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राजनीति: समस्या का समाधान नहीं खुदकुशी

व्यक्तिगत आत्महत्याओं का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, पूरे के पूरे परिवार के सामूहिक आत्महत्या के आंकड़ों में भी वृद्धि देखी जा रही है। परिवार या सामूहिकता को तो तनाव दूर करने, भावनात्मक संबल और हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने का माध्यम माना जाता था, फिर आज ये कैसे परिवार उभर रहे हैं, जो हकीकत का सामना करने के बजाय मौत को गले लगाना ज्यादा सरल मानते हैं। ऐसा कैसे संभव है कि परिवार के सभी सदस्यों की सोच नकारात्मक होने लगी है?

Author November 1, 2018 4:07 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

ज्योति सिडाना

हाल में हरियाणा के फरीदाबाद में एक परिवार के चार सदस्यों ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली, जिनकी उम्र चौबीस से तीस वर्ष के बीच थी। घटना का विश्लेषण करने वाले एक मनोचिकत्सक ने कहा कि ऐशो-आराम की जिंदगी जीने वाले बच्चों के सामने अचानक आर्थिक संकट आ जाए तो वे तनाव का शिकार हो जाते और आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। बुराड़ी, हजारीबाग, झारखंड में हुई सामूहिक आत्महत्याओं की गुत्थी अभी सुलझी भी नहीं थी कि फरीदाबाद में वैसी ही एक और घटना हो गई। ये घटनाएं सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा हैं, जहां एक नागरिक के जीने के अधिकार को भी सुरक्षित रख पाने में राज-समाज असमर्थ होते जा रहे हैं। आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है? राज्य, समाज या स्वयं व्यक्ति? इस पर गहन चिंतन की जरूरत है। केवल हेल्पलाइन केंद्र स्थापित कर देने से इस समस्या से छुटकारा नहीं मिल सकता। क्योंकि हेल्पलाइन तक तो वह व्यक्ति या समूह तब पहुंचेगा जब सही और गलत के बीच का अंतर कर पाने की स्थिति में होगा।

डार्विन के ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ सिद्धांत के अनुसार केवल शक्तिशाली प्राणी ही जीवित या सफल होते हैं, बाकी मर जाते या विफल होते हैं। यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पहले था। यह तर्क दिया जा सकता है कि वही व्यक्ति जीवित रह सकता है, जो जीवन की चुनौतियों का साहस से सामना करता है। जीवन के संघर्षों का सामना अकेले नहीं, सामूहिकता के साथ सरलता से किया जा सकता है। फिर आज के दौर में ऐसा क्यों नहीं हो रहा? क्यों लोग परेशानी का सामना करने के बजाय उससे भागने लगे हैं? व्यक्तिगत आत्महत्याओं का ग्राफ तो तेजी से बढ़ ही रहा है, पूरे के पूरे परिवार के सामूहिक आत्महत्या के आंकड़ों में भी वृद्धि देखी जा रही है। परिवार या सामूहिकता को तो तनाव दूर करने, भावनात्मक संबल और हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने का माध्यम माना जाता था, फिर आज ये कैसे परिवार उभर रहे हैं, जो हकीकत का सामना करने के बजाय मौत को गले लगाना ज्यादा सरल मानते हैं। ऐसा कैसे संभव है कि परिवार के सभी सदस्यों की सोच नकारात्मक होने लगी है? यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है कि परिवार का हर सदस्य, चाहे वह किसी भी उम्र का क्यों न हो, एक ही जैसे निर्णय कैसे लेने लगे हैं? जब परिवार में कोई एक या अन्य सदस्य हिम्मत हारता या निराश होता था तो बाकी सदस्य उसे हिम्मत देते और साथ खड़े रहने का सांत्वना देते थे कि हर परेशानी का हल निकाला जा सकता है। समस्या को चुनौती के रूप में लेना चाहिए और डट कर उसका मुकाबला करना चाहिए। क्यों हम हर समस्या का हल धर्म, जादू-टोना जैसे अंधविश्वास से निकालने की कोशिश करते हैं?

हमारे समाज में बढ़ती असहनशीलता हमें एक ‘जोखिम समाज’ (रिस्क सोसाइटी) की ओर ले जा रही है, जहां परिवार, विवाह प्रणाली, नातेदारी, विश्वास, व्यवस्था, यहां तक कि मानव जीवन भी खतरे में है। हालात से मुकाबला करना तो जैसे जीवन से गायब ही हो चुका है। जीन बीचलर के अनुसार आत्महत्या की व्याख्या वाह्य की अपेक्षा व्यक्तिगत कारकों के आधार पर ही की जा सकती है। बीचलर ने अपने एक अध्ययन में चार प्रकार की आत्महत्याओं की चर्चा की है- पलायनवादी आत्महत्या (किसी असहनीय स्थिति से भागना), आक्रामक आत्महत्या (दूसरों को नुकसान पहुंचाने या उन्हें अपराधबोध कराने के लिए), बलिदान (दूसरों को लाभ पहुंचाने या उनका जीवन बचाने के लिए आत्महत्या), खेल-खेल में आत्महत्या (जानबूझ कर जोखिम मोल लेना, जिसका परिणाम मृत्यु हो सकती है)। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि कुल आत्महत्याओं में से पचहत्तर फीसद पलायनवादी आत्महत्या की श्रेणी में आती हैं, क्योंकि उनके लिए आत्महत्या समस्या के समाधान का एक तरीका है। इसी तरह समाजशास्त्री दुर्खीम का मत है कि आधुनिकता ने तार्किकीकरण और नियमहीनता के अनेक पक्षों को उत्पन्न किया है, जिसके कारण सामाजिक इकाई सामूहिकता के नियंत्रण या निर्देशन से पृथक हो जाती है। नियंत्रणकारी शक्तियां और नैतिक आवश्यकताओं के सवाल सामाजिक इकाई के जीवन से पृथक हो जाते हैं और वह केवल आर्थिक लक्ष्य तथा स्वयं के विकास में संलग्न हो जाता है। आधुनिकता से उत्पन्न हुई मांग सामाजिक इकाई को अनैतिक प्रतियोगिताओं का हिस्सा बना देती है और यह स्थिति उस इकाई को मनोभावनात्मक दृष्टि से लगभग खोखला करती जाती है, उसमें अविश्वसनीयता उत्पन्न होती है और इस कारण आकस्मिक लाभ या आकस्मिक नुकसान सामाजिक इकाई की सहनशीलता की सीमा से बाहर हो जाता है। यह स्थिति उस इकाई को आत्महत्या के लिए प्रेरित या बाध्य करती है।
प्रतियोगी अर्थव्यवस्था ने दो तरह के समूह उत्पन्न किए हैं। एक, जो यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी तरह की प्रतियोगिता में उसकी जीत सुनिश्चित है, क्योंकि उसके लिए जीत एक उपभोक्ता वस्तु है, जो खरीदी जा सकती है। दूसरा, वह समूह है, जो किसी भी प्रतियोगिता में हारेगा, क्योंकि उपभोक्ता वस्तु के रूप में जीत उसकी खरीद से बाहर है। आत्महत्या दोनों ही समूहों में विद्यमान है। एक, जो सफलता की दौड़ में आगे बढ़ता जाता है, पर अचानक ब्रेक लगता है, क्योंकि अधिक शक्तिशाली ‘जीत’ को खरीद लेता है। दूसरा, जो विफलता को भाग्य मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं और ईश्वरीय इच्छा के तर्क को सामने लाते हैं। असल में राज्य और समाज की तुलना में धर्म का तर्क व्यक्ति को निराशावादी नहीं, बल्कि भाग्यवादी बनाता है, जिसमें आत्महत्या करना भी ईश्वरीय निर्देश है। सामूहिक आत्महत्या को इस दृष्टि से समझने की जरूरत है।

इन दोनों समूहों के पीछे का एक भयावह सच है। जन संघर्षों और जन आंदोलोनों से इन समूहों को अलग करने की कोशिश सफल हो रही है, क्योंकि ‘क्यों’, ‘कैसे’, ‘कब’, ‘कहां’ आदि सवाल संघर्षों और आंदोलनों के कारण सामूहिक रूप लेते हैं और ‘सामूहिक’ अपने आप में एक मूल्य बन कर ‘जन-शक्ति’ की रचना करता है। ऐसे संघर्ष और आंदोलन पारस्परिक समन्वय और सहयोग को सम्मिलित कर व्यक्ति को सफलता और जीत के प्रति कहीं न कहीं आशावान बनाते हैं। यही आशा आत्महत्याओं के विरुद्ध संस्कृति को महत्त्वपूर्ण स्थान देती है। असल में राज्य आत्महत्या को ‘स्व के विरुद्ध हिंसा’ का रूप देकर अपने दायित्वों से जनता को परिचित नहीं कराता।सामान्यतया उपरोक्त घटनाओं में अंधआस्था का तंत्र, आर्थिक तंगी, कर्ज, तनाव, बदनामी, बीमारी और महत्त्वाकांक्षाओं का पूरा न हो पाना सामूहिक (समूचे परिवार) आत्महत्याओं के कारणों के रूप में उभर कर आए हैं। आत्महत्याओं के पूर्व ‘सुसाइड नोट’ का लिखा जाना यह सिद्ध करता है कि ये आत्महत्याएं चेतनशील स्थितियों का परिणाम हैं, क्योंकि कारणों का उल्लेख पत्रों में किया गया है। अब सवाल है कि वे कौन सी स्थितियां हैं, जो आत्महत्या को उकसा रही हैं और इन स्थितियों को उत्पन्न करने वाली प्रणालियां/ उप-प्रणालियां या ताकतें कौन-सी हैं? वैश्वीकरण के इस दौर में गतिशीलता इतनी बढ़ी है कि कोई भी संस्थागत ढांचा समाज में किसी भी प्रकार का अनुकूलन स्थापित करने में सक्षम नहीं है। क्या राज्य इन आत्महत्याओं के कारणों- गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, आर्थिक तंगी- को दूर करने में सक्षम नहीं है? यह एक तथ्य है कि हम सबके जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं कि हमें उनसे बाहर निकलने का रास्ता नहीं सूझता या हमारे प्रयास विफल हो जाते हैं और हम निराशा हो जाते हैं। अक्सर परिवार के बड़े-बुजुर्ग यह समझाते हैं कि जीवन में निराश मत होना, कमजोर मत पड़ना। जिंदगी को ढोना नहीं, जीना चाहिए तभी समाज को संकटों के दौर से बाहर निकाला जा सकता है।

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