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राजनीति : जीवन का मूल्य, कानून और समाज

मानसिक रोगियों के इलाज में बिजली के झटके का इस्तेमाल अब एनेस्थिसिया (बेहोशी) के बाद ही किया जा सकेगा। इलाज के क्रम में नाबालिगों को बिजली का झटका दिए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब मानसिक रोगियों को जंजीर से बांधने पर भी रोक लगा दी गई है। नया अधिनियम मानवाधिकार और संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमापूर्ण ढंग से जीने के अधिकार की मूल भावना पर आधारित है।

Author June 9, 2018 03:26 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुधीर कुमार

देश में आत्महत्या की कोशिश अब जुर्म के दायरे से बाहर होगी। बीती 29 मई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मानसिक चिकित्सा अधिनियम-2017 की अधिसूचना जारी कर देश में आत्महत्या की कोशिश को ‘अपराध’ की श्रेणी से बाहर कर दिया। इसके साथ ही सन 1863 से देश में चली आ रही भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा-309 की वैधानिकता भी समाप्त हो गई। गौरतलब है कि एक विधेयक के रूप में यह अधिनियम राज्यसभा ने 8 अगस्त, 2016 को औरलोकसभा ने 27 मार्च, 2017 को पारित किया था। एक साल बाद इस संबंध में सरकार ने अधिसूचना जारी कर इसे प्रभावी बनाने की घोषणा की है। नया कानून तीन दशक पुराने ‘मानसिक स्वास्थ्य कानून-1987’ की जगह लेगा। नए कानून के तहत मनोरोगियों को इलाज के पर्याप्त अधिकार व अवसर दिए जा रहे हैं। मानसिक चिकित्सा अधिनियम-2017 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें आत्महत्या के प्रयास को ‘अपराध’ की श्रेणी से बाहर रखा गया है। अब ऐसा कृत्य केवल ‘मानसिक रोग’ की श्रेणी में आएगा। दरअसल, भारतीय दंड संहिता की धारा-309 के तहत देश में आत्महत्या का प्रयास करना दंडनीय अपराध माना जाता था। इसके लिए आरोपी को एक साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान भी था। लेकिन अब धारा-309 को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। अब अगर कोई शख्स आत्महत्या का प्रयास करता है, तो उसे ‘अपराधी’ नहीं, अपितु ‘मानसिक रोगी’ समझा जाएगा। इतना ही नहीं, ऐसे मनोरोगियों के उपचार के लिए सरकार सभी तरह की चिकित्सीय सुविधाएं भी मुहैया कराएगी। इस कानून के जरिए मानसिक रोगियों के साथ अमानवीय बर्ताव पर पूरी तरह कानूनी रोक लगा दी गई है।

मानसिक रोगियों के इलाज में बिजली के झटके का इस्तेमाल अब एनेस्थिसिया (बेहोशी) के बाद ही किया जा सकेगा। इलाज के क्रम में नाबालिगों को बिजली का झटका दिए जाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। नए कानून के मुताबिक अब मानसिक रोगियों को जंजीर से बांधने पर भी रोक लगा दी है। सरकार का यह अधिनियम मानवाधिकार के मूल सिद्धांतों और संविधान में समाहित सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार (अनुच्छेद-21) की मूल भावना पर केंद्रित है। ऐसे समय में जब मनोरोगियों को समाज में उपेक्षा की दृष्टि से देखा जा रहा है, तब यह कानून उनकी सुरक्षा का दायित्व लेकर सामने आया है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों और डॉक्टरों पर सजा और जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। पहली बार नियम तोड़ने पर आरोपियों को छह महीने जेल या दस हजार रुपए जुर्माना या दोनों हो सकता है, जबकि अपराध दोहराने पर दो साल जेल और पचास हजार से पांच लाख रुपए तक जुर्माना या दोनों हो सकता है। इस कानून को बनवाने में विधि आयोग की बड़ी भूमिका रही है। विधि आयोग ने 1971 से 2008 के दौरान अपनी कई रिपोर्टों में सरकार से आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से हटाने की सिफारिश की। हालांकि 1978 में एक अवसर ऐसा भी आया जब इस धारा को खत्म करने के लिए राज्यसभा में एक विधेयक पारित कर दिया गया, लेकिन तब लोकसभा के भंग हो जाने के कारण दूसरे सदन से इसे पारित नहीं कराया जा सका। इसके ठीक तीन दशक बाद विधि आयोग की 17 अक्तूबर, 2008 को आई दो सौ दसवीं रिपोर्ट में भारतीय दंड संहिता की धारा-309 को खत्म करने की सिफारिश की गई। आयोग ने कहा था कि आत्महत्या के प्रयास को मानसिक बीमारी के रूप में देखते हुए इसके लिए सजा देने के बजाय इसके उपचार पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

विधि आयोग की तरफ से समय-समय पर आती सिफारिशों को ही आधार बना कर केंद्र सरकार ने धारा-309 के उन्मूलन के संबंध में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों से राय मांगी थी। अठारह राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों की सहमति मिलने के बाद मौजूदा सरकार ने इस मसले को गंभीरता से लिया और इस संबंध में एक ठोस विधेयक के दोनों सदनों से पारित होने के बाद कानून बन कर सामने आया। इस कानून में मानसिक रोग से पीड़ित लोगों के अधिकारों पर जोर दिया गया है, जिन्हें प्राय: समाज से अलग-थलग कर दिया जाता है। गौरतलब है कि देश के करीब सात फीसद लोग किसी न किसी प्रकार की मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं, जबकि एक से दो फीसद लोग गंभीर रूप से बीमार हैं। मानसिक असंतुलन के कारण ऐसे लोग अक्सर आत्महत्या का प्रयास करते हैं। अब राज्य मानसिक उपचार से जुड़े कार्यक्रमों को लागू करने के लिए बाध्य होंगे। आत्महत्या की प्रवृत्ति न सिर्फ भारत में, बल्कि कई देशों में गंभीर समस्या बन चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर चालीस सेकेंड में दुनिया में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। यानी हर साल करीब आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं। भारत में भी आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। भारतीयों में आत्महत्या की दर की बात की जाए, तो प्रति एक लाख जनसंख्या में बीस लोग खुदकुशी कर अपने जीवन का असमय त्याग कर देते हैं। सवाल यह है कि क्यों एक व्यक्ति अपने जीवन को असमय मौत के घाट उतार देता है? यह न सिर्फ प्रशासन,बल्कि समाज के लिए भी चिंता और चिंतन का विषय है। बदलते सामाजिक परिवेश में समाज के हर वर्ग के लोगों में हताशा के भाव देखने को मिल रहे हैं। हताशा, तनाव और अवसाद का यही भाव व्यक्ति को आत्महत्या करने की ओर ढकेलता है। दुखद यह है कि देश में हर साल लाखों लोग अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक समस्याओं से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं। दरअसल, पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से पिंड छुड़ाने का यह नायाब तरीका आत्महत्या करने के रूप में निकल आया है। आधुनिकता के पथ पर निरंतर अग्रसर भारतीय समाज की यह बड़ी क्षति है कि यहां अशिक्षित ही नहीं, बल्कि शिक्षा प्राप्त लोग भी आत्महत्या कर अपने अनमोल जीवन को बेबसी की भेंट चढ़ा रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि कार्यशील जनसंख्या के अंतर्गत लोगों की यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय विकास में बाधक बन रही है।

संसाधनों में श्रेष्ठ, मानव संसाधन के इस तरह असमय नाश होने से देश में कई सामाजिक-आर्थिक समस्याएं खड़ी हो रही हैं। किसी व्यक्ति के ऐसे कृत्य से संबद्ध परिवार और समाज की मनोदशा पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। आत्महत्या की यह प्रवृत्ति भारतीय संस्कृति और परंपरा पर कुठाराघात है। दुर्भाग्य यह है कि जीवन जीने की तमाम व्यवस्थाओं की उपलब्धता के बावजूद लोग अपने जीवन का मोल नहीं समझ पा रहे हैं। दरअसल, लोगों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार और विश्वास में कमी आने के कारण हमें अपनी मानसिक या शारीरिक समस्याओं को दूसरे के समक्ष रखने में झिझक होने लगी है। इसके परिणामस्वरूप, मन में कुंठा पैदा होने लगती है और फिर सारी परेशानियों की जड़ हम स्वयं को मान कर एकमात्र उपाय के लिए आत्महत्या की ओर देखते हैं। आत्महत्या के प्रयास को अपराध के दायरे से बाहर रखना एक सकारात्मक कदम है। लेकिन इससे ऐसे मामलों में कमी आएगी, अभी यह कहना मुश्किल होगा। भारत युवाओं का देश है। यदि यही प्रवृत्ति बरकरार रही तो भविष्य में इसका खमियाजा देश को भुगतना पड़ सकता है। जागरूकता, समझदारी और सतर्कता से ही आत्महत्या के मामलों में कमी आ सकती है।

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