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राजनीति: जोड़ना होगा नदियों को

भले ही नदियों को जोड़ने की संकल्पना को साकार करना आसान नहीं है, लेकिन पानी की किल्लत और बाढ़ से मुक्ति पाने का यही सबसे अच्छा विकल्प है। मौजूदा समय में जल संकट, बाढ़, सूखा आदि समस्याओं से निपटने के लिए इस तरह की परियोजनाओं को भारत में लागू करना अति आवश्यक है, क्योंकि आपदाओं से होने वाला आर्थिक नुकसान एवं जान-माल की क्षति नदियों को जोड़ने में होने वाले खर्च और विस्थापितों के दुख-दर्द से कहीं अधिक है।

सोनल छाया

जलवायु परिवर्तन, जल एवं अर्थव्यवस्था पर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जल संकट के कारण विश्व के देशों का आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। लोगों के विस्थापन में तेजी आ सकती है। यह समस्या विश्व को जल्द ही अपनी गिरफ्त में लेने वाली है। जलवायु परिवर्तन से जल संकट बढ़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ती आय और शहरों के विस्तार से पानी की मांग में भारी बढ़ोतरी हो रही है, जबकि जल आपूर्ति की कोई ठोस व्यवस्था कहीं नहीं है। इस रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वक्त में भारत में लोगों को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ेगा। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत में औसत से कम बारिश होने पर संपत्ति से जुड़े झगड़ों में हर साल अमूमन चार फीसद की बढ़ोतरी हो रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात में जब जमीन के नीचे पानी का स्तर गिरने से सिंचाई के लिए पानी महंगा हो गया तो किसान फसल प्रणाली में बदलाव और पानी के बेहतर उपयोग का रास्ता अपनाने के बजाय शहरों की ओर विस्थापन करने लगे।

जल संसाधन का बेहतर प्रबंधन नहीं करने पर बड़ी आबादी वाले देशों में आर्थिक वृद्धि में रुकावट आ सकती है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सभी देश आने वाले समय में पानी के दीर्घकालिक प्रबंधन के लिए ठोस नीतियां बनाएं और उन्हें लागू करें। विश्व बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री रिचर्ड दमानिया के अनुसार मानसून के संबंध में लोगों के अनुमानों में एकरूपता नहीं है। भारत में जलसंकट की व्यापकता के बारे में जानकार अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं, लेकिन इतना तो तय है भारत की स्थिति दयनीय रहेगी। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज पूरी तरह से गड़बड़ा जाएगा। बहरहाल, जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण आदि के कारण पानी की मांग बढ़ेगी। भारत का मौसम विविधतापूर्ण है, जिसमें उतार-चढ़ाव की स्थिति लगातार बनी रहती है। यहां के किसी भी प्रदेश में गर्मी के दिनों में महाराष्ट्र की तरह सूखा पड़ सकता है, तो बारिश के मौसम में बिहार की तरह बाढ़ आ सकती है। दोनों ही स्थितियों में व्यापक पैमाने पर जान-माल की क्षति का होना निश्चित है। ऐसे में नदियों को आपस में जोड़ कर इस तरह की आपदा से निजात पाई जा सकती है। इसकी मदद से खाद्यान्न संकट, सिंचाई के रकबे में बढ़ोतरी और बिजली की कमी को दूर किया जा सकता है। चीन ने भी नदियों को आपस में जोड़ने की अहमियत समझी है। गौरतलब है कि चीन की नदियों को नहरों के माध्यम से जोड़ने की परिकल्पना लगभग पांच दशक पुरानी है, लेकिन ऐसी परियोजना की सफलता के प्रति आशंका की वजह से इसे अभी तक लागू नहीं किया जा सका था। बाढ़ और सूखे की मार से बेदम होकर चीन ने अंतत: इस दिशा में आगे जाने का फैसला किया।

भारत में नदियों को जोड़ने की दिशा में लंबे समय से काम किया जा रहा है। बिहार में बूढ़ी गंडक, नोन, बाया और गंगा नदी को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव है। इस परियोजना के पूरा होने पर समस्तीपुर, बेगूसराय और खगड़िया जिलों को बाढ़ और सूखे से निजात मिल सकेगी। साथ ही, इससे ढाई लाख एकड़ क्षेत्र की सिंचाई भी हो सकेगी। भारत में सबसे पहले 1972 में 2640 किलोमीटर लंबी नहर के माध्यम से गंगा और कावेरी को जोड़ने का प्रस्ताव तत्कालीन सिंचाई मंत्री केएल राव ने रखा था। इस प्रस्ताव के आलोक में 1974 में डीजे दस्तूर गारलेंड नहर परियोजना लेकर सामने आए, लेकिन हमारे देश में नदियों को जोड़ने की दिशा में शुरुआती पहल आर्थर कॉटन ने की थी। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक चरण में कॉटन देश में बहने वाली सभी नदियों को आपस में जोड़ना चाहते थे, लेकिन उनका मकसद कृषि क्षेत्र को विकसित करना या प्रदेशों को बाढ़ और सूखे से बचाना नहीं था। वे इस तरह की परियोजनाओं को लागू करके भारत पर अंग्रेजी राज की पकड़ को मजबूत बनाना चाहते थे। इसी क्रम में 1982 में नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी (एनडब्लूडीए) का गठन किया गया, जिसका काम प्रस्तावित परियोजनाओं की सफलता से जुड़ी संभावनाओं को तलाशना और उन्हें अमलीजामा पहनाना था। एक परियोजना के अंतर्गत हिमालय से निकलने वाली उत्तर भारत और दक्षिण भारत की नदियों को आपस में नहर के माध्यम से जोड़ना था। इसके तहत उत्तर भारत में बांधों और नहरों की शृंखला के द्वारा गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी आदि की सहायता से प्रारंभिक चरण में दो लाख बीस हजार वर्ग किलोमीटर में सिंचाई और तीस गीगाबाईट बिजली उत्पादन करने जैसे कार्यों को मूर्त रूप देने की परिकल्पना की गई थी। दक्षिण भारत की पेनिनसुलर नदियों में महानदी, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी आदि को जोड़ने की बात कही गई थी। दूसरे चरण में पश्चिम दिशा में मुंबई की तरफ बहने वाली नदियों और दक्षिण दिशा में तापी नदी को जोड़ने का प्रस्ताव था। तीसरे चरण में मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त इलाकों में पानी उपलब्ध कराने के लिए केन और चंबल नदी को जोड़ने की परिकल्पना की गई। पश्चिम दिशा की तरफ पश्चिमी घाट के किनारे से बहती हुई अरब सागर में मिलने वाली नदियों का मार्ग बदल कर एक लाख तीस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सिंचाई करने और चार गीगाबाईट बिजली उत्पादन करने की योजना बनाई गई। लेकिन पैसे की कमी, पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं, भूमि प्रयोग और क्षेत्रीय वातावरण में होने वाले संभावित बदलाव, कृषि पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव, बड़ी संख्या में विस्थापन की आशंका, भूमि अधिग्रहण आदि समस्याओं के कारण नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

नदियों को आपस में जोड़ने वाली देश की पहली परियोजना का उद्घाटन नवंबर, 2012 में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के उज्जैनी गांव के क्षिप्रा टेकरी में किया गया। इस परियोजना के तहत नर्मदा और क्षिप्रा को आपस में जोड़ना था, ताकि क्षिप्रा नदी का पुनरुद्धार किया जा सके। इकीसवीं सदी के आरंभिक चरण में गंगा को ब्रह्मपुत्र से, गंगा को पुन: महानदी और गोदावरी से, गोदावरी को कृष्णा, पेन्नार और कावेरी से, नर्मदा को तापी से और युमना को साबरमती से जोड़ने की योजना थी। महाराष्ट्र और गुजरात के बीच दमन, गंगा एवं पिंजाल को भी आपस में जोड़ने का प्रस्ताव था। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय नदियों को आपस में जोड़ने के मुद्दे पर अपनी नाराजगी जता चुका है। उसका मानना है कि इस तरह की कोई भी योजना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इस तरह की परियोजनाओं को पूरा करने के क्रम में कभी भी समय-सीमा का ध्यान नहीं रखा जाता है, जिससे परियोजना की लागत में बेहिसाब इजाफा होता है और उक्त परियोजना का पूरा होना असंभव हो जाता है। इस तरह की परियोजनाओं के लिए जमीन की काफी आवश्यकता होती है। भूमि अधिग्रहण आज एक गंभीर मसला है, जिसका समाधान आसान नहीं है। इस क्रम में बड़े स्तर पर विस्थापन की जरूरत होती है। इसके अलावा आज पर्यावरण ऐसा मुद्दा है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। इसलिए नदियों को जोड़ने से संबंधित परियोजना का विवादस्पद होना लाजिमी है। भले ही नदियों को जोड़ने की संकल्पना को साकार करना आसान नहीं है, लेकिन पानी की किल्लत और बाढ़ से मुक्ति पाने का यही सबसे अच्छा विकल्प है। मौजूदा समय में जल संकट, बाढ़, सूखा आदि समस्याओं से निपटने के लिए इस तरह की परियोजनाओं को भारत में लागू करना अति आवश्यक है, क्योंकि आपदाओं से होने वाला आर्थिक नुकसान एवं जान-माल की क्षति नदियों को जोड़ने में होने वाले खर्च और विस्थापितों के दुख-दर्द से कहीं अधिक है। अगर नदियों को आपस में जोड़ा जाता है तो इससे पानी की कमी और बाढ़ की समस्या दोनों से निजात मिल सकती है।