ताज़ा खबर
 

राजनीतिः न्यूनतम समर्थन मूल्य की हकीकत

न्यूनतम समर्थन मूल्य की एक खामी यह भी है कि सारे किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पाता है। अब भी गेहूं और धान के कुल उत्पादन का पच्चीस से तीस प्रतिशत ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है। ओड़िशा जैसे राज्य तो घोर भेदभाव के शिकार हुए हैं।

हाल में सरकार ने किसानों को खरीफ फसलों की लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।

हरियाणा सरकार ने राज्य में भावांतर भरपाई योजना की शुरुआत की थी। यह योजना बागवानी उत्पादकों को लाभ देनी वाली थी। किसानों को कृषि उत्पादों के मंडी में कम दाम मिलने पर सरकार द्वारा भरपाई करने की यह योजना मध्यप्रदेश सरकार की तर्ज पर शुरू की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य मंडी में सब्जी की कम कीमत के दौरान निर्धारित संरक्षित मूल्य द्वारा किसानों का जोखिम कम करना था। इस योजना में टमाटर, प्याज, आलू और फूलगोभी की फसल को शामिल किया गया। लेकिन अब भावांतर भरपाई योजना की हकीकत सामने आ गई है। एक तो इस योजना में राज्य के ज्यादातर किसानों को शामिल नहीं किया गया। जिन्हें किया भी, उन्हें भावांतर भरपाई योजना के तहत दस पैसे प्रति किलो तक मुआवजा मिला। हाल ही में जब टमाटर की फसल लेकर किसान मंडियों में पहुंचे तो उन्हें इस योजना की खामियों से रूबरू होना पड़ा। किसानों को मंडियों में एक रुपए किलो के भाव टमाटर बेचना पड़ा। दूसरी तरफ, पंजीकृत किसानों को सरकार की तरफ से दस पैसे प्रति किलो मुआवजा मिला। खरीद और मुआवजे की तमाम घोषणाओं के बावजूद किसानों के सामने आ रही परेशानी यह बता रही है कि देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर दावे तो जरूर हो रहे हैं, लेकिन इसका लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है।

हाल में सरकार ने किसानों को खरीफ फसलों की लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। धान सहित चौदह फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में बड़ी बढ़ोतरी का एलान किया। धान की फसल पर समर्थन मूल्य में दो सौ रुपए का इजाफा किया गया। सरकार का दावा था कि यह धान की लागत से पचास प्रतिशत ज्यादा है। इसी तरह से कई और फसलों के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की गई। लेकिन इन तमाम घोषणाओं के बीच किसानों को इसका कितना लाभ मिल रहा है, यह अहम सवाल है। हरियाणा में भावांतर भरपाई योजना का किसानों को लाभ नहीं मिला। मध्यप्रदेश में भी भावांतर योजना को लेकर तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप यही है कि घोषणाएं तो हो रही हैं, लेकिन जमीन पर किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है। सरकारी खरीद केंद्रों के अभाव में देश के कई राज्यों में किसान इसके लाभ से वंचित हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर सरकार बेशक लंबे-चौड़े दावे करे, लेकिन सच्चाई यही है कि घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ किसानों को नहीं मिला है। हालत यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा सरकार कर तो देती है, लेकिन सरकारी एजेंसियों के खरीद केंद्र राज्यों में सक्रिय नहीं होते। कुछ आंकड़े तो चौंकाने वाले हैं। देश में कुल उत्पादित होने वाले धान की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर तीन राज्यों में ही ज्यादा है। धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ बिहार, बंगाल और ओड़िशा के किसानों को नहीं मिला है। कुल धान उत्पादन की पचास प्रतिशत खरीद पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश में है। जबकि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की खरीद मात्र दस प्रतिशत है। न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ बिचौलिए व्यापारी ले रहे हैं। वे बिहार, बंगाल और ओड़िशा से सस्ते मूल्य पर धान खरीद कर पंजाब, आंध्र प्रदेश और हरियाणा के सरकारी खरीद केंद्रों पर बेच कर मुनाफा कमा रहे हैं।

धान की खरीद का राज्यवार आंकड़ा बताता है कि वर्ष 2017-18 में विभिन्न एजेंसियों ने पूरे देश में तीन सौ इकसठ लाख टन धान की खरीद की। इसमें से 118.3 लाख टन धान पंजाब के खरीद केंद्रों पर खरीदा गया। हरियाणा के खरीद केंद्रों पर 39.9 लाख टन और आंध्र प्रदेश के खरीद केंद्रों पर 38.7 लाख टन धान की खरीद की गई। तीनों राज्यों के आंकड़ों को एक साथ मिला कर देखें तो देश में खरीदे गए कुल धान का चौवन प्रतिशत तीन राज्यों से खरीदा गया। इसका साफ मतलब है कि पूर्वी राज्यों में जहां धान का उत्पादन खूब होता है, सरकारी खरीद केंद्रों का भारी अभाव है। बिचौलिए व्यापारी यहां पर इसका फायदा उठा रहे हैं। बिहार, ओड़िशा और बंगाल के किसान सरकारी खरीद केंद्र नहीं होने का भारी नुकसान उठा चुके हैं। यहां नवंबर से ही बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य की एक खामी यह भी है कि सारे किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पाता है। अब भी गेहूं और धान के कुल उत्पादन का पच्चीस से तीस प्रतिशत ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है। इस समय पूरे देश में धान का उत्पादन लगभग ग्यारह सौ लाख टन है। ओड़िशा जैसे राज्य तो घोर भेदभाव के शिकार हुए हैं। धान उत्पादन में ओड़िशा काफी आगे है। यहां देश के कुल धान उत्पादन का तेरह से चौदह प्रतिशत होता है। लेकिन वर्ष 2017-18 में राज्य में कुल चौवन हजार टन धान की खरीद की गई। यह राज्य के कुल उत्पादन का 0.36 प्रतिशत था। जबकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य से अट्ठाईस लाख टन धान की खरीद की गई। यह कुल धान उत्पादन का तेईस प्रतिशत था। जबकि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य में सौ प्रतिशत धान की खरीद की गई। हालांकि पंजाब के कृषि विशेषज्ञ न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणाओं को महज घोषणा मानते हैं क्योंकि घोषणाएं तो कई फसलों पर होती हैं, लेकिन खरीद सिर्फ गेहूं और धान की होती है।

धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में लगातार बढ़ोतरी से पंजाब के प्राकृतिक संसाधनों को भारी नुकसान हो रहा है। राज्य में खरीद की गारंटी के कारण धान की खेती के रकबे में बढ़ोतरी हो रही है। इससे भूजल काफी नीचे जा रहा है। राज्य में तिहत्तर प्रतिशत सिंचाई भूजल से है। जबकि सत्ताईस प्रतिशत सिंचाई नहरी पानी से है। पंजाब को डर है कि धान की खरीद की गारंटी होने और इस साल दो सौ रुपए प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी होने से पंजाब को भूजल का भारी नुकसान होगा। मक्का, दाल आदि की सरकारी खरीद नहीं होने के कारण पंजाब के किसान दूसरी फसलों के उत्पादन की तरफ नहीं जा रहे हैं। जबकि पंजाब के वैज्ञानिकों ने आकलन लगाया है कि एक किलो चावल के उत्पादन में पांच हजार लीटर पानी खर्च हो रहा है। इसका परिणाम यह होगा कि अगले कुछ सालों में पंजाब रेगिस्तान में तब्दील हो सकता है।

पंजाब को अगर बचाना है तो यहां कृषि में विविधता लानी होगी और दूसरी फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी देनी होगी। बीते साल पंजाब में अट्ठाईस लाख हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती गई थी। पंजाब के किसान चाहते हैं कि जिस तरह से धान की खरीद की पूरी गारंटी सरकारी एजेंसियां दे रही हैं, उसी तरह मक्का, दलहन की खरीद की पूरी गारंटी दें। बीते सीजन में मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य एक हजार चार सौ पच्चीस रुपए प्रति क्विंटल था। लेकिन सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीद गारंटी नहीं होने के कारण बाजार में बारह सौ रुपए का मूल्य भी मुश्किल से मिल पाया। इस साल मक्का के न्यूनतम समर्थन मूल्य में पौने तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। लेकिन बाजार में यह बारह सौ रुपए से तेरह सौ रुपए प्रति क्विंटल ही बेचे जाने की उम्मीद है। पिछले साल भी पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार से मक्का खरीद पर हस्तक्षेप की मांग की थी। अगर सरकार वाकई किसानों को लाभ देना चाहती है तो खरीद की पूरी या तो गारंटी ले, नहीं तो कम से कम बाजार मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर की भरपाई सरकारी खजाने से करे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App