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राजनीति: मौजूदा विकास नीति बनाम पर्यावरण

ऐसे विकास को क्या कहें जिसकी वजह से संपूर्ण मानवता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए? जिस तरह मौसम परिवर्तन दुनिया में कृषि पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, उसे देखते हुए आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएंगी कि देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र में बने अंतर-सरकारी पैनल (आइपीसीसी) की पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु संकट के कारण एशिया को बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि और खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। भारत जैसे देश के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है जहां अधिकांश खेती मानसून पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरे दक्षिण एशिया में खाद्य पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। वैश्विक खाद्य उत्पादन धीरे-धीरे घट रहा है। एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ आने से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता और ढाका जैसे शहरों पर खतरा बढ़ सकता है। अब यह स्पष्ट है कि कोयला और उच्च कार्बन उत्सर्जन से भारत के विकास और अर्थव्यवस्था पर धीरे-धीरे बुरा असर पड़ेगा और देश में जीवन-स्तर सुधारने में प्राप्त उपलब्धियों पर पानी फिर जाएगा। इसलिए भारत सरकार को इस समस्या से उबरने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। तेल रिसाव और कोयला आधारित बिजली संयंत्र, सामूहिक विनाश के हथियार हैं। इनसे खतरनाक कार्बन उत्सर्जन का खतरा होता है। हमारी शांति और सुरक्षा के लिए इन्हें हटा कर अक्षय ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाना, अब हमारी जरूरत और मजबूरी दोनों बन गया है। सरकार को तुरंत इस पर कार्रवाई करते हुए स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी योजनाओं को लाना चाहिए। पिछले कुछ सालों से इस तरह की रिपोर्ट और चेतावनी बराबर आते रहने के बावजूद पर्यावरण का मुद्दा हमारे राजनीतिक दलों के एजंडे में शामिल नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों की भी प्राथमिकता सूची में पर्यावरण नहीं है। देश में हर जगह, हर तरफ, हर सरकार, हर पार्टी विकास की बातें करती है, लेकिन ऐसे विकास का क्या फायदा, जो लगातार विनाश को आमंत्रित करता है। ऐसे विकास को क्या कहें जिसकी वजह से संपूर्ण मानवता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए? जिस तरह मौसम परिवर्तन दुनिया में कृषि पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, उसे देखते हुए आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएंगी कि देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है।

भारत सहित पूरे एशिया में बेमौसम बरसात, ठंड, गर्मी, सूखे और भूकम्प आदि ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। ‘वर्ल्ड क्लाइमेट कांफ्रेंस डिक्लेरेशन एंड सपोर्टिंग डाक्युमेंट्स’ के अनुसार प्रौद्योगिकी के व्यापक विस्तार के कारण हवा में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। पूरी दुनिया जिस तरह कथित विकास की दौड़ में अंधी हो चुकी है, उसे देख कर तो यही लगता है कि आज नहीं तो कल मानव सभ्यता के सामने वजूद का संकट खड़ा होगा। प्राकृतिक आपदाओं का आना हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है कि अब भी समय है और हम जाग जाएं, नहीं तो कल कुछ भी नहीं बचने वाला। क्या हम विनाश की तरफ बढ़ रहे हैं या विनाश की शुरुआत हो चुकी है? लोगों को इस कथित विकास की बेहोशी से जगाने के उद््देश्य से ही 22 अप्रैल 1970 से धरती को बचाने की मुहिम अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन द्वारा पृथ्वी दिवस के रूप में शुरू की गई थी। लेकिन वर्तमान में यह दिवस आयोजनों तक सीमित रह गया है। तमाम देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है। पिछले दो साल में देश के कई इलाकों में कम वर्षा यानी सूखे की वजह से भारत के अधिकतर किसान बर्बादी के कगार पर खड़े हैं।

वहीं पिछले साल अचानक आई बेमौसम बारिश ने कहर ढाते हुए कई राज्यों की कुल पचास लाख हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद कर दी थी। मौसम में तीव्र परिवर्तन हो रहा है, ऋतु चक्र बिगड़ चुका है। मौसम के बिगड़े हुए मिजाज ने देश भर में समस्या पैदा कर दी है। देश में कृषि क्षेत्र में मचे हाहाकार का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, लेकिन लेकिन पर्यावरण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें संजीदा नहीं हैं, या कहें कि यह मुद््दा सरकार और राजनीतिक दलों के एजंडे में ही शामिल नहीं है। हाल में ही ‘वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव’ शीर्षक से ‘प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस’ में प्रकाशित एक शोधपत्र के नतीजों ने सरकार, कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। शोध के अनुसार, भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब तीस सालों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार पचास फीसद से कम रही। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी दस फीसद बदलाव में अहम भूमिका है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक और शोध की लेखिका जेनिफर बर्नी के अनुसार ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं।

समूचे विश्व में दो लाख चालीस हजार किस्म के पौधे और दस लाख पचास हजार प्रजातियों के प्राणी हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आइयूसीएन) की एक रिपोर्ट बताती है कि विश्व में जीव-जंतुओं की सैंतालीस हजार छह सौ सतहत्तर विशेष प्रजातियों में से एक तिहाई से अधिक प्रजातियों यानी पंद्रह हजार आठ सौ नब्बे प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। आइयूसीएन की ‘रेड लिस्ट’ के अनुसार स्तनधारियों की इक्कीस फीसद, उभयचरों की तीस फीसद और पक्षियों की बारह फीसद प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। वनस्पतियों की सत्तर फीसद प्रजातियों के साथ ताजा पानी में रहने वाले सरीसृपों की सैंतीस फीसद प्रजातियों और एक हजार एक सौ सैंतालीस प्रकार की मछलियों पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। यह सब इंसान के लालच और जगलों के कटाव के कारण हुआ है। गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिद्ध शहरों से ही नहीं, जंगलों से भी खत्म हो गए। निन्यानवे फीसद लोग नहीं जानते कि गिद्धों के न रहने से हमने क्या खोया।

लोग कहते हैं कि उल्लू से क्या फायदा, मगर किसान जानते हैं कि वह खेती का मित्र है, जिसका मुख्य भोजन चूहा है। भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों के संरक्षण और संवर्धन की बात है। इसीलिए अधिकांश हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के वाहन पशु-पक्षियों को बनाया गया है। एक और बात बड़े खतरे का अहसास कराती है कि एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। दुनिया चकाचौंध के पीछे भाग रही है। उसे तथाकथित विकास के अलावा कुछ और दिख ही नहीं रहा है। वास्तव में जिसे विकास समझा और कहा जा रहा है, वह विकास है ही नहीं। क्या सिर्फ औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी कर देने को विकास माना जा सकता है जबकि एक बड़ी आबादी को अपनी जिंदगी बीमारी और पलायन में गुजारनी पड़े। अब भी समय है कि हम सब चेत जाएं और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान दें, नहीं तो विनाश निश्चित है। वास्तव में पर्यावरण संरक्षण ऐसा ही है जैसे अपने जीवन की रक्षा करने का संकल्प। सरकार और समाज, दोनों को पर्यावरण के मसले पर गंभीर होना होगा, नहीं तो प्रकृति का कहर झेलने के लिए हमें तैयार रहना होगा।

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