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राजनीति : उत्सव की तरह हो मानसून का स्वागत

हमने अगर बरसात के पानी के संग्रहण का महत्त्व नहीं समझा तो दुनिया में सर्वत्र पानी की किल्लत एक बड़ी समस्या होगी। भारत जैसे देशों को तो इस समस्या के प्रति और संवेदनशील होने की आवश्यकता है, क्योंकि जहां एक तरफ आबादी में लगातार वृद्धि हो रही है, वहीं हमारे परंपरागत जल स्रोत उपेक्षा के कारण दम तोड़ते जा रहे हैं।

Author June 15, 2018 3:44 AM
पहली बारिश के समय इस तालाब में स्नान किया जा सकता था, लेकिन उसके बाद स्नान प्रतिबंधित था।

अतुल कनक

इस वर्ष मानसून केरल के तट पर अपेक्षा से तीन दिन पहले ही पहुंच गया। कर्नाटक में तो मानसून की पहली ही बरसात ने सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया और बाढ़ जैसे हालात उत्पन्न कर दिए। यह वही कर्नाटक है जिसके बंगलुरु शहर के गिरते भूजल स्तर के कारण अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भी चिंता जाहिर की गई है। ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि वहां मानसून के आगमन के पहले ही वर्षा जल संग्रहण के पर्याप्त बंदोबस्त किए जाते। लेकिन दुर्योग से हमारी आधुनिक जिंदगी की प्राथमिकताओं में बरसात के पानी को सहेजने की चेतना नहीं बची। यही कारण है कि जहां एक ओर अधिकांश शहरों में भूजल स्तर खतरनाक ढंग से गिरता जा रहा है, वहीं बरसात के पानी को संग्रहित करने के लिए सामुदायिक स्तर पर ठोस प्रयास नहीं हो रहे। इस दृष्टि से हमारे पुरखों की चेतना का विश्लेषण सुखद आश्चर्य पैदा करता है। पश्चिमी राजस्थान को मरुधरा भी कहा जाता है। सामान्य तौर पर मरुधराओं में रेत के अपरिमित प्रसार के कारण सामान्यजन को अपनी आवश्यकता का पानी जुटाने के लिए बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन आवश्यकता समुचित प्रबंध नीतियों की प्रेरक होती है। पश्चिमी राजस्थान में बारिश के जल को संग्रहित करने के लिए जोहड़, तालाब, कुंए, टांकों के पर्याप्त प्रबंधन के लिए इस तरह की लोकरीतियां विकसित की गई हैं कि अपेक्षाकृत कम बरसात के बावजूद वर्षपर्यंत आमजन को ही नहीं, पशुधन को भी आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त पानी उपलब्ध होता है। इस प्रबंधन का मूल सिद्धांत है- पानी का अपव्यय रोकना और परंपरागत जल स्रोतों को सहेजे रखना। बस, यही सीख सभ्य कहे जाने वाले संसार को मरुधरा के जीवन से लेनी होगी।

पश्चिमी राजस्थान के ही जैसलमेर शहर में एक तालाब है गड़सीसर। रियासतकाल में मानसून के पहले राजा स्वयं गड़सीसर की सार-संभाल के लिए श्रमदान करने आते थे। पहली बारिश के समय इस तालाब में स्नान किया जा सकता था, लेकिन उसके बाद स्नान प्रतिबंधित था। सारा समाज इस अनुशासन का पालन करता है। इस लोकरीति का एक ही मंतव्य है कि प्रकृति से प्राप्त वरदान को अनावश्यक आमोद-प्रमोद की मानसिकता से बचाया जाए। पश्चिमी राजस्थान में ही क्यों, समूचे देश में प्राचीनकाल में कुंड, कुंए, बावड़ी, जोहड़, झील, तालाब जैसे जल संग्रहण स्रोत बनवाना बहुत ही पुण्य का काम माना जाता था और सामर्थ्यवान लोग किसी भी शुभ अवसर पर इस जल संग्रहण स्रोतों का निर्माण करवाना अपने लिए सुख का अवसर समझते थे। ये परंपरागत जल स्रोत न केवल लोगों को उनकी आवश्यकतानुसार सिंचाई और घरेलू उपयोग के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध करवाते थे, अपितु अपने अस्तित्व में वर्षा जल संचित रख कर भूजल स्तर को बनाए रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाया करते थे। लेकिन पानी जब से नलों में होकर घरों तक पहुंचा, लोगों ने पानी के सदुपयोग की आवश्यकता को भुला दिया। शायद इसीलिए महाभारत में कहा गया है कि ‘अति परिचयाद् अवज्ञा भवति’, यानी गहन परिचय कई बार उपेक्षा का कारक बनता है। पानी के साथ भी यही हुआ। जब यह सहजता से उपलब्ध होने लगा तो लोगों ने न केवल पानी का दुरुपयोग शुरू कर दिया, बल्कि परंपरागत जल स्रोतों को भी या तो उपेक्षा के अंधेरे में धकेल दिया या फिर जमीन के लिए बढ़ते लालच ने उनकी बलि ले ली। आज अधिकांश पुरानी बावड़ियां, कुंए, कुंड अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाते प्रतीत होते हैं। तालाबों की जमीन पर कब्जा करके उन्हें सिमटने पर मजबूर कर दिया गया है। दक्षिण- पूर्वी राजस्थान के कोटा शहर में बूंदी के राजकुमार धीरदेह ने चौदहवीं सदी के प्रारंभ में तेरह तालाब बनवाए थे। कोटा शहर हाड़ौती के पठार के सबसे निचले स्तर पर बसा है और पठार के ऊपरी हिस्से में बहने वाला पानी जब तेजी से नीचे की ओर आता था, तो बस्तियों को नुकसान पहुंचता था। पानी के इसी प्रवाह के मार्ग में राजकुमार धीरदेह द्वारा बनवाए गए तालाब न केवल पानी की गति को थाम लेते थे, बल्कि अपने अंतस में वर्षा जल संग्रहित करके बस्तियों की जरूरत भी पूरी किया करते थे।

लेकिन पिछले चार दशकों में विकास के नाम पर हुए अनियोजित नगर नियोजन ने अधिकांश तालाबों का अस्तित्व खत्म कर दिया। कहीं तालाब पाट कर बाजार बना दिए गए, तो कहीं बस्तियां उग आर्इं। पठार से आने वाले पानी को सीधे चंबल नदी में प्रवाहित करने की व्यवस्था कर दी गई। अब बरसात के दिनों में पठार के ऊपरी हिस्से पर बरसे पानी के प्रकोप से तो शहर बच गया, लेकिन जमीन की तृषा को तृप्त करने का उपाय नहीं बचा। यही कारण है कि सदासलिला चंबल के किनारे होने के बावजूद दक्षिण पूर्वी राजस्थान में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। अधिकांश पंचायत समितियां भूजल की दृष्टि से ‘डार्क जोन’ में हैं और फिर भी बोरिंग के माध्यम से भूजल का अंधाधुंध अवैध दोहन हो रहा है। पानी जीवन का आधार है। रहीम ने कहा था- बिन पानी सब सून। लेकिन हम पानी को पवित्र मानते हुए भी उसकी महत्ता को अनदेखी करते रहे हैं। वैज्ञानिकों की यह आशंका निर्मूल नहीं है कि कहीं अगला विश्वयुद्ध पानी के मुद्दे पर ही नहीं हो। कुछ लोगों को यह बात आश्चर्यजनक लग सकती है कि पृथ्वी का दो तिहाई से अधिक हिस्सा पानी से आच्छादित है, फिर पानी को लेकर इतनी हाय तौबा क्यों? लेकिन जब हम यह जानेंगे कि दुनिया में उपलब्ध कुल जल भंडारण में लगभग एक प्रतिशत जल ही मनुष्य पीने के काम ले सकता है तो हमें स्थिति का कुछ अनुमान हो सकेगा। लेकिन इस एक प्रतिशतजल का भी एक बड़ा हिस्सा सिंचाई आदि कामों में व्यय हो जाता है। यह जो मनुष्य के लिए उपयोगी एक प्रतिशत जल है- वह नदी, कुंओं, तालाब, झीलों जैसे जलसंग्रहण क्षेत्रों में संचित है और इस संचय में अभिवृद्धि का एक ही माध्यम है- वर्षा। ऐसे में वर्षा जल संग्रहण के प्रति हमारी जागरूकता सारी मानव सभ्यता के लिए महत्त्वपूर्ण कारक हो सकती है।

समस्त तैयारियों के साथ मानसून का स्वागत इसलिए भी आवश्यक है कि यही वह मौसम है जो हमें भविष्य की जरूरत के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध करा सकेगा। वरना पानी की कमी क्या गुल खिला सकती है, इसे कुछ समय पहले दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर ने भुगता है और पिछले दिनों भारत के शिमला शहर के निवासियों ने भी। लेकिन यह किसी एक या दो शहर की चिंता का विषय नहीं है। हमने अगर बरसात के पानी के संग्रहण का महत्त्व नहीं समझा तो दुनिया में सर्वत्र पानी की किल्लत एक बड़ी समस्या होगी। भारत जैसे देशों को तो इस समस्या के प्रति और संवेदनशील होने की आवश्यकता है, क्योंकि जहां एक तरफ आबादी में लगातार वृद्धि हो रही है, वहीं हमारे परंपरागत जल स्रोत उपेक्षा के कारण दम तोड़ते जा रहे हैं। अधिकारिक तौर पर यह माना जा रहा है कि पिछले कुछ दशकों में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में तेजी से कमी हुई है। कहते हैं कि प्रकृति के पास सबकी जरूरत पूरी करने के साधन हैं, लेकिन वह किसी का स्वार्थ पूरा नहीं कर सकती। प्राचीनकाल में मानसून के आगमन के पूर्व समाज वर्षा जल संग्रहण के लिए विशेष तैयारियां करता था। इन्हीं तैयारियों ने बाद में अनुष्ठान का रूप लिया। वर्षा के लिए इंद्र की विशेष मनुहार की जाती थी और यह मनुहार का अनुष्ठान किसी महोत्सव से कम नहीं होता था। उत्सव की यह चेतना हमें अवसर के प्रति सजग और संवेदनशील बनाती है। मानसून का आगमन एक अवसर है जब हम पानी की महत्ता को समझें और वर्षा जल संग्रहण के प्रति सार्थक और संवेदनशील पहल करें।

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