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राजनीति : क्यों आंदोलित हैं किसान

जब तक सत्ता में बैठे लोग किसान को मनुष्य नहीं सस्ते मजदूर के तौर पर देखते रहेंगे और उसके तहत नीतियां बनाते रहेंगे तब तक न किसान अपने बल पर कभी खड़ा हो पाएगा और न ही उसे कभी सचमुच जीने का अधिकार प्राप्त हो सकता है। किसान का मुख्य संकट आर्थिक है। उसका समाधान किसान परिवार की सभी बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए एक न्यायसंगत व सम्मानजनक आय की प्राप्ति है।

Author June 2, 2018 3:39 AM
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में किसानों की औसत मासिक आय 6426 रुपए है, जिसमें केवल खेती से प्राप्त होने वाली आय 3081 रुपए प्रतिमाह है।

विवेकानंद माथने

किसान गरीब क्यों? किसान परिवार में आत्महत्या क्यों? इस प्रश्न का सच्चा जवाब हम देना नहीं चाहते। जवाब दशकों से ढूंढ़ा जा रहा है। बड़ी-बड़ी रिपोर्टें तैयार की गर्इं। लेकिन संकट गहराता जा रहा है। किसानों की आर्थिक हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। क्या हम किसानों की समस्याओं का सही कारण नहीं खोज पाए या खोजना ही नहीं चाहते? कुछ किसान-विरोधी लोग तो मानते ही नहीं कि किसानों की कोई समस्या है। वे मानते हैं कि कर्ज लेकर बच्चों के शादी-ब्याह पर खर्च करना किसान की बदहाली का कारण है। तो कुछ कहते हैं कि किसान शराब पीने के कारण आत्महत्या करते हैं। जो लोग किसानों की समस्याओं को स्वीकार करते हैं उनमें से कुछ कहते हैं कि खेती की पद्धति में बदलाव करना चाहिए।रासायनिक खेती के बदले जैविक खेती करनी चाहिए। सिंचाई का क्षेत्र बढ़ाना चाहिए। यांत्रिक खेती करनी चाहिए। जीएम बीज का इस्तेमाल करना चाहिए। कुछ कहते हैं कि उत्पादन बढ़ाना चाहिए। निर्यातोन्मुखी फसलों का उत्पादन करना चाहिए। कुछ कहते हैं कि फसल बीमा योजना में सुधार करना चाहिए। कर्ज-योजना का विस्तार करना चाहिए। लेकिन जहां ये उपाय किए गए वहां भी किसानों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आ पाया है। ये उपाय किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए नहीं बल्कि उनसे लाभ उठाने के लिए किए जाते रहे हैं। आज तक का अनुभव यही है कि इन योजनाओं का लाभ बैंकों, बीमा, बीज व यंत्र निर्माता कंपनियों, निर्यात कंपनियों, बांध बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों को मिला है। पहले किसानों की आत्महत्या के कारणों की खोज के नाम पर रिपोर्ट बनाई जाती है और सरकार में लॉबिंग कर उसे लागू करवाया जाता है। यह रिपोर्ट बनाने में सीएसआर फंड प्राप्त एनजीओ बड़ी भूमिका होती है और हम भी किसान के बेटे हैं कहने वाले नौकरशाह और राजनेता अपने ही बाप से बेईमानी करते हैं। उत्पादन-वृद्धि के इन उपायों से किसानों का उत्पादन-खर्च बढ़ा है। साथ ही, उत्पादन बढ़ने और मांग से आपूर्ति ज्यादा होने से फसलों के दाम घटे हैं। इससे नुकसान बढ़ा है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में किसानों की औसत मासिक आय 6426 रुपए है, जिसमें केवल खेती से प्राप्त होने वाली आय 3081 रुपए प्रतिमाह है। यह सत्रह राज्यों में केवल सत्रह सौ रुपए मात्र है। हर किसान पर औसतन सैंतालीस हजार रुपयों का कर्ज है। लगभग नब्बे प्रतिशत किसान और खेत मजदूर गरीबी का जीवन जी रहे हैं। खेती का काम हो, बीमारी हो, बच्चों की शादी हो या कोई अन्य प्रासंगिक कार्य, किसान को हर बार कर्ज लेने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता, यह जानते हुए भी कि उसकी आय कर्ज का ब्याज लौटाने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। पूरे देश के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर आकलन करें तो खेती में काम के दिन के लिए औसतन सिर्फ 92 रुपए मजदूरी मिलती है। यह मजदूरी 365 दिनों के लिए प्रतिदिन 60 रुपए के आसपास पड़ती है। किसान की कुल मजदूरी से किराए की मजदूरी कम करने पर दिन की मजदूरी 30 रुपए से कम पड़ती है। मालिक की हैसियत से तो किसान को कुछ मिलता ही नहीं, खेती में काम के लिए न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े भी इसी की पुष्टि करते हैं।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि बाजार में विकृति पैदा न हो इसलिए वह किसान को फसल का उत्पादन खर्च पर आधारित दाम नहीं दे सकती। महंगाई न बढेÞ, उद्योगपतियों को सस्ते कृषि उत्पाद मिलें, अंतरराष्ट्रीय बाजार में आयात-निर्यात स्पर्धा बनी रहे, विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को निभा सकें इसलिए वह फसलों की कीमत नहीं दे सकती। स्पष्ट है कि अन्य सभी को फायदा पहुंचाने और बाजार में ‘विकृति’ पैदा न हो इसलिए किसान का शोषण किया जा रहा है। बाजार व्यवस्था खुद एक लूट की व्यवस्था है, जो स्पर्धा के नाम पर बलवान को दुर्बल की लूट करने की स्वीकृति के सिद्धांत पर खड़ी है। बाजार व्यवस्था में बलवान लूटता है और कमजोर लूटा जाता है। बाजार में ‘विकृति’ पैदा न होने देने का अर्थ किसान को लूटने की व्यवस्था बनाए रखना है। जब तक किसान बाजार नामक लूट की व्यवस्था में खड़ा है उसे कभी न्याय नहीं मिल सकता। बाजार में किसान हमेशा कमजोर ही रहता है। एक साथ कृषि उपज बाजार में आना, मांग से अधिक की उपलब्धता, स्टोरेज का अभाव, कर्ज वापसी का दबाव, जीविका के लिए धन की आवश्यकता आदि सभी कारणों से किसान बाजार में कमजोर की हैसियत में ही खड़ा होता है। पूरी व्यवस्था किसान को लूटने के लिए बनाई गई है। खेती से जुड़ी हर गतिविधि में उसे लूटा जाता है। उनके लिए किसान एक गुलाम है जिसे वे उतना ही देना चाहते हैं जिससे वह पेट भर सके और मजबूर होकर खेती करता रहे। इसी के लिए कृषि नीतियां और आर्थिक नीतियां बनाई गई हैं और देश के नीति निर्धारक इसे बनाए रखना चाहते हैं। जब तक सत्ता में बैठे लोग किसान को मनुष्य नहीं सस्ते मजदूर के तौर पर देखते रहेंगे और उसके तहत नीतियां बनाते रहेंगे तब तक न किसान अपने बल पर कभी खड़ा हो पाएगा और न ही उसे कभी सचमुच जीने का अधिकार प्राप्त हो सकता है।

यह शोषणकारी व्यवस्था उद्योगपतियों, व्यापारियों और दलालों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है। कल तक यह लूट देशी लोगों के द्वारा होती थी, अब उसमें देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी शामिल किया गया है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां खेती-पूरक उद्योग और उसके व्यापार पर पहले ही कब्जा कर चुकी हैं, अब पूरी दुनिया की खेती पर कब्जा करना चाहती हैं। इसलिए विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के दबाव में सरकारें लगातार किसान-विरोधी नीतियां बनाती जा रही हैं। किसान का मुख्य संकट आर्थिक है। उसका समाधान किसान परिवार की सभी बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए एक न्यायसंगत व सम्मानजनक आय की प्राप्ति है। किसानों की समस्याओं का समाधान केवल उपज का थोड़ा मूल्य बढ़ा कर नहीं होगा बल्कि किसान के श्रम का शोषण, लागत की वस्तुओं की खरीद में हो रही लूट, कृषि उत्पाद बेचते समय व्यापारियों, दलालों द्वारा खरीद में या सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद में की जा रही लूट तथा बैंकों व बीमा कंपनियों द्वारा की जा रही लूट, इन सबको बंद करना होगा।

किसान, कृषि और गांव को स्वावलंबी और समृद्ध बनाने की दिशा में कृषि आधारित कुटीर व लघु उद्योगों को पुनर्जीवित करना होगा। जब खेती में काम नहीं होता है तब किसान को पूरक रोजगार की आवश्यकता होती है। भारत सरकार ने 1977 में 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। इस संरक्षण को नई आर्थिक नीतियां लागू करने के बाद धीरे-धीरे पूरी तरह से हटा लिया गया। उन्हें फिर से संरक्षित कर, असमानों के बीच स्पर्धा से बचने के लिए, देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उन वस्तुओं के उत्पादन पर पाबंदी लगानी होगी। कृषि उत्पादकों के लिए उत्पादन, प्रसंस्करण व विपणन की खातिर सरकारी और कॉरपोरेटी हस्तक्षेप से मुक्तएक सरल गांव-केंद्रित रोजगाराभिमुख नई सहकारी व्यवस्था बनानी होगी। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र-1948 में ऐसे पारिश्रमिक की परिकल्पना की गई है जो ‘कर्मी और उसके परिवार’ को गरिमा के साथ जीवन जीने का भरोसा दिलाती है। भारत ने भी इस पर हस्ताक्षर किए हैं। काम के बदले आजीविका-मूल्य प्राप्त करना हर व्यक्तिका मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। किसान को भी काम के बदले न्यायसंगत मूल्य मिलना चाहिए।

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