि विशाल युवा आबादी वाला भारत जैसा मुल्क उन विकल्पों की तलाश करे जो नौजवानों को सतत रोजगार से जोड़े रख सकते हैं।

Author May 9, 2018 3:38 AM
आप्रवासन नीति के मुखिया और ट्रंप की टीम में अटार्नी जनरल चुने गए सीनेटर जेफ सेस्सियंस एच1-बी वीजा के धुर विरोधी माने जाते हैं।

अभिषेक कुमार सिंह

अमेरिकी संरक्षणवाद एक बार फिर जाग उठा है। ट्रंप प्रशासन ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत एच-4 वीजाधारकों का वर्क परमिट खत्म करने का फैसला किया है। यह वीजा (एच-4) असल में अमेरिका में नौकरी करने गए एच-1 बी वीजाधारकों के जीवनसाथी को दिया जाता है जो वहां जाकर नौकरी कर सकते हैं। एच-4 वीजाधारकों में बड़ी संख्या में भारतीय महिलाएं है जो एक पेशेवर के तौर पर अमेरिका गई हैं और अपनी योग्यता के बल पर वहां नौकरी करती हैं। अंदाजा है कि इस फैसले से साठ हजार भारतीय पेशेवर बेरोजगार हो जाएंगे जो अपने जीवनसाथी के साथ अमेरिका गए थे। यह फौरी संकट जहां एक ओर अमेरिकी संरक्षणवाद की सतत कोशिशों को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर साबित करता है कि भारतीय प्रतिभाओं के लिए अच्छे वेतन-अवसर वाली विदेशी नौकरियों के अवसर लगातार कम हो रहे हैं। समस्या यह है कि हम मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) सेक्टर में ऐसी हस्ती नहीं हैं कि उसके बल पर इतने रोजगार पैदा कर सकें कि उसमें लगातार बड़े पैमाने पर युवाओं को नौकरी के अवसर मिलते रहें। नौकरियों के लिए सेवा क्षेत्र में अपनी हैसियत सुधारना और आगे बढ़ना ही इस नजरिये से हमारे लिए बेहतर बात रही है। बीते कुछ दशकों में हमारे पढ़े-लिखे और कुशल युवाओं ने इसी सेवा क्षेत्र (जैसे आइटी और बीपीओ) में अपनी चमक दिखाई है। पर इस चमक-दमक पर अब निरंतर ग्रहण लगने लगे हैं। अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के फौरन बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी वादे को अमल लाते हुए भारतीय युवाओं को अमेरिका में नौकरी दिलाने में मददगार वीजा एच-1बी और एल-1 की शर्तों को और कड़ा करना शुरू कर दिया। इससे उन भारतीय आइटी कंपनियों का कामकाज भी प्रभावित हुआ जो युवाओं को यहां से ले जाती रही हैं और अमेरिकियों के मुकाबले कम वेतन पर अमेरिका में उन्हें रोजगार देती रही हैं।

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान ही साफ हो गया था कि वीजा कानूनों को लेकर पूरे ट्रंप समूह का नजरिया नकारात्मक है। आप्रवासन नीति के मुखिया और ट्रंप की टीम में अटार्नी जनरल चुने गए सीनेटर जेफ सेस्सियंस एच1-बी वीजा के धुर विरोधी माने जाते हैं। ट्रंप की तरह वे भी अमेरिकी रोजगारों में उन गोरों को आगे बढ़ाने के समर्थक हैं जो उन्हें अमेरिकी राजनीति और सत्ता में लंबे समय तक टिकाए रखने में मददगार साबित हो सकते हैं। हालांकि संरक्षणवाद का यह नारा खुद अमेरिकी कंपनियों के लिए मुश्किलें खड़ी करता है क्योंकि वे भी तो कम वेतन देकर भारतीय प्रतिभा का फायदा उठाती रही हैं। एक आकलन कहता है कि सस्ते श्रम के रूप में मिलने वाली भारतीय आइटी प्रतिभाओं और कंपनियों की बदौलत अमेरिका में एक के बदले तीन नौकरियां पैदा होती हैं। ऐसे में ज्यादा मुश्किल तो खुद अमेरिकी कंपनियों को होनी है। हालांकि इसमें भी संदेह नहीं है कि अमेरिकी रोजगारों और कारोबार की बदौलत हमारी कंपनियां और युवा भी काफी लाभप्रदस्थिति में रहे हैं। जैसे, अमेरिका की बदौलत भारतीय बीपीओ उद्योग 108 अरब डॉलर से ज्यादा का हो चुका है और इसमें करीब 37 से 40 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। अमेरिका ही भारतीय आइटी इंडस्ट्री का सबसे बड़ा बाजार है और उसके करीब साठ फीसद हिस्से पर भारतीय कंपनियों का कब्जा है। इसके लिए भारतीय युवाओं को सामान्यत: एच-1बी और एल-1 वीजा की जरूरत होती है और आंकड़े बताते हैं कि इनका ज्यादातर हिस्सा भारतीय युवा हासिल करते हैं। इनके आनुषांगिक वीजा के तौर पर एच-4 वीजा पाकर भारतीय पेशेवरों के जीवनसाथी (ज्यादातर महिलाएं) भी अमेरिका में नौकरी के लिए जाते रहे हैं। ‘यूएस डिपार्टमेंट आॅफ होमलैंड सिक्योरिटी’ के मुताबिक एच-1 बी के तहत अमेरिका हर साल पैंसठ हजार युवाओं को बाकी दुनिया से अमेरिका आने की छूट देता है और आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014 में इसके सत्तर फीसद वीजा भारतीयों को दिए गए। वर्ष 2016 में वैश्विक स्तर पर पैंसठ हजार एच-1बी वीजा में से 72 फीसद भारतीय प्रतिभाओं को मिले। पर अब ट्रंप की नीतियों के कारण इसमें गिरावट आने लगी है। अमेरिकी थिंकटैंक ‘द नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी’ की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 से 2017 के बीच एच-1बी वीजा में 43 फीसदी की गिरावट हुई है।

समस्या एच-1बी वीजा की नई शर्तें हैं। इन शर्तों के मुताबिक अब एच-1बी वीजा के तहत अमेरिका जाने वाले युवाओं को न्यूनतम 1 लाख 30 हजार डॉलर सालाना वेतन देना होगा, जबकि अभी ज्यादातर कंपनियां 60-65 हजार डॉलर सालाना वेतन देती हैं। वेतन दोगुना करने की बाध्यता के कारण तमाम कंपनियों ने भारत से प्रतिभाओं को ले जाने से रोक दिया है, क्योंकि वे इतना वेतन नहीं दे सकती हैं। आइटी-बीपीओ कंपनियों को भी नौकरियों की संख्या में कटौती करनी पड़ी है। साफ है कि एच1-बी वीजा की कटौती कुल मिलाकर भारतीय युवा पेशेवरों के लिए नुकसानदेहसाबित हो रही है। हालांकि बात सिर्फ अमेरिका की नहीं है, देखने में आ रहा है कि पूरी दुनिया में रोजगार क्षेत्र स्थानीय कारणों से दबाव में है। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि विशाल युवा आबादी वाला भारत जैसा मुल्क उन विकल्पों की तलाश करे जो नौजवानों को सतत रोजगार से जोड़े रख सकते हैं। यों अमेरिका में बेरोजगारों की जो समस्या है, उससे हमारा ज्यादा लेना-देना नहीं होना चाहिए, पर यह देखते हुए कि जिस प्रतिभा को देश के विकास में लगना चाहिए, वह मोटी तनख्वाह और बेहतर जीवनशैली की चाह में अमेरिका कूच कर जाती है, थोड़ी चिंता हमें भी करनी चाहिए। असल में हमारे देश में यह धारणा कायम है कि उच्चशिक्षा हासिल करने, विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने या फिर ऊंचे वेतन वाली नौकरी पाने के लिए जिन पश्चिमी मुल्कों का रुख करना चाहिए, उनमें अमेरिका सबसे श्रेष्ठ है। इस प्रवृत्ति की पुष्टि नेशनल साइंस फाउंडेशन की एक रिपोर्ट से भी होती है, जिसके मुताबिक 2003 से 2013 के बीच एक दशक में अमेरिका में रह कर काम करने वाले भारतीय इंजीनियरों (खासकर आइटी इंजीनियरों) और वैज्ञानिकों की संख्या में 85 फीसद का इजाफा हुआ है। पर हम जिन इंजीनियरों और और वैज्ञानिकों के बल पर अमेरिका में भारतीयता के झंडे गाड़ देने का जश्न मनाते हैं, उसका कुल हासिल यह है कि इससे अमेरिकी रोजगार बाजार को सस्ता श्रम मिल जाता है। यही नहीं, एच-1बी और एच-4 वीजा के कारण हुई दोहरी आय के बल पर भारत से अमेरिका गए कई दंपतियों ने वहां नए कारोबार शुरू किए जो अंतत: अमेरिका में स्थानीय नागरिकों के लिए रोजगार पैदा करते हैं। इसलिए हमें इस गुमान में नहीं रहना चाहिए कि अमेरिका पहुंचा हर भारतीय अपने देश के लिए कमाल का ही कोई काम कर रहा है। बल्कि ज्यादातर तो लीक पीटने से अधिक कुछ नहीं कर रहे। उनका काम सिर्फ अमेरिकी कंपनियों के आॅर्डर पूरे करना है।

इस चलन के दो बड़े नुकसान हैं। एक तो जिन श्रेष्ठ दिमागों को भारत की आर्थिक-वैज्ञानिक और सामाजिक तरक्की में लगना था, वे ज्यादा तनख्वाह और बेहतर भविष्य की आस में अमेरिका चले जाते हैं। इससे भारत अच्छी प्रतिभाओं से सतत वंचित रह जाता है। हमारी सरकारें और विश्वविद्यालय जो संसाधन इंजीनियर-वैज्ञानिक तैयार करने के लिए लगा रहे हैं, उनका इस्तेमाल अमेरिका के विकास में होता रहा है। यह संसाधनों का दुरुपयोग नहीं, तो और क्या है? अच्छा होगा कि हमारी प्रतिभाएं अमेरिका का मोह छोड़ें और कुछ ऐसा करें जिससे देश का विकास हो। तमाम आशंकाएं पैदा करने वाली ट्रंप की नीतियों का इससे बेहतर जवाब और कुछ नहीं हो सकता।

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