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राजनीति : किसानों का दर्द अब तो समझें

किसानों से संबंधित नीतियां बनाने वाले गांवों से दूर शहर के वातानुकूलित माहौल में रहते हैं, इन्हें जमीनी जानकारी बहुत कम होती है। यह सही है कि किसानों की कर्जमाफी कोई स्थायी समाधान नहीं है, यह बस फौरी राहत का ही कदम हो सकता है। स्थायी समाधान तो यही है कि खेती, जो कि घाटे का धंधा बन कर रह गई है, लाभकारी बने। हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए भी यह जरूरी है।

तस्वीर का इस्तेमाल संकेत के तौर पर किया गय है। (File Photo)

पिछले कुछ दिनों से किसान सुर्खियों में है। बहुत लंबे समय के बाद उनके बारे में भी खबरें मीडिया में आ रही हैं। क्योंकि इस बार किसानों का दर्द का असर शहरी आबादी तक पहुंचा है। क्योंकि किसानों ने इस बार विरोध का अलग तरीका अपनाया है। इससे शहरी आबादी को भी दर्द महसूस हो रहा है। किसानों ने जरूरी सब्जियों और दूध की आपूर्ति शहरों में रोकी है। हालांकि दो दिन के विरोध के बाद ही किसानों को खलनायक बनाने की तैयारी भी होने लगी। किसानों को खबरों का लालची तक बताया गया। उन पर आरोप लगाया गया कि वे आपूर्ति रोक कर सुर्खियां बटोरना चाहते हैं। लेकिन किसानों का दर्द न समझने वाले अब भी गलती कर रहे हैं। सिर से पानी निकल चुका है। देश के नीति-निर्धारकों और शहरी आबादी को यह समझना होगा कि अगर सब्जियों और अन्न का उत्पादक ही नहीं रहेगा तो वे कैसे जिंदा रहेंगे। शायद शहरी आबादी और सरकार को यही महसूस कराने के लिए परेशान किसानों ने शहरों मे जरूरी खाद्य पदार्थों की आपूर्ति रोकने का फैसला लिया। यह किसानों द्वारा अब तक का सबसे सख्त कदम है। दो-तीन दिन में ही शहरी आबादी परेशान हो गई। क्योंकि शहर की मंडिया खाली हो गई हैं। दूध की आपूर्ति भी रोक दी गई है। सब्जियों की कीमतें बढ़ गई हैं। अब शायद किसानों का दर्द शहरी आबादी को महसूस हो। क्योंकि यह भी एक सच्चाई है कि किसानों से संबंधित नीतियां बनाने वाले लोग गांवों से दूर शहर के वातानुकूलित माहौल में रहते हैं, इन्हें जमीनी जानकारी बहुत कम होती है। टीवी पर लहलहाती फसल देख इन्हें गांव का किसान खुशहाल नजर आता है। लेकिन इन लहलहाती फसलों के बीच किसानों का क्या दर्द है, उन्हें पता नहीं होता। टीवी पर लहलहाती फसलों को देख शहरी आबादी को गांव के किसान भी वातानुकूलित कमरों में सोते नजर आते हैं।

बीते दिनों पंजाब के नाभा के पास एक किसान ने अपनी भिंडी की पूरी फसल पर ट्रैक्टर चला दी थी। कई एकड़ में लगी भिंडी पर ट्रैक्टर चलाना उसकी मजबूरी थी। क्योंकि भिंडी की उत्पादन लागत लगभग आठ रुपए किलो आई थी। जब बाजार में वह भिंडी लेकर पहुंचा तो उसकी कीमत उसे दो रुपए प्रति किलो मिल रही थी। इसके बाद भिंडी की फसल पर ट्रैक्टर चलाने के अलावा कोई चारा उस किसान के पास नहीं था। कृषि क्षेत्र के लिए नीतियां बनाने वाले नौकरशाह और सरकारी तंत्र नाभा के किसान के दर्द से वाकिफ जरूर है, लेकिन संवेदनहीन हैं। वे इसे सामान्य घटना मानते हैं। इसे ज्यादा उत्पादन की घटना बना कर सरकारें पेश करती हैं, क्योंकि ज्यादा उत्पादन की स्थिति में कीमतें गिरती है। फिर यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में कई किसानों ने फसलों को खेतों में ही नष्ट कर दिया। क्योंकि बाजार में इन फसलों की कीमत, लागत से कई गुना कम मिल रही थी। शासन की नजर में यह सामान्य घटना थी, लेकिन अब शहरों में इन्हीं सब्जियों की आपूर्ति रोके जाना सरकार की नजर में सामान्य घटना नहीं है! किसान संगठनों का कहना है कि उनके पास अब विरोध का यही एकमात्र विकल्प है। सब्जियों और दूध की आपूर्ति कम होने से शहरी आबादी परेशान है। दिल्ली और चंडीगढ़ में इसका प्रभाव दिखा है। सब्जियों के दामों में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन किसान करें क्या! किसानों ने आपूर्ति रोकने का फैसला मजबूरी में लिया है। कई सालों से किसान ज्ञापन, धरना और प्रदर्शन करते आ रहे हैं। लेकिन सरकार ने सिर्फ घोषणाएं कीं, आश्वासन भर दिए। किसानों को कोई लाभ नहीं मिला। कई राज्यों में कर्जमाफी की घोषणाएं हुर्इं। लेकिन यह भी किसानों के साथ एक मजाक था। कर्जमाफी के नाम पर दो रुपए, चार रुपए, दस रुपए के कर्ज माफ किए गए। न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत से डेढ़ गुना करने का वायदा सरकार ने किया था। लेकिन यह कागजों में ही रहा। जिन फसलों का न्यूतनम समर्थन मूल्य सरकार तय करती है, वह भी किसानों को नहीं मिला। बाईस फसलों का समर्थन मूल्य सरकार तय करती है। लेकिन सरकार सिर्फ धान और गेहूं खरीदती है, वह भी कुछ राज्यों में। निजी क्षेत्र और बाजार न्यूतनम समर्थन मूल्य के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को कैसे कारगर ढंग से लागू कराया जाए यह एक अहम सवाल है।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार, धान के समर्थन मूल्य का फायदा सिर्फ बत्तीस प्रतिशत किसानों को हुआ। गेहूं का समर्थन मूल्य उनतालीस प्रतिशत किसानों को मिला। कई दालों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होता है, लेकिन इनकी खरीद नहीं होती। कई राज्य खरीद-केंद्र की शुरुआत समय पर नहीं करते ताकि किसान खुले बाजार के हवाले हो जाएं। गुजरात जैसे राज्य में कागजों में ही मूंगफली का न्यूतनम समर्थन मूल्य घोषित किया गया। दरअसल, गुजरात सरकार के पास राज्य में पैदा हुई सत्रह करोड़ बोरी मूंगफली की खरीद की क्षमता ही नहीं थी। सरकार की खरीद क्षमता मात्र दो करोड़ बोरी की थी। बीते सीजन में ही उतर प्रदेश और पंजाब के आलू उत्पादकों ने दस से पचास पैसे प्रति किलो आलू बेचा। पश्चिमी उतर प्रदेश के गन्ना उत्पादकों का बुरा हाल है। चीनी मिल मालिक गन्ना के पैसे का भुगतान नहीं कर रहे हैं। चीनी मिलों पर किसानों का हजारों करोड़ रुपए का बकाया है। किसानों के भुगतान किए जाने वाले पैसों को चीनी मिल मालिकों ने कहीं और खर्च कर दिया। किसान की हालत देखिए। वह सिर्फ आत्महत्या नहीं कर रहा, देश की जनता का पेट पालने के लिए कई बीमारियों को भी अपने शरीर में डाल रहा है। कई राज्यों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने किसानों को गंभीर बीमारियों का शिकार बना दिया है। कीटनाशकों के प्रयोग से उनकी भूमि की उर्वरा-शक्ति खत्म हो रही है। वहीं उनके पीने का पानी भी दूषित हो गया है। पंजाब इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अगर आज पंजाब का मालवा इलाका ‘कैंसर की राजधानी’ बना है तो इसका बड़ा कारण कीटनाशक है। किसानों को कीटनाशक बेचने वाली कंपनियां तो मालामाल हो रही हैं, पर किसान बीमार हो रहे हैं। भारी कर्ज के कारण आत्महत्या भी कर रहे हैं। इस समय देश के किसानों पर लगभग बारह लाख करोड़ रुपए का कर्ज है।

सच्चाई यह है कि किसान ईमानदारी से अपना कर्ज लौटाता है। कर्ज नहीं लौटाने की स्थिति में ही किसान कर्जमाफी के लिए छटपटाता है। जब सरकार नहीं मानती तो वह आत्महत्या कर लेता है। दूसरी तरफ, कई ‘बड़े लोग’ बैंकों के हजारों करोड़ रुपए लेकर सुरक्षित विदेश चले जाते हैं। जो यहीं रहते हैं वे भी चुकाने की परवाह नहीं करते। नतीजतन, बैंकों का एनपीए बढ़ता गया है। फिर, सरकारी खजाने से पैकेज देकर बैंकों को संभाला जाता है, यानी करोड़ों-अरबों के कर्ज न चुकाने वालों की करतूतों की सजा करदाताओं को मिलती है। लेकिन जब किसानों की कर्ज माफ करने की बात आती है, तो तमाम अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था के तबाह हो जाने का डर दिखाने लगते हैं। एनपीए के गुनहगारों पर वे चुप क्यों रहते हैं! यह सही है कि किसानों की कर्जमाफी कोई स्थायी समाधान नहीं है, यह बस फौरी राहत का ही कदम हो सकता है। स्थायी समाधान तो यही है कि खेती, जो कि घाटे का धंधा बन कर रह गई है, लाभकारी बने। हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए भी यह जरूरी है।

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