ताज़ा खबर
 

राजनीति: कहां ठहरेगा रुपया

अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के कारण रुपए की कीमत लगातार घटती गई है। पिछले हफ्ते तुर्की के स्टील के खिलाफ अमेरिका द्वारा शुल्क बढ़ाए जाने से तुर्की की मुद्रा लीरा सहित दुनिया के उभरते हुए देशों की मुद्राओं में भी डॉलर के मुकाबले एकदम से गिरावट आई है। कच्चे तेल के बढ़ते आयात बिल और विभिन्न वस्तुओं के तेजी से बढ़ते आयात के कारण देश में डॉलर की मांग बढ़ गई है।

Author August 18, 2018 1:26 AM
प्रतीकात्मक चित्र

जयंतीलाल भंडारी

डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। एक डॉलर 70.40 रुपए का हो गया है। रुपए की कीमत में यह तेज गिरावट आम आदमी से लेकर देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चिंता का कारण बन गई है। हालांकि नीति आयोग का कहना है कि रुपए के मूल्य में गिरावट के लिए वैश्विक आर्थिक घटक जिम्मेदार हैं और रुपया जल्द ही अपने सामान्य स्तर पर लौट आएगा। इससे देश में महंगाई बढ़ने और विकास दर घटने की आशंका बढ़ गई है। रुपए में लगातार गिरावट से 2018-19 में देश का कच्चे तेल का आयात बिल 26 अरब डॉलर बढ़ कर 114 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने से अधिकांश वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। आयातित सामान खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद और मोबाइल फोन के दाम भी बढ़ते हुए दिखाई दे सकते हैं।

डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत घटने के कुछ कारण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के कारण रुपए की कीमत लगातार घटती गई है। पिछले हफ्ते तुर्की के स्टील के खिलाफ अमेरिका द्वारा शुल्क बढ़ाए जाने से तुर्की की मुद्रा लीरा सहित दुनिया के उभरते हुए देशों की मुद्राओं की कीमत भी डॉलर के मुकाबले एकदम से गिरावट आई है। कच्चे तेल के तेजी से बढ़ते हुए आयात बिल और विभिन्न वस्तुओं के तेजी से बढ़ते हुए आयात के कारण देश में डॉलर की मांग बढ़ गई है। निर्यात के धीमी गति से बढ़ने और विदेशी निवेशकों द्वारा नए निवेश की कमी के कारण भी देश में डॉलर की आवक कम हो गई है। इन सभी कारणों से डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता जा रहा है। चूंकि डॉलर में निवेश दुनिया में सबसे सुरक्षित निवेश माना जा रहा है इसलिए दुनिया के निवेशक बड़े पैमाने पर डॉलर खरीद रहे हैं। इससे भी डॉलर मजबूत बना हुआ है। देश के विदेशी मुद्रा कोष का स्तर भी घटकर करीब 400 अरब डॉलर का रह गया है। विदेशी मुद्रा कोष में कुछ कमी और रुपए की कीमत में तेज गिरावट के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था कम जोखिम वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। भारत के लिए अच्छा आधार यह है कि भारत की डॉलर पर ऋण निर्भरता कम है। इसलिए डॉलर की मजबूती का अन्य देशों की तुलना में भारत पर असर कम पड़ रहा है। साथ ही आर्थिक मामलों में भारत की जो रेटिंग सुधरी हुई है, उससे भी अर्थव्यवस्था की मुश्किलें औरों के मुकाबले कम हैं। इन दिनों वैश्विक व्यापार युद्ध से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैदा हो रही चिंताओं से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में निवेश करने के जोखिम से बच रहे हैं और वे अब अधिक सुरक्षित अमेरिकी डॉलर और बांड में अपना निवेश कर रहे हैं। ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआइ) भारत सहित तेजी से उभरते बाजारों में अपना नया निवेश नहीं कर रहे हैं और मौजूदा निवेश को तेजी से निकाल रहे हैं। इसी का असर है कि विदेशी मुद्रा भंडार घटने की प्रवृत्ति दिख रही है।

निस्संदेह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी रुपए के मूल्य में गिरावट का प्रमुख कारण हैं। चूंकि अमेरिका ने भारत, चीन सहित सभी देशों को ईरान से कच्चे तेल का आयात चार नवंबर तक बंद करने के लिए कहा है। इस तिथि के बाद भी वहां से तेल मंगाने वाले देशों के खिलाफ अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। भारत में इराक और सऊदी अरब के बाद सबसे ज्यादा कच्चा तेल ईरान से मंगाया जाता है। ईरान भारत से भुगतान यूरोपीय बैंकों के माध्यम से यूरो में स्वीकार करता है। डॉलर की तुलना में यूरो में भुगतान भारत के लिए लाभप्रद है। इसके अलावा ईरान से कच्चे तेल का आयात परिवहन कारणों से भी सस्ता पड़ता है। स्पष्ट है कि भारत के द्वारा ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद किए जाने से कच्चे तेल की खरीदी से संबंधित नई चिंताएं सामने होंगी। निस्संदेह भारत के सामने कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत संबंधी चिंता बनी हुई है। कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले तेरह देशों के संगठन ओपेक ने तेल का उत्पादन दस लाख बैरल प्रतिदिन (बीपीडी) तक बढ़ा लिया है। लेकिन तेल उत्पादन में इस मामूली वृद्धि से तेल के कीमतों में मामूली कमी ही आ सकेगी और भारत में बढ़े हुए तेल मूल्य रुपए की कीमत में कमजोरी का कारण बने रहेंगे। ऐसे में रुपए की कीमत में गिरावट को रोकने और विदेशी मुद्रा कोष का स्तर बनाए रखने के लिए कई कदम जरूरी हैं। विदेशी निवेशकों को भारत की ओर लुभाने और डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत संभालने के लिए जरूरी है कि सरकार आयात नियंत्रित करने और निर्यात बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़े। हाल ही में भारतीय निर्यातक संगठनों के महासंघ (एफआइईओ) ने कहा है कि सरकार के द्वारा निर्यातकों को दी जा रही रियायतें वैश्विक निर्यात की बढ़ती हुई चुनौतियों का सामना करने के मद्देनजर कम हैं। वैश्विक संरक्षणवाद की नई चुनौतियों के बीच सरकार को निर्यात प्रोत्साहन के लिए और अधिक कारगर कदम उठाने होंगे। देश से निर्यात बढ़ाने के लिए कम से कम कुछ ऐसे देशों के बाजार भी जोड़ने होंगे, जहां गिरावट अधिक नहीं है। सरकार के द्वारा भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने वाले सूक्ष्म आर्थिक सुधारों को लागू किया जाना होगा।

हालांकि इस समय प्रति डॉलर की कीमत 70 रुपए के ऊपर है और उभरते बाजारों की अन्य मुद्राओं के साथ रुपया भी बीते कुछ दिनों में उथल-पुथल का शिकार हुआ है। ऐसे में अर्थ विशेषज्ञों का यह कहना है कि जब तक विदेशी मुद्रा बाजार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता है तब तक रुपए में एक खास हद तक कमजोरी भारत के लिए निर्यात के दृष्टिकोण से एक अवसर बन सकती है। भारतीय रुपया अन्य समकक्ष राष्ट्रों की तुलना में अधिक कमजोर नहीं हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) द्वारा दर्ज 36 कारोबारी साझेदार देशों का सूचकांक भी उन देशों की मुद्रा की कीमत घटने का स्पष्ट संकेत दे रहा है। ऐसे में सरकार के द्वारा एक समग्र प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि भारत का निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी बन सके। इसके लिए जरूरी है कि निर्यातकों को आसानी से कर रिफंड मिल सके और निर्यात कारोबार संबंधी लालफीताशाही समाप्त की जा सके। रुपए की ऐतिहासिक गिरावट को एक अवसर की तरह लिया जाना चाहिए। इससे निर्यात बढ़ा कर अर्थव्यवस्था की चमकीली संभावनाओं को गतिशील किया जा सकता है। अर्थविशेषज्ञों का मत है कि निकट भविष्य में डॉलर की तुलना में रुपया 72 के स्तर को पार कर सकता है। रुपए की कीमत में और किसी बड़ी गिरावट के बचने के लिए हाल ही में प्रकाशित बैंक आॅफ अमेरिका मेरिल लिंच की रिपोर्ट पर ध्यान देना होगा। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तेजी से बढ़ रही विकास दर के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और रुपए की कीमत व विदेशी मुद्रा कोष का उपयुक्त स्तर बनाए रखने के लिए आरबीआइ को प्रवासी भारतीय बांड जारी करके 30 से 35 अरब डॉलर जुटाए जाने चाहिए। जिस तरह आरबीआइ बीते कुछ वर्षों में रुपए की गिरावट को थामने के लिए बाजार में हस्तक्षेप करता रहा है, अब वैसी ही सक्रियता आरबीआइ को फिर दिखानी होगी। निश्चित रूप से ऐसे प्रभावी कदमों से डॉलर के मुकाबले रुपए की घटती हुई कीमत पर रोक लगाई जा सकेगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App