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राजनीति : संकट में डब्ल्यूटीओ का भविष्य

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि नोटबंदी और जीएसटी की मुश्किलों के बाद पटरी पर आई भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक व्यापार युद्ध का प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और भारत की विकास दर कम होने की आशंका है। हाल ही में आए कई वैश्विक सर्वेक्षणों में कहा जा रहा है कि अमेरिकी संरक्षणवाद से भारत के कृषि क्षेत्र, उद्योग-कारोबार और सेवा क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ेंगी। ऐसे में विदेशी संस्थागत निवेशक भारत से मुंह मोड़ते हुए दिखाई देंगे।

Author June 29, 2018 3:03 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

जयंतीलाल भंडारी

इन दिनों पूरी दुनिया में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के भविष्य को लेकर चिंता दिखाई दे रही है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि विभिन्न अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कोई सात दशक तक जिस वैश्विक व्यापार, पूंजी प्रवाह और कुशल श्रमिकों के लिए न्याययुक्त अर्थव्यवस्था के निर्माण और पोषण में अपना अतुलनीय योगदान देकर डब्ल्यूटीओ को आगे बढ़ाया है, अब वही डब्ल्यूटीओ उसी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कदमों और फैसलों से संकट में है। उसके अस्तित्व और उपयोगिता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।  गौरतलब है कि डब्ल्यूटीओ दुनिया को वैश्विक गांव बनाने का सपना लिए हुए एक ऐसा संगठन है जो व्यापार और वाणिज्य को आसान बनाने का उद्देश्य रखता है। हालांकि डब्ल्यूटीओ एक जनवरी, 1995 से प्रभावी हुआ, परंतु वास्तव में यह 1947 में स्थापित एक बहुपक्षीय व्यापारिक व्यवस्था प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (गैट) के नए और बहुआयामी रूप में अस्तित्व में आया है। जहां गैट वार्ता वस्तुओं के व्यापार और बाजारों में पहुंच के लिए प्रशुल्क संबंधी कटौतियों तक सीमित रही थी, वहीं इससे आगे बढ़ कर डब्ल्यूटीओ का लक्ष्य वैश्विक व्यापारिक नियमों को अधिक कारगर बनाने के प्रयास के साथ-साथ सेवाओं और कृषि में व्यापार पर वार्ता को व्यापक बनाने का रहा है। किंतु वैश्विक व्यापार को सरल और न्यायसंगत बनाने के सात दशक बाद अब डब्ल्यूटीओ के भविष्य पर सवाल खड़े होते जा रहे हैं। भारत सहित विकासशील देशों के करोड़ों लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि डब्ल्यूटीओ के तहत विकासशील देशों का शोषण हो रहा है और खासतौर से कृषि, खाद्य सुरक्षा, वीजा सहित सेवा क्षेत्र से संबंधित मामलों में विकसित देश उनके सामने बार-बार चुनौती खड़ी कर रहे हैं।

दुनिया के अर्थ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के संरक्षणवादी रवैये से निश्चित रूप से वैश्विक व्यापार युद्ध की शुरुआत हो गई है। इस वर्ष की शुरुआत से लेकर अब तक अमेरिका ने चीन, मैक्सिको, कनाडा, ब्राजील, अर्जेंटीना, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, यूरोपीय संघ के विभिन्न देशों के साथ-साथ भारत की कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए हैं। जैसे-जैसे अमेरिका विभिन्न देशों पर आयात शुल्क संबंधी प्रतिबंध लगा रहा है, वैसे-वैसे वे देश भी अमेरिका सहित विभिन्न देशों पर आयात शुल्क बढ़ा रहे हैं। जिस तरह अमेरिका ने भारत के स्टील और एल्युमिनियम सहित कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाया है, उसके खिलाफ भारत ने भी अमेरिका से भारत आने वाले मेवे, झींगा मछली, रसायन, सेब, फास्फोरिक एसिड सहित कुछ कृषि उत्पादों और स्टील क्षेत्र सहित कुल उनतीस अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिए हैं। व्यापार युद्ध की सबसे अधिक कवायद तो अमेरिका और चीन के बीच दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के दो सौ अरब डॉलर के आयात पर 10 फीसद शुल्क लगाने की चेतावनी दी है। इसके पहले अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस, वित्त मंत्री स्टीवन न्यूचिन और व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटहाइजर के साथ बैठक के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से पचास अरब डॉलर मूल्य के सामान के आयात पर पच्चीस फीसद शुल्क लगाने को मंजूरी दे दी। जवाबी कार्रवाई करते हुए चीन ने भी अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क लगाने की धमकी दे डाली। इससे दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार युद्ध की आशंका बढ़ गई है। इसी महीने की नौ और दस तारीख को कनाडा के ब्यूबेक शहर में जी-7 देशों का दो दिवसीय शिखर सम्मेलन हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और ‘अमेरिका फर्स्ट’ के तहत अपनाई जा रही नीतियों की वजह से यह सम्मेलन तमाशा बन कर रह गया। यहां भी ट्रंप का जो रुख रहा, उसने दुनिया के अर्थ विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी। चिंताजनक बात यह रही कि सम्मेलन के तुरंत बाद अमेरिका ने समूह-7 के विभिन्न देशों से अमेरिका में आने वाले कुछ आयातों पर अमेरिका के द्वारा नए व्यापारिक प्रतिबंध घोषित करके वैश्विक व्यापार युद्ध के दरवाजे पर दस्तक दे दी। कनाडा, जर्मनी, इटली, जापान, फ्रांस और ब्रिटेन पहले ही ट्रंप की व्यापार नीतियों को लेकर नाखुश थे। सम्मेलन के बाद ट्रंप के आर्थिक सलाहकार लैरी कुडलो और अन्य अमेरिकी प्रतिनिधियों के द्वारा समझौते को अमेरिकी हितों के प्रतिकूल बताते हुए नामंजूर किए जाने से भी वैश्विक व्यापार की चिंताएं बढ़ गई हैं।

वैश्विक व्यापार युद्ध दुनिया के साथ-साथ भारत के लिए भी चिंताजनक संकेत लिए हुए है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि नोटबंदी और जीएसटी की मुश्किलों के बाद पटरी पर आई भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक व्यापार युद्ध का प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और भारत की विकास दर कम होने की आशंका है। हाल ही में आए कई वैश्विक सर्वेक्षणों में कहा जा रहा है कि अमेरिकी संरक्षणवाद से भारत के कृषि क्षेत्र, उद्योग-कारोबार और सेवा क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ेंगी। ऐसे में विदेशी संस्थागत निवेशक भारत से मुंह मोड़ते हुए दिखाई देंगे। साथ ही भारतीय निर्यात और भारत के शेयर और बांड बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। दुनिया के अर्थविशेषज्ञ कह रहे हैं कि डब्ल्यूटीओ न केवल वस्तुओं के व्यापार में अमेरिका और अन्य विकसित देशों द्वारा लगाए जा रहे नए-नए आयात शुल्क के मामलों में कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। इतना ही नहीं, डब्ल्यूटीओ सेवा क्षेत्र के तहत अमेरिका सहित विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की प्रतिभाओं के कदमों को रोकने के लिए वीजा संबंधी नियमों में अन्याययुक्त कदमों को भी नहीं रोक पा रहा है। स्थिति यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड सहित दुनिया के कुछ विकसित देशों में वीजा प्रतिबंधों के माध्यम से प्रतिभा प्रवाह पर नियंत्रण लगाने के चिंताजनक कदम उठाए जा रहे हैं। इन वीजा प्रतिबंधों का भारत पर सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ने वाला है। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने इबी-5 निवेशक वीजा कार्यक्रम को बंद करने का प्रस्ताव अमेरिकी कांग्रेस के सामने रखा है। इबी-5 निवेशक वीजा कार्यक्रम के जरिए विदेशी लोगों को अमेरिका में साढ़े छह करोड़ रुपए तक निवेश करने के लिए ग्रीन कार्ड जारी किया जाता है। अमेरिका इबी-5 निवेशक वीजा कार्यक्रम के तहत हर साल करीब दस हजार विदेशियों को वीजा जारी करता है। इस वीजा कार्यक्रम के बंद होने से बड़ी संख्या में भारतीय निवेशक प्रभावित होंगे। इस वर्ष सात सौ भारतीयों द्वारा इबी-5 वीजा के लिए आवेदन करने का अनुमान है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस वीजा के जरिए विदेशियों द्वारा अमेरिका में फर्जीवाड़े की घटनाएं बढ़ रही हैं।
इसी तरह ब्रिटिश सरकार ने छात्रों के लिए आसान वीजा नियम वाले देशों की सूची से भारत को अलग कर भारतीय छात्रों के लिए वीजा नियमों को सख्त कर दिया है। ब्रिटेन सरकार ने देश की आव्रजन नीति में बदलाव से संबंधित प्रस्तावों के तहत पच्चीस देशों की सूची जारी की है, जिनके छात्रों को टियर-4 वीजा श्रेणी में ढील दी जाएगी। लेकिन नई सूची में भारत को शामिल नहीं किया गया है। इसी तरह से अमेरिका भी एक के बाद एक वीजा प्रस्तावों को कठोर बना रहा है जिसका सबसे अधिक प्रभाव भारत पर पड़ रहा है। भारत को विश्व व्यापार संगठन में भी यह आवाज बुलंद करना होगी कि जब डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत पूंजी प्रवाह स्वतंत्र है, तो प्रतिभा प्रवाह भी नियंत्रण मुक्त रहना चाहिए। ऐसे में निस्संदेह इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना जरूरी है कि यदि विश्व व्यापार व्यवस्था वैसे काम नहीं करती जैसे कि उसे करना चाहिए, तो डब्ल्यूटीओ ही एक ऐसा संगठन है जहां इसे दुरुस्त किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दुनियाभर में विनाशकारी व्यापार लड़ाइयां ही इक्कीसवीं सदी की हकीकत बन जाएंगी। डब्ल्यूटीओ के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि विभिन्न देश एक-दूसरे को व्यापारिक हानि पहुंचाने की होड़ लगाने की बजाय डब्ल्यूटीओ के मंच से ही वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभावों का उपयुक्त हल निकालें।

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