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राजनीति: लाभों का निजीकरण, हानि का सरकारीकरण

बैंक चाहे सरकारी हो या निजी,सरकार को मदद के लिए हाथ बढ़ाना ही पड़ता है। अगर सभी निजी बैंक भी नाकाम हो गए तो भी सरकार को मदद के लिए आगे आना ही पड़ेगा। यह तो लाभों का निजीकरण और हानि का सरकारीकरण है। इस समय सरकारी बैंकों को सुधारने की जरूरत है। लेकिन सुधार का अर्थ निजीकरण नहीं है। सरकारी बैंकों का निजीकरण कर देने से समस्या का हल नहीं निकलेगा।

रिसर्व बैंक ऑफ इंडिया। (फाइल फोटो)

बैंक अधिकारी और कर्मचारी कुछ दिन पहले हड़ताल पर थे। वे केवल अपनी सेवा शर्तों में सुधार और अधिक वेतन के लिए ही प्रबंधन के सामने आते हैं, लेकिन जब गलत नीतियों से बैंक को करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा होता है तब ये खामोश रहते हैं। भारत में बैंक या अन्य वित्तीय संस्थान कैसे काम करते हैं, सामान्य जन को आज भी कुछ विशेष जानकारी नहीं है। इसके बारे में न तो बैंक कुछ बतलाते हैं और न ही सरकार। आजकल बैंकों की हालत पर सतही चर्चा हो रही है, क्योंकि कुछ उद्योगपति, जिन्होंने बैंकों से हजारों करोड़ रुपए का ऋण लिया है, विदेश चले गए हैं। विदेश जाने वाले उद्योगपतियों की सूची दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। राजनीतिक दलों को केवल इस बात से मतलब है कि यह ऋण किस समय दिया गया था और यह घोटाला किस समय पकड़ा गया है। वास्तव में बैंकों की स्थिति आप जितना सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा खराब है। सरकारी बैंकों की स्थिति तो और भी नाजुक है। रेटिंग एजेंसी आइसीआरए के आंकड़ों के मुताबिक साल 2017 में भारतीय बैंकों का पिछले दस सालों में सबसे ज्यादा पैसा डूबा है। भारतीय बैंकों ने माना है कि इस साल मार्च तक उनका 1 लाख 44 हजार करोड़ रुपया डूब गया। आइसीआरए के आंकड़ों के मुताबिक, बैंकों ने जो बात मानी है वह एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) से भी ज्यादा खतरनाक है; इसे ‘राइट आॅफ’ यानी बट््टे खाते में डाल देना या रफा-दफा कहा जाता है। इसका आम भाषा में मतलब हुआ कि बैंकों ने मान लिया है कि इस साल मार्च तक कर्ज के तौर पर दिया गया 1.44 लाख करोड़ रुपया अब वापस नहीं मिलने वाला, यानी यह डूब चुका है। जबकि एनपीए में पैसे के वापस आने की उम्मीद बाकी रहती है। इस नुकसान में 83 फीसद हिस्सा सरकारी बैंकों का है। इसका आम आदमी पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि जब कोई कर्ज लेने बैंक जाएगा तो उसे कर्ज मिलना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि सरकारी बैंकों के पास अब कर्ज देने के लिए पैसा ही नहीं बचा है। इससे आम जनता ही परेशान नहीं होगी बल्कि लोक कल्याणकारी योजनाएं भी प्रभावित होंगी।

ऐसे में सरकार किसानों को आसान किस्तों पर कर्ज कैसे देगी? इस कर्ज के लिए पैसा कहां से आएगा, जबकि सरकारी बैंक अब कर्ज देने में सक्षम ही नहीं हैं। दूसरा असर लघु और मध्यम उद्योगों पर होगा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग पैंतालीस फीसद हिस्सेदारी लघु उद्योगों की है। एक से पांच लाख रुपए की रकम के कर्ज पर ही ये उद्योग चलते हैं। लेकिन बैंकों की खराब हालत से उन्हें यह रकम मिलना भी मुश्किल हो जाएगा। लघु उद्योग भारत में ज्यादा लोगों को नौकरियों पर रखते हैं। इन बैंकों से लघु उद्योगों को कर्ज नहीं मिलेगा तो वहां नौकरियां भी मिलनी बंद हो जाएंगी। यहां चिंता की बात यह है कि आखिर ऐसे हालात बने ही क्यों। अगर बैंक काम करने लायक ही नहीं हैं तो आम लोग उनका भार क्यों उठाएं? अगर बैंकों के काम-काज करने के तरीके ही गलत हैं तो जनता इसका खमियाजा क्यों भुगते? बैंकों ने कर्ज दिया और उसे सही तरीके से वसूल नहीं पाए। उस पर अब अगर कोई कहे कि जो बैंक सही तरीके से काम नहीं कर पाया, उसे बचाने के लिए हम फिर से टैक्स दें, तो यह सरासर गलत है। कभी-कभी बड़े कर्ज की भरपाई न होने के कारण बैंक नाकाम हो जाते हैं। ऐसे में सरकार उनकी मदद करती है। सरकार अगर बैंक के लिए पैसा देती है तो इसकी काफी आलोचना होती है, लेकिन बैंक चाहे निजी हों या सरकारी, उनमें छोटे-बड़े हर तरह के लोगों की जीवन भर की जमापूंजी होती है और बैंक का नाकाम हो जाना आम लोगों का पैसा डूब जाना है। इसकी भरपाई सरकार फिर कैसे करेगी यह सोचने वाली बात है। सरकारी बैंकों के डूबते कर्ज यानी एनपीए की स्थिति कितनी शोचनीय है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2013 से साल 2017 तक इसमें 311 प्रतिशत से अधिक का उछाल आया और ये 1.55 लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर साढ़े छह लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गए। 11 अगस्त 2017 को वित्तमंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि बैंकों की कुल संपत्ति में एनपीए का हिस्सा बढ़ कर 12.47 प्रतिशत तक पहुंच गया है। हालांकि निजी बैंक भी इस होड़ में पीछे नहीं हैं और 2013 के 19,986 करोड़ रुपए के मुकाबले 2017 में उनके एनपीए 73,842 करोड़ रुपए तक पहुंच गए। एनपीए का इस हद तक पहुंच जाना गंभीर चिंता की बात है, क्योंकि बैंकिंग तंत्र अर्थव्यवस्था की धुरी है। अगर बैंकिंग व्यवस्था का ही क्षरण होता जाएगा, तो अर्थव्यवस्था के मजबूत होने की बात सोची भी नहीं जा सकती।

अब बैंक चाहे सरकारी हो या निजी, सरकार को मदद के लिए हाथ बढ़ाना ही पड़ता है। अगर सभी निजी बैंक भी नाकाम हो गए तो भी सरकार को मदद के लिए आगे आना ही पड़ेगा। यह तो लाभों का निजीकरण और हानि का सरकारीकरण है। इस समय सरकारी बैंकों को सुधारने की जरूरत है। सरकारी बैंकों में कई तरह की समस्याएं हैं उन्हें हल करने की जरूरत है ताकि बैंक बेहतर काम कर सकें। लेकिन सुधार का अर्थ निजीकरण नहीं है। सरकारी बैंकों का निजीकरण कर देने से समस्या का हल नहीं निकलेगा क्योंकि निजी बैंक भी आम जनता को धोखा देकर भाग जाएंगे। आज से करीब उनचास साल पहले यानी 19 जुलाई 1969 को भारत सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया था जिसने देश के बैंकिंग सेक्टर की तस्वीर बदल कर रख दी थी। यह था बैंकों का राष्ट्रीयकरण, यानी निजी बैंकों को सरकारी बैंकों में तब्दील करने का फैसला। जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुए इस फैसले के गुण-दोषों की चर्चा आज तक होती है, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इस कदम के आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक निहितार्थ भी थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक रेडियो प्रसारण में 19 जुलाई की शाम बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा करते हुए कहा था कि बैंकिंग सिस्टम को बड़े सामाजिक उद््देश्यों के लिए काम करने की जरूरत है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ कार्यक्रम का अहम हिस्सा बन गया था। रातोंरात देश के चौदह प्राइवेट बैंक सरकारी हो गए थे। ये चौदह बैंक उस वक्त देश की सत्तर फीसद जमापूंजी को नियंत्रित करते थे। इसके बाद 1980 में छह और प्राइवेट बैंकों को सरकारी बनाया गया। हालांकि देश के सबसे बड़े बैंक (स्टेट बैंक आॅफ इंडिया) को 1955 में ही सरकारी बना लिया गया था, जिसका नाम इंपीरियल बैंक होता था। आज 2018 की सच्चाई यही है कि ज्यादातर सरकारी बैंकों की सेहत जर्जर हो चुकी है और सरकार के लिए उन्हें चलाते रहना आसान नहीं है।

आज देश का बैंकिंग सिस्टम नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स यानी एनपीए के बोझ से दबा है और इस बदहाली के ज्यादा बड़े जिम्मेदार सरकारी बैंक हैं। बैंकिंग एक गंभीर कारोबार है और सामाजिक उद््देश्यों की पूर्ति तभी हो सकती है जब कारोबार फायदे में हो। और आज जब तकनीकी विकास के सहारे बैंकिंग सेवाओं की पहुंच हर किसी तक आसानी से हो सकती है, ऐसे में सरकारी बैंकों को सफेद हाथी की तरह खड़ा रखना अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकता है।

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