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राजनीति: आपदा, विज्ञान और समाज

मौसम विभाग पूवार्नुमान लगाने वाले अपने सभी रडारों और उपकरणों-यंत्रों को दुरुस्त करे ताकि भविष्य में किसी तरह की चूक न हो। इसलिए और भी कि खतरा अभी टला नहीं है। मौसम विभाग ने कई राज्यों में आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है। राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि वे मौसम विभाग द्वारा जारी चेतावनी को शासन-प्रशासन के जरिए जनता तक पहुंचाएं तथा सुरक्षा का समुचित प्रबंध करें।

बीकानेर में आए रेत के तूफान की तस्वीर। (file Photo: PTI)

पिछले हफ्ते देश के विभिन्न क्षेत्रों में आए आंधी-तूफान, बारिश, ओले व बिजली गिरने से जन-धन का भारी नुकसान हुआ है। एक सौ बत्तीस किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से चली तूफानी हवा में सौ से ज्यादा लोगों की जान गई है और हजारों करोड़ रुपए की फसल नष्ट हुई है। मौसम विभाग की मानें तो यह भयावह तबाही का मंजर मौसम में आए अचानक बदलाव के कारण हुआ। आश्चर्य की बात यह है कि मौसम विभाग ने देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में मौसम खराब होने की चेतावनी तो जारी की थी लेकिन उसकी सूचना में उत्तर भारत का जिक्र नहीं था। जबकि तूफान से सर्वाधिक नुकसान उत्तर भारत को ही हुआ है। अगर मौसम विभाग ने पूर्वी और पूर्वोत्तर इलाकों के साथ-साथ उत्तर भारत को भी चेताया होता तो संभवत: लोगबाग सतर्क रहते और बड़े पैमाने पर जन-धन का नुकसान नहीं हुआ होता। इस तूफान का सर्वाधिक कहर उत्तर प्रदेश और राजस्थान को उठाना पड़ा है। दोनों राज्यों में मिलाकर सौ से अधिक लोगों की जान गई है। तूफान की विभीषिका के कारण स्मारकों में भी दरार आ गया है। उत्तर प्रदेश की तरह राजस्थान में भी भारी तबाही मची है। बताया जा रहा है कि मौसम की घटनाओं का सटीक पूवार्नुमान लगाने वाला जयपुर स्थित डॉप्लर राडार काम नहीं कर रहा था। अगर यह सच है तो फिर यह मौसम विभाग की घोर लापरवाही ही कही जाएगी। उचित होगा कि मौसम विभाग पूवार्नुमान लगाने वाले अपने सभी राडारों और उपकरणों-यंत्रों को दुरुस्त करे ताकि भविष्य में किसी तरह की चूक न हो। इसलिए और भी कि आंधी व तूफान का खतरा अभी टला नहीं है। मौसम विभाग ने देश के कई राज्यों में आंधी-तूफान व तेज हवाएं चलने की चेतावनी जारी की है। राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि वे मौसम विभाग द्वारा जारी चेतावनी को शासन-प्रशासन के जरिए जनता तक पहुंचाएं तथा सुरक्षा का समुचित प्रबंध करें। नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा थमा देना ही हल नहीं है। इसलिए कि हर वर्ष ऐसे आंधी-तूफान आते हैं और तबाही मचती है। अगर फसलें ऐसे ही तेज आंधी व तूफान की भेंट चढ़ती रहीं तो न सिर्फ किसानों की माली हालात खराब होगी बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

इसमें दो राय नहीं कि विगत वर्षों में मौसम विभाग ने मौसम का पूर्वानुमान लगाने में काफी हद तक सफलता अर्जित की है और स्पेस टेक्नॉलाजी में भी सुधार हुआ है। लेकिन मौसम के पल-पल बदलने का आकलन करने में मौसम वैज्ञानिकों को अभी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। इस दिशा में कारगर प्रयास की जरूरत है। दुनिया के कई देशों ने मौसम के पूवार्नुमान के लिए उन्नत तकनीकी विकसित कर ली है जिसके जरिए वे अपने नागरिकों को मौसम की सटीक जानकारी देने में सफल हैं। भारत में मौसम की सटीक जानाकरी न होने के कारण ही कई बार भीषण तबाही का मंजर देखने को मिला है। याद होगा अठारह साल पहले, नवंबर 1999 में, ओड़िशा में प्रचंड चक्रवात (सुपर साइक्लोन) आया था, जिसकी सटीक भविष्यवाणी न होने से जान-माल का भारी नुकसान हुआ था। इस तूफान में हजारों लोग मारे गए थे और सैकड़ों गांव मरघट में बदल गए थे। साथ ही, हजारों हेक्टेयर की फसलें बर्बाद हुर्इं। तूफान गुजर जाने के बाद हजारों लोग बीमारियों की जद में आए और सैकड़ों लोग काल का ग्रास बने। सटीक पूवार्नुमान के अभाव में ही 1990 में आंध्र प्रदेश में मछलीपट्टम में आए तूफान की वजह से एक हजार से अधिक लोगों की मौत हुई और चालीस लाख से ज्यादा मवेशी मारे गए। नवंबर 1996 में आंध्र प्रदेश में ही तूफान से हजारों लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हुए। जून 1998 में गुजरात के पोरबंदर-जामनगर में तूफान से लगभग बारह सौ लोग मारे गए और सैकड़ों लोग लापता हो गए। सटीक भविष्यवाणी के अभाव में 24 दिसंबर 2004 को हिंद महासागर में विनाशकारी भूकम्प के कारण दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के तटवर्ती इलाकों में उठे समुद्री तूफान यानी सुनामी ने डेढ़ लाख से अधिक लोगों को लील लिया था। इस समुद्री भूकम्प ने भारत में भी भयंकर तबाही मचाई। सुनामी का तांडव तमिलनाडु के तट पर सर्वाधिक भयावह रहा जहां तीन हजार से अधिक लोग मारे गए। समुद्री मछुआरों का शहर कहा जाने वाला नागपट्टिनम पूरी तरह तबाह हो गया। पुदुच्चेरी, आंध्र प्रदेश और केरल में भी सैकड़ों लोग मारे गए। लाखों एकड़ की फसलें जलमग्न हो गर्इं।

भारत में चक्रवाती तूफान आने का समय अप्रैल से दिसंबर के बीच होता है। लिहाजा, मौसम विभाग को सतर्क रहते हुए अपने राडारों व उपकरणों को दुरुस्त कर लेना चाहिए ताकि लोगों तक सटीक जानकारी पहुंच सके। मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा समुद्रतटीय इलाकों को चक्रवाती तूफानों का अधिक सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि समुद्रतटीय राज्य तूफानों से बचाव के लिए विशेष स्थायी उपाय ढूंढेंÞ। समुद्रतटीय राज्यों की सरकारों को चाहिए कि इन इलाकों में रहने वाले लोगों को तूफान से बचाने के लिए स्थायी रूप से चक्रवात-रोधी ढांचों का निर्माण करें। चूंकि इन ढांचों के निर्माण में ज्यादा धन की आवश्यकता पड़ेगी और राज्य सरकारों के लिए अकेले वहन करना कठिन है, ऐसे में केंद्र सरकार की भूमिका बढ़ जाती है। केंद्र को आगे आकर राज्य सरकारों को मदद करनी चाहिए। चक्रवाती तूफानों के मद््देनजर यह आवश्यक है कि सरकारें समुद्रतटीय क्षेत्रों में लोगों को फूस की छतों वाले कच्चे घर बनाने की अनुमति न दें। इसलिए कि कमजोर घर तूफान के कहर के आगे टिक नहीं पाते और लोग दब कर मर जाते हैं। चक्रवाती हवाओं से सामान्यतया तूफानी लहरें उठती हैं जिससे तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाता है। अत: ऐसी स्थिति में आवास किसी ऊंचे स्थान पर हों तो अच्छा है। चूंकि समुद्रतटीय इलाकों में चक्रवात आने की आशंका बराबर बनी रहती है, लिहाजा इन इलाकों में वैसे मौकों के लिए शरणस्थलों का निर्माण किया जाना चाहिए। ओड़िशा, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश को इस प्रकार के शरणस्थलों के विकास पर पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है।
इसके अलावा, चक्रवाती तूफानों का सामना करने के लिए सबसे कारगर रणनीति है कि उनके मार्ग में ऐसे विशेष पेड़ लगाए जाएं जिनकी जड़ें मजबूत हों और पत्तियां सूई जैसी हों। ये पेड़ न उखड़ें इसके लिए उनके चारों ओर बाड़ लगाया जाना चाहिए। बेहतर होगा कि वृक्षों की ऐसी हरित पट्टियां पूरे तटीय क्षेत्र में विकसित की जाएं। सामान्य चक्रवात वायुमंडलीय प्रक्रिया है, पर जब ये पवन प्रचंड गति से चलते हैं तो विकराल आपदा का रूप धारण कर लेते हैं। आज तक इन चक्रवाती तूफानों की उत्पत्ति के विषय में कोई सर्वमान्य सिद्धांत नहीं बन पाया है।

अमूमन माना जाता है कि गर्म इलाकों के समुद्र में सूर्य की भयंकर गर्मी से हवा गर्म होकर बहुत ही कम वायुदाब का क्षेत्र बना देती है। इसके बाद हवा गर्म होकर तेजी से ऊपर आती है और ऊपर की नमी से संतृप्त होकर संघनन से बादलों का निर्माण करती है। इस जगह को भरने के लिए नम हवाएं तेजी से नीचे जाकर ऊपर उठती हैं और ये हवाएं बहुत तेजी से इस क्षेत्र के चारों तरफ घूम कर बिजली कड़कने के साथ मूसलाधार बारिश कराती हैं। बहरहाल, चक्रवाती तूफानों की पूर्व सूचना की तकनीक को और कारगर बनाए जाने की जरूरत है।

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