ताज़ा खबर
 

राजनीति: खौफ में आधी आबादी

कुत्सित प्रवृत्ति के चलते होने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नैतिक आदर्शों और अर्थपूर्ण मान्यताओं को विचार और व्यवहार में जगह देनी होगी। बिखरते मानवीय मूल्यों के इस दौर में यह जिम्मेदारी सिर्फ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तक सीमित नहीं हो सकती। इसके लिए जरूरी है कि महिला अस्मिता से खिलवाड़ करने वाली ऐसी नकारात्मक और हिंसक मानसिकता से लड़ने के लिए पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर भी पहल हो।

2016 में भारत में महिलाओं के साथ बलात्कार की अड़तीस हजार से ज्यादा घटनाएं हुर्इं।

ऐसा लगने लगा है कि महिला सुरक्षा के मोर्चे पर मानो सारा माहौल ही विद्रूपता का शिकार हो गया है। देश के कोने-कोने से तकरीबन रोजाना ही विकृत मानसिकता को परिलक्षित करने वाली दुष्कर्म की घटनाएं सामने आ रही हैं। मासूम बच्चियां तक सुरक्षित नहीं रह गई हैं। उच्चतम न्यायालय ने देश में महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार की बढ़ती घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं पर शीर्ष अदालत ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के लिए सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा है कि यौन उत्पीड़न के मामलों की पीड़ितों की तस्वीरें किसी भी रूप में प्रकाशित या प्रदर्शित नहीं की जाएं। भारत में बलात्कार के मामलों की तेजी से बढ़ती संख्या चिंतित करने वाली है।

यह आज का दुर्भाग्यपूर्ण सच है कि हमारे समाज में बेटियां असुरक्षित तो हैं ही, अमानवीयता भी झेल रही हैं। दुष्कर्म की घटनाओं का आए दिन सुर्खियां बनना परिवेश की शर्मनाक परिस्थितियों को सामने रखता है। दुष्कर्म की घटनाओं का बढ़ता आंकड़ा भयभीत करने वाला है। आज भी हालत यह है कि दुष्कर्म के ज्यादातर मामलों में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती। छोटी बच्चियां तो अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को समझ भी नहीं पातीं और शोषण का शिकार बनती रहती हैं। कई मामलों में बच्ची के भविष्य को देखते हुए अभिभावक चुप्पी साध लेते हैं। डर, सामाजिक दबाव, पैसे या दबंगई की वजह से कितनी ही घटनाएं दब कर रह जाती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार 2016 में भारत में महिलाओं के साथ बलात्कार की अड़तीस हजार से ज्यादा घटनाएं हुर्इं। हाल के वर्षों में नाबालिग बच्चियों के साथ बर्बरता की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। मासूमों के साथ हो रहे ऐसे हादसों को गंभीरता से लेते हुए कुछ समय पहले उच्चत्तम न्यायालय ने बच्चों की मासूमियत को तार-तार करने वाली विकृत मानसिकता के लोगों को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार बच्चों का यौन शोषण या बलात्कार करने वाले अपराधियों की सजा को लेकर कड़े कानून बनाने पर संसद को विचार करना चाहिए। अदालत ने संसद को सलाह दी थी कि वह बच्चों से बलात्कार के मामलों पर अलग से कानून बनाने पर विचार करे। इन घटनाओं का विचारणीय पहलू यह भी है कि दुष्कर्मों को रोकने के लिए सरकार द्वारा कठोरतम कानून बनाए जाने के बावजूद ऐसी घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं, बल्कि दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। हर उम्र की महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बदसलूकी की दुष्प्रवृत्ति देखने को मिल रही है।

यह बीमार होते समाज का परिचायक है। एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते पांच साल में बलात्कार के मामले इकसठ फीसद बढ़े हैं। इनमें नाबालिगों से जुड़े मामलों में एक सौ तैंतीस फीसद इजाफा हुआ है। सोच और समझ की दिशाहीनता का आलम यह है कि साक्षरता के मामले में देश में अव्वल कहलाने वाला राज्य केरल भी छोटी बच्चियों के लिए सबसे असुरक्षित शीर्ष पांच राज्यों में शामिल है। यौन हिंसा के मामले इतने बढ़ गए हैं कि समाज में अविश्वास और असुरक्षा का माहौल बन गया है। इसके अलावा कानूनी और प्रशासनिक शिथिलता भी कायम है। इस बात का सबूत यह है कि देश की विभिन्न अदालतों में 2016 में दुष्कर्म के जिन मामलों की सुनवाई हुई, उनमें से 18.9 फीसद मामलों में ही आरोपियों को सजा हुई। ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं कि बर्बर सोच वाले लोगों का दुस्साहस क्यों और कैसे बढ़ रहा है? यकीनन, महिलाओं के प्रति बढ़ती यौन हिंसा के आंकड़े डराने वाले हैं। सबसे ज्यादा चिंतनीय है ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति। सचमुच यह प्रतीत होता है जैसे हर ओर ऐसी घटनाएं हो रही हैं। हर उम्र की बच्चियों और महिलाओं के साथ यह बर्बरता हो रही है। स्कूल परिसरों से घर के आंगन तक मासूम बच्चियां उन लोगों के विकृत व्यवहार का शिकार बन रही हैं जिन पर इनकी सुरक्षा का जिम्मा है। इसी तरह महिलाएं भी न कार्यस्थल पर सुरक्षित हैं, न ही घर-दफ्तर के बीच। ऐसे हालात सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था से ही नहीं, कानून-व्यवस्था से भी भरोसा उठाने वाले हैं। ऐसी हैवानियत पीड़ित महिला के पूरे व्यक्तित्व को खंडित कर देती है। उसका पूरा जीवन ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना से प्रभावित होता है। मनोवैज्ञानिक रूप से छोटी बच्चियों का मासूम मन ऐसे हादसे झेलने के बाद खुद को जीवनभर नहीं उबार पाता।

यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने यौन उत्पीड़न से पीड़ित नाबालिगों का इंटरव्यू नहीं करने की चेतावनी देते हुए कहा कि इसका दिमाग पर गंभीर असर पड़ता है। इसीलिए सर्वोच्च अदालत ने अपने निर्देश में कहा है कि पीड़ित बच्चों से सिर्फ राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य ही काउंसलर की मौजूदगी में इंटरव्यू कर सकते हैं। गौरतलब है कि ऐसे हादसों का सुर्खियां बनना, पीड़िता की पहचान का खुलासा होना और बेवजह के सवालों का सामना पीड़ित महिला और उसके परिवार को मानसिक तकलीफ पहुंचाने वाला होता है। विचारणीय है कि जिस देश में स्त्रियों के साथ यौनाचार की घटनाएं आम हो चली हैं वहां कानूनी सख्ती भी इन पर लगाम क्यों नहीं लगा पा रही है? ऐसे मामलों को लेकर हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बारह साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के अपराध में मौत की सजा का प्रावधान किया है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या इन मामलों के बरसों चलते रहने को लेकर है। न्यायिक प्रक्रिया में यह विलंब न सिर्फ अपराधियों के हौसले बुलंद करता है, बल्कि कानून के भय को भी खत्म कर देता है। कानूनी दांवपेचों और फाइलों की लंबी कतार में गुम होने वाले ऐसे मामले अपराधियों के दुस्साहस को बढ़ावा देते हैं। यही वजह है कि कुछ समय पहले उच्चतम न्यायालय ने पोक्सो कानून के तहत बच्चों से यौन हिंसा के मामलों की त्वरित सुनवाई और निगरानी के लिए निर्देश जारी किए थे।

विडंबना ही है कि अब स्कूल हो या कोई संरक्षण गृह, सड़क हो या कोई पूजा स्थल, स्त्री बस देह भर रह गई है। एक ओर पूजन तो दूसरी ओर मानमर्दन का खेल। यह बर्बरता उस दोगली मानसिकता की बानगी लिए है जिसमें महिला अस्मिता का कोई मान ही नहीं रह गया है। आए दिन हो रहीं ऐसी घटनाएं सभ्य समाज का असभ्य चेहरा दिखाने काफी हैं। ये उस अमानुषिक सोच का आईना हैं जिसमें सिर्फ और सिर्फ विकृत विचार बाकी हैं। महिलाओं की अस्मिता पर हमला करने वाले गुनहगारों की ऐसी हरकतें पूरे सामाजिक-पारिवारिक माहौल के बिगड़ते हालात की तस्वीर सामने रख रही हैं, जिसमें बेटियां ही नहीं उनके माता-पिता भी तकलीफ और डर के साए में जी रहे हैं। निस्संदेह न्यायिक लचरता, प्रशासनिक अनदेखी, सामाजिक अलगाव और नैतिक पतन के चलते हमारे यहां हालात ऐसे बन गए हैं कि घर हो या बाहर, आधी आबादी की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बन गई है। यही वजह है कि इन घटनाओं को व्यापक स्तर पर समझा जाना जरूरी है। विकृत होती सोच और सामाजिक-पारिवारिक विखंडन के इस दौर में हर उस कारण पर गौर करना जरूरी है जो इंसानी सोच को अमानवीय बना रहा है। कुत्सित प्रवृत्ति के चलते होने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नैतिक आदर्शों और अर्थपूर्ण मान्यताओं को विचार और व्यवहार में जगह देनी होगी। बिखरते मानवीय मूल्यों के इस दौर में यह जिम्मेदारी सिर्फ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तक सीमित नहीं हो सकती। इसके लिए जरूरी है कि महिला अस्मिता से खिलवाड़ करने वाली ऐसी नकारात्मक और हिंसक मानसिकता से लड़ने के लिए पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर भी पहल हो। साथ ही दुष्कर्म और यौन अत्याचारों जैसे जघन्य अपराधों को लेकर राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा भी कड़े कदम उठाए जाने की दरकार है। आखिर कब तक व्यवस्था की लचरता देश की आधी आबादी को भय और मजबूरी के हालात में जीने को विवश करेगी?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App