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राजनीति: इफ्तार क्यों बने राजनीति का अखाड़ा

यह साफ है कि रोजा इफ्तार पार्टियों का आयोजन करने वाले नेता केवल मुसलिम वोटों को आकर्षित करने के लिए ऐसा करते हैं। यदि ये कार्यक्रम विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सद्भाव को बढ़ाने की नीयत से आयोजित हों तो अलग बात है, लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं होता।

Author May 11, 2018 4:30 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

विजय गोयल

बचपन से मैं हैरिटेज प्रेमी रहा हूं। हैरिटेज सिटी होने के कारण चांदनी चौक से मेरा नाता बचपन से जुड़ा रहा। उसके बाद मुझे वहां से दो बार सांसद बनने का मौका मिला। वहां रहते हुए मैंने पुरानी दिल्ली की गंगा-जमुनी तहजीब देखी और मुझे हिंदू तीज-त्योहारों के साथ-साथ मुसलिम त्योहारों को भी नजदीक से देखने का मौका मिला। जहां हिंदुओं में लगभग हर दिन एक त्योहार होता है और पूरे साल होली, दिवाली व अन्य त्योहार चलते रहते हैं, वहीं मुसलिमों और ईसाइयों में दो-तीन ही बड़े त्योहार कहे जा सकते हैं। ईसाइयों में क्रिसमस, गुड फ्राइडे व ईस्टर और मुसलमानों में साल में दो बार ईद और रमजान का महीना, जिसे त्योहार कम उपासना ज्यादा कहा जाना चाहिए। इस्लाम में ईद चांद को देख कर मनाई जाती है और मैंने देखा कि ईद में भी होली, दिवाली की तरह ही बाजार सजे होते हैं और बच्चे नए-नए कपड़े पहन कर इतराते हुए इस त्योहार को मनाते हैं। मैंने बचपन से ही पढ़ा था कि इस्लाम में रमजान का महीना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। ऐसा माना जाता है कि इसी महीने में अल्लाह ने पैगंबर मोहम्मद पर पवित्र कुरान अवतरित की थी। इसलिए इसे खुदा की दया और उदारता का महीना माना जाता है। एक मान्यता यह भी है कि नियमपूर्वक रोजा रखने वाले मुसलमानों पर अल्लाह की मेहरबानी खुशहाली और संपन्नता के रूप में बरसती है। उनका बड़े से बड़ा गुनाह खुदा माफ कर देता है। एक पक्का मुसलमान पूरे दिन रोजा रखने के बाद इफ्तार खोलने से पहले इबादत करते हुए कहता है कि ‘ऐ अल्लाह! मैंने आपके लिए रोजा रखा है, मैं आप में विश्वास रखता हूं और मैं आपकी मदद से अपना रोजा खोलता हूं।’ मुसलिम मत के अनुसार, इफ्तार अल्लाह में विश्वास रखने वालों के लिए दो नमाजों के बीच माफी मांगने, आत्मविश्लेषण और प्रार्थना करने के लिए होता है। इसलिए मैं इसको त्योहार न कह कर नवरात्र के व्रतों से भी अधिक कठिन व्रत समझता हूं। रमजान को मैं बहुत त्याग और तपस्या वाला महीना मानता हूं। पर आजकल कुछ लोगों ने रमजान में रोजा (व्रत) रखने को धार्मिक कार्य के बजाय राजनीतिक प्रहसन बना दिया है। रमजान के महीने में हर दिन जगह-जगह रोजे के बाद इफ्तार पार्टियां होने लगी हैं। चांदनी चौक से दो बार सांसद रहते हुए मैंने कभी राजनीति के लिए इफ्तार पार्टी नहीं दी, जबकि मेरे ऊपर काफी दबाव था। इसके बावजूद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वहां के मुसलमान कभी मुझसे नाराज नहीं हुए और आज भी मुझे सबसे अच्छा सांसद मानते हैं जिसने अपने दोनों कार्यकाल में सभी समुदायों के लिए बराबर और सबसे बढ़िया काम किया। मैंने कभी रोजों को इफ्तार पार्टी करके राजनीति से नहीं जोड़ा। हां, मैं ईद मिलन जरूर करता था और पूरे उल्लास से करता था।

यह साफ है कि रोजा इफ्तार पार्टियों का आयोजन करने वाले नेता केवल मुसलिम वोटों को आकर्षित करने के लिए ऐसा करते हैं। यदि ये कार्यक्रम विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सद्भाव को बढ़ाने की नीयत से आयोजित हों तो अलग बात है, लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं होता। रोचक बात यह है कि राजनीति में इफ्तार पार्टी देने की प्रथा पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते आ