ताज़ा खबर
 

राजनीति: वुहान से जगी उम्मीदें और संशय

ट्रंप के संरक्षणवादी फैसलों ने चीन को परेशान कर दिया है। ऐसे में चीन नए बाजार की तलाश में है। भारत निश्चित तौर पर चीन के लिए एक बड़ा बाजार है। दूसरी तरफ ट्रंप की संरक्षणवादी नीति भारतीय अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाएगी। भारतीय निर्यात भी इससे प्रभावित होगा। जो कुछ उम्मीद मोदी ने ट्रंप से की थी, उस पर ट्रंप खरे नहीं उतरे। भारत अमेरिका के साथ कई मोर्चों पर सहयोग चाहता है। लेकिन ट्रंप ने निराश किया।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फोटो)

वुहान के अनौपचारिक शिखर सम्मेलन की तैयारी इस साल की शुरुआत में हो गई थी। वुहान में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई, तो चीन ने फिर से भारत-चीन के पुराने सांस्कृतिक संबंधों और आर्थिक सहयोग की बात की। बातचीत के नए ढांचे पर भी विचार-विमर्श किया गया, जिसमें विशेष मुद्दों से दूर रह कर सिर्फ सहयोग के सिद्धांत पर बातचीत की जाएगी। जिनपिंग और मोदी ने इस अनौपचारिक बैठक को नए अध्याय की शुरुआत बताया। मोदी ने जोर देकर कहा कि विश्व की कुल अर्थव्यवस्था में दोनों मुल्कों की भागीदारी पचास प्रतिशत है। दोनों देशों की कुल आबादी का भी हवाला दिया गया। लेकिन इस बैठक के कितने सकारात्मक परिणाम भविष्य में निकलेंगे इस पर बहस हो रही है। फिलहाल इसे विश्वास बहाली का प्रयास कहेंगे। शायद दोनों मुल्कों की कुछ मजबूरियां भी हैं, कुछ अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम है, जिस कारण साथ बैठना जरूरी था। वैसे कहा जा सकता है कि इतिहास को दुहराया गया है। ठीक उसी तरह जब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन और अमेरिका के बीच विश्वास बहाली को लेकर फरवरी 1972 में चीन की यात्रा की थी। शीतयुद्ध के दौरान निक्सन चीन से संबंधों को ठीक कर अमेरिका ही नहीं पूरे विश्व को संदेश देना चाहते थे। लेकिन निक्सन ही क्यों? निक्सन की तर्ज पर भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दिसंबर 1988 में चीन का दौरा कर अविश्वास की बर्फ को पिघलाने की कोशिश की थी। वैसे विश्वास बहाली की इन तीनों यात्राओं में खासी समानता है। रिचर्ड निक्सन को भी चीन की यात्रा के बाद अमेरिका में उसी साल चुनावों का सामना करना था। राजीव गांधी को भी ठीक अगले साल 1989 में चुनावों का सामना करना था। अब नरेंद्र मोदी को भी ठीक एक साल बाद 2019 में चुनावों को सामना करना है। राजीव गांधी ने चीन यात्रा के दौरान महत्त्वपूर्ण बातें की थीं। उन्होंने कहा था कि दोनों मुल्कों के बीच काफी काम किया जाना है। दोनों मुल्कों के बीच कुछ समस्या है। उम्मीद है कि दोनों मुल्क इस समस्या को हल करेंगे। मौके पर मौजूद चीनी नेता देंग श्याओ पिंग ने कहा था कि राजीव गांधी की यात्रा दोनों मुल्कों के बीच संबंध सुधारने का एक ईमानदारी भरा प्रयास है।

मोदी और जिनपिंग की जब वुहान में मुलाकात हुई तो ठीक वैसी ही स्थिति पैदा हुई जैसी राजीव गांधी के साथ हुई थी। उस समय राजीव गांधी को विपक्ष की आलोचना का शिकार होना पड़ा था। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी पर देश-हित को बेचने का आरोप लगाया था। मोदी जब वुहान में जिनपिंग से मिल रहे थे, राहुल गांधी ने उनकी आलोचना की। हालांकि यह सच्चाई है कि दोनों मुल्कों के बीच चले आ रहे विवाद सिर्फ एक बैठक में हल नहीं होंगे। लेकिन शुरुआत तो कहीं से करनी होगी। कई मसलों पर अड़ियल रवैया समाप्त करना होगा। डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों से परेशान चीनी राष्ट्रपति ने वुहान में परंपरा तोड़ी। वे एक अनौपचारिक बैठक में पहली बार किसी विदेशी राजनेता की अगवानी के लिए चीन की राजधानी से बाहर आए। लेकिन जिनपिंग की भी मजबूरी को समझें। जिस दिन वे वुहान में मोदी की अगवानी के लिए पहुंचे, उसी दिन दक्षिण और उत्तर कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष अपनी कट्टर दुश्मनी को भुला कर सीमा पर मिल रहे थे। निश्चित तौर पर यह चीन के लिए असहज स्थिति है, क्योंकि चीन कभी भी पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी की तर्ज पर कोरियाई एकीकरण नहीं चाहेगा। चीन से विश्वास बहाली के लिए राजग सरकार ने दलाई लामा से दूरी बनाई। नौकरशाहों और सत्तापक्ष के राजनीतिकों को दलाई लामा के कार्यक्रमों से दूर रहने को कहा गया। लेकिन कई और मुद््दे हैं, जो कि पेचीदा भी हैं। इन्हें हल करना आसान नहीं होगा। जिनपिंग के सामने घरेलू मोर्चे पर वे चुनौतियां नहीं हैं, जो भारतीय प्रधानमंत्री के सामने हैं। अपनी वैश्विक आर्थिक नीतियों के कारण जिनपिंग चीन में काफी मजबूत हो गए हैं। जबकि भारतीय प्रधानमंत्री के सामने आर्थिक मोर्चे पर कई चुनौतियां हैं। ढुलमुल अमेरिकी नीतियों ने भारत को फंसा रखा है। दूसरी तरफ 13 खरब डॉलर की चीन की अर्थव्यवस्था हकीकत है। चीन पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश में घुसपैठ कर चुका है। इन पड़ोसी देशों में चीन की लगातार बढ़ती पैठ ने भारत के सामने नई रणनीतिक और कूटनीतिक समस्याएं खड़ी की हैं। शी की बेहद महत्त्वाकांक्षी योजना बीआरआइ यानी बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव भी भारत के लिए परेशानी का सबब है, क्योंकि बीआरआइ के तहत चीन पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में आर्थिक गलियारे का निर्माण कर रहा है। दोनों मुल्कों के बीच सीमा विवाद कई दशकों से है। यह विवाद देखने में द्विपक्षीय लगता है, पर है पांच पक्षीय। भारत-चीन सीमा विवाद में कहीं न कहीं पाकिस्तान, भूटान और नेपाल पक्ष बन जाते हैं। डोकलाम विवाद के दौरान भूटान एक पक्ष था। हिमालय क्षेत्र की मुश्किल भौगोलिक स्थिति भारत-चीन सीमा विवाद में पाकिस्तान, नेपाल और भूटान को भी शामिल करती है। इसके अलावा भारत-चीन के बीच कई और गंभीर विवाद हैं। विवाद, एशियाई क्षेत्र में सर्वोच्चता हासिल करने को लेकर है। विवाद, नदियों के पानी को लेकर है। विवाद, हिंद महासागर से लेकर फारस की खाड़ी तक में वर्चस्व हासिल करने को लेकर भी है। विवाद, चीन के साथ भारत के भारी व्यापार घाटे को लेकर है। 2017 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 52 अरब डॉलर पर पहुंच गया। भारत के लगातार आग्रह के बाद भी चीन व्यापार संतुलन को ठीक करने को तैयार नहीं।

एक अहम मसला तिब्बत से निकलने वाली नदियों के पानी का भी है। भारत समेत कई एशियाई देशों की जीवन रेखा तिब्बत से निकलने वाली नदियां हैं। ब्रह्मपुत्र और सतलुज के पानी पर पूर्वी और उत्तर भारत निर्भर हैं। मेकांग नदी के पानी पर लाओस, थाईलैंड और विएतनाम निर्भर हैं। नदियों को लेकर चीन की नीति बड़ी निर्मम है। चीन ब्रह्मपुत्र और मेकांग नदी पर बांध बना कर पानी रोक रहा है। इससे पड़ोसी मुल्कों में सूखे की स्थिति पैदा हुई है। डोकलाम विवाद के दौरान सतलुज और ब्रह्मपुत्र के जल प्रवाह के आंकड़े चीन ने भारत को देने बंद कर दिए थे। वुहान बैठक से पहले चीन ये आंकड़े फिर से भारत के साथ साझा करने को राजी हुआ। वैसे वुहान बैठक से चीनी हित भी जुड़े हैं। चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ की सफलता भारत के रुख पर निर्भर करेगी। इसका अहम हिस्सा चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर है। इसमें चीन अरबों डॉलर का निवेश कर चुका है। लेकिन यह निवेश भारतीय संप्रभुता को चुनौती है। क्योंकि कॉरिडोर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बलतिस्तान से गुजर रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा तभी व्यावसायिक रूप से सफल होगा जब भारत-अफगानिस्तान का व्यापार पाकिस्तान के रास्ते शुरू होगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संरक्षणवादी फैसलों ने चीन को परेशान कर दिया है। चीनी स्टील, सोलर पैनल और अल्युमीनियम पर आयात शुल्क बढ़ाने के ट्रंप के फैसले से चीन परेशान है। वैसे में चीन नए बाजार की तलाश में है। भारत निश्चित तौर पर चीन के लिए एक बड़ा बाजार है। दूसरी तरफ ट्रंप की संरक्षणवादी नीति भारतीय अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाएगी। भारतीय निर्यात भी इससे प्रभावित होगा। जो कुछ उम्मीद मोदी ने ट्रंप से की थी, उस पर ट्रंप खरे नहीं उतरे। भारत अमेरिका के साथ कई मोर्चों पर सहयोग चाहता है। लेकिन ट्रंप ने निराश किया।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App